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आजादी से पहले के वो शब्द जिनसे अंग्रेजी हुकूमत की सोच पता चलती है

नई दिल्ली, 09 अगस्त। देश की आजादी में हजारो-लाखों भारतीयों ने अपनी कुर्बानी दी। दशको के संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली। 15 अगस्त 2021 को देश की आजादी के 74 साल पूरे हो जाएंगे। देश के इस राष्ट्रीय पर्व की तैयारी जोरो-शोरों पर हो रही है। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के इस जश्न में हमे यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि यह आजादी काफी संघर्ष और बलिदान के बाद आई है। आजादी के इस पर्व से पहले वनइंडिया हिंदी की टीम आपको आजाद भारत से पहले के सघर्ष, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और उन तमाम ऐतिहासिक पहलुओं से रूबरू करा रहा है जिसे जानकर आपके भीतर देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना और बढ़ेगी। आज हम बात करेंगे आजादी से पहले समाज में प्रचलित व्यवस्था की।

अंग्रेजी हुकूमत में 'लगान' व्यवस्था

अंग्रेजी हुकूमत में 'लगान' व्यवस्था

देश में लगान की व्यवस्था बहुत लंबे समय से चली आ रही है, हालांकि अलग-अलग काल में इसके नाम अलग रहे हैं। भारत में अंग्रेजी हुकूमत आने के बाद देश में पहले से चली आ रही भू राजस्व व्यवस्था के तहत व्यापारियों और किसानों से कर वसूला जाता था। अंग्रेजों भारत में इजारेदारी प्रथा लागू की जिसमे पांच साल के लिए जमीन का ठेका दिया जाता था और सबसे अधिक बोली लगाने वाले को ठेका अधिकृत किया जाता था। किसानों से उनकी आय की तुलना में कहीं अधिक लगान वसूला जाता था, जिससे देश में कृषि व्यवस्था काफी चौपट हो गई थी।

राय बहादुर-खान बहादुर

राय बहादुर-खान बहादुर

ब्रिटिश काल में राय बहादुर की उपाधि या पद दिया जाता था। यह पद उन लोगों को दी जाती थी जो ब्रिटिेश काल अंग्रेजों के वफादार थे और पब्लिक सर्विस में अच्छा काम रते थे। इस पद की शुरुआत 1911 में की गई थी। राव का मतलब होता था राजकुमार और बहादुर का मतलब वीर। यह उपाधि कई हिंदुओं को दी गई। वहीं मुस्लिम को खान बहादुर, सिख को सरदार बहादुर की उपाधि दी जाती थी। राय बहादुर से नीचे वाले व्यक्तियों को राय साहब, दीवान बहादुर की उपाधि या पद दिया जाता था।

जागीदार

जागीदार

ब्रिटिश काल में उन लोगों को जागीदार कहा जाता था जिनके पास एक निश्चित क्षेत्र या भू-भाग का अधिकार होता था। यह सामंती व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के तहत जब जमीन के मालिक की मृत्यु होती थी तो उसके बच्चों को उस जागीर का मालिक घोषित कर दिया था था। अहम बात यह थी कि सिर्फ परुषों को ही जागीदार घोषित किया जाता था। ऐसे में उस पूरे क्षेत्र में इकट्ठा होने वाले कर को वसूलने का अधिकार अपने आप जागीदार को आ जाता था। जागीदार अकेले काम नहीं करते थे, बल्कि वो अपने काम के लिए अलग-अलग राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति करते हैं जो कर वसूलने का काम करते हैं।

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