इतिहास के पन्नों से- अमृतसर का दुर्गायाना मंदिर

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) अमृतसर का जिक्र आते ही स्वर्ण मंदिर या जलियांवाला बाग का ख्याल जेहन में आने लगता है। ये स्वाभाविक ही है क्योंकि दोनों अपने आप में बेहद अहम स्थान हैं। पर इधर का दुर्गायाना मंदिर भी अपने आप में पूरा इतिहास समेटे हैं। ये 16 वीं सदी में बना था। हालांकि इसका मौजूदा स्वरूप तो 1921 के आसपास तैयार हुआ।

मालवीय जी आए थे

1921 में जब ये नए सिरे से बनकर तैयार हुआ तो इसका उद्घाटन करने खुद पंडित मदन मोहन मालवीय जी पधाऱे थे। दुर्गायाना मंदिर देखने में बहुत हद तक स्वर्ण मंदिर ही लगता है। इसका डिजाइन निश्चित रूप से स्वर्ण मंदिर से प्रभावित है।

दुर्गा का मंदिर

जैसे कि इसके नाम से ही स्पष्ट है ये मां दुर्गा का मंदिर है। इधर रोज हजारों लोग पूजा अर्चना करने के लिए आते है। आप कह सकते हैं कि जो अमृतसर में आता है, वह दुर्गायाना मंदिर भी अवश्य मत्था टेकने के लिए जाता है। अमृतसर आने वाला इंसान इधर ना आए, ये हो नहीं सकता।

पूरी होती मनोकामनाएं

कहते हैं कि इधर आने वालों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इधर लक्ष्मी जी, हनुमान जी और विष्णु जी की भी प्रतिमाएं रखी हुई हैं। इन्हें भी पूजा जाता है। इसे शीतला माता मंदिर भी कहा जाता है। ये पंजाब के हिन्दुओं का सबसे भव्य मंदिर माना जा सकता है। इस मंदिर के आसपास भी शराब और सिगरेट का सेवन करना पूरी तरह से निषेध है। इधर भी हिन्दुओं के अलावा सभी धर्मों के लोग आते हैं।

संगमरमर का प्रयोग

मंदिर के निर्माण में संगमरमर का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के गेट से मुख्य गेट तक पहुंचने के रास्ते में एक सरोवर भी है। जिसके इर्द-गिर्द लोग बैठ जाते हैं।

मंदिर में दशहरा, दिवाली और रामनवमी पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाए जाते हैं। अमृतसर के जानकार सरदार राजेन्द्र सिंह कहते हैं दुगार्याना मंदिर हिनदुओं और सिखों के लिए बेहद खास स्थान रखता है।

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