Sugarcane Price: कैसे निर्धारित होता है गन्ने का मूल्य, एफआरपी और एमएसपी में क्या है अंतर?
Sugarcane Price: देश के कुछ किसान जहां अपनी समस्याओं को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं केंद्र की मोदी सरकार किसानों को खुश रखने का हर संभव प्रयास कर रही है।
इसी कड़ी में किसानों की आय बढ़ाने हेतु मोदी सरकार ने गन्ने के एफआरपी में रिकॉर्ड 8 प्रतिशत की वृद्धि की है। इस वृद्धि के साथ चीनी मौसम वर्ष 2024-25 के लिए गन्ने का एफआरपी 315 रुपए से बढ़कर 340 रूपये हो गया है।

यहां आपको बता दें कि गन्ना से बनने वाली चीनी मिलों का आर्थिक चक्र 1 अक्टूबर से 30 सितंबर तक माना जाता है, यानि यह एफआरपी बढ़ोतरी अगले चीनी सत्र के लिए है। इससे पहले भी वर्ष 2023 में मोदी सरकार ने गन्ने के एफआरपी में 10 रूपये की वृद्धि की थी।
क्या होता है एफआरपी?
गन्ने का वह न्यूनतम और अनिवार्य मूल्य, जिस पर भारत की समस्त चीनी मिलें गन्ना खरीदती हैं, एफआरपी (Fair and Remunerative Price) अर्थात उचित एवं लाभकारी मूल्य कहलाता है। वर्ष 2024-25 के लिए निर्धारित एफआरपी 10.25 प्रतिशत रिकवरी दर का है यानि 1 क्विंटल गन्ने की जिस किस्म (प्रजाति) से 10.25 किलो चीनी का उत्पादन होगा, उसका एफआरपी 340 रूपये प्रति क्विंटल होगा।
अगर गन्ने की किसी अन्य किस्म से रिकवरी दर में वृद्धि होती है तो प्रति 0.1 प्रतिशत अंक की वृद्धि के लिए एफआरपी में प्रति क्विंटल 3.32 रूपये प्रीमियम मिलेगा। वहीं 9.5 प्रतिशत या उससे कम रिकवरी का एफआरपी 315.10 रूपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
कैसे निर्धारित होता है गन्ने का एफआरपी?
भारत में गन्ने के एफआरपी की सिफारिश भारत सरकार के कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की विकेंद्रित एजेंसी कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी - कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्टस एंड प्राइसिस) द्वारा सरकार को भेजी जाती है। इसके उपरांत कृषि लागत व मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) राज्य सरकारों तथा चीनी उद्योग की एसोसिएशनों से विचार-विमर्श कर एफआरपी घोषित करती है।
एफआरपी का भुगतान आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईएसी), 1955 के अंतर्गत जारी गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 द्वारा नियंत्रित है। पहले गन्ने के एसएमपी (वैधानिक न्यूनतम मूल्य) की अवधारणा थी, जिसे 22 अक्टूबर 2009 को गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 में संशोधन करके इसे गन्ने के 'उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी)' में बदल दिया गया।
गन्ने के एफआरपी निर्धारण के मानकों में - गन्ने से चीनी रिकवरी, गन्ने की उत्पादन लागत, उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर चीनी की उपलब्धता, चीनी उत्पादकों द्वारा बेची गई चीनी का मूल्य, गन्ने से उप-उत्पादों की बिक्री से प्राप्त आय (गुड़ और खोई) और गन्ना उत्पादकों के लिए जोखिम व मुनाफा आदि शामिल है।
क्यों है राज्यों में एफआरपी से ज्यादा गन्ने का मूल्य?
एफआरपी बढ़ने का लाभ देश के सभी किसानों को नहीं मिलता। क्योंकि कुछ राज्य जिनमें गन्ने का उत्पादन अधिक होता है, वे राज्य अपनी अलग कीमत एसएपी (स्टेट एडवायजरी प्राइस - राज्य सलाह मूल्य) निर्धारित करते हैं। यह एसएपी, एफआरपी से अधिक होती है। जैसे अभी केंद्र सरकार ने नये चीनी सत्र 2024-25 के लिए एफआरपी 340 तय किया है, जबकि उत्तर प्रदेश में अभी एसएपी 370 रूपये है। इसी प्रकार हरियाणा में 386 रूपये तथा आगामी चीनी सत्र के लिए हरियाणा सरकार ने एसएपी 400 रूपये की घोषणा भी की हुई है।
क्या अंतर है एफआरपी और एमएसपी में?
एफआरपी, एक तरह से एमएसपी ही होता है, जो सिर्फ गन्ना उद्योग में प्रयोग किया जाता है। इस मूल्य पर चीनी मिलें किसानों से गन्ना खरीदती हैं। वहीं एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसी भी फसल का वह न्यूनतम मूल्य होता है जिस पर सरकारी एजेंसियां किसानों की फसल खरीदती हैं।
मोदी सरकार में कितना बढ़ा एफआरपी
वर्ष 2014 में जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली, तो चीनी सत्र 214-15 में एफआरपी 220 रूपये प्रति क्विंटल था। यानी मोदी सरकार के 10 वर्षों के दौरान एफआरपी में करीब 55 प्रतिशत की वृद्धि के साथ यह 340 रूपये हो गया।












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