Stubble Burning: क्या है पराली जलाने का समाधान, विदेशों में क्या नियम है पराली जलाने को लेकर?
Stubble Burning: क्या है पराली जलाने का समाधान, विदेशों में क्या नियम है पराली जलाने को लेकर?
उत्तर भारत में पराली जलाना एक बार फिर से मुसीबत बन गया है। इस पराली ने दिल्ली एनसीआर सहित लगभग पूरे उत्तर भारत में हवा को प्रदूषित कर दिया है। आइये समझने की कोशिश करते है कि आखिर यह पराली क्या है और विदेशों में पराली अथवा stubble burning को लेकर क्या नियम है?

क्या है पराली
पराली, फसल की कटाई के बाद बचा हुआ अवशेष है। अगली फसल को बोने से पहले इसे जमीन से साफ़ करना बेहद जरुरी होता है। कई किसान पराली को चारे की तरह भी इस्तेमाल करते हैं लेकिन यह इतनी फायदेमंद नहीं होती। इसे खाद्य पदार्थ के रूप में भी योग्य नहीं समझा जाता है। इसलिए सामन्यतः किसान इसे जला देते है और उसके बाद उठा धुआं, हवा में मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित कर देता है। हालाँकि, पिछले कई सालों से पराली का उपयोग बिजली बनाने वाली कम्पनियाँ करने भी करने लगी है। मगर यह कितना प्रभावी है, इसके आंकड़े अभी ठीक से उपलब्ध नहीं है।
पराली को लेकर अन्य देशों में क्या नियम है?
विदेशों में पराली को स्टबल और उसे जलाने को स्टबल बर्निंग (stubble burning) कहा जाता है। पराली सिर्फ भारत का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह विश्वभर की समस्या है। कई देश इसके धुएं से होने वाले प्रदूषण से बेहद परेशान है और उसके समाधान के उपाय ढूंढ रहे हैं।
ब्रिटेन में पराली जलाने पर सख्त प्रतिबंध एवं नियम है। कॉमन एग्रीकल्चर पॉलिसी के तहत यूरोपीयन संघ तो पराली जलाने के दृढ़ता से खिलाफ है। वहीं ऑस्ट्रेलिया में पराली जलाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है और सरकार भी पराली जलाने को अनुशंसित नहीं करती। वहां के किसान भी पराली जलाने को सही विकल्प नहीं मानते।
चीन में पराली जलाने पर सख्त प्रतिबंध हैं लेकिन फिर भी वहां पर आमतौर पर पराली जलाई जाती है। कनाडा में कुछ-कुछ क्षेत्रों में पराली जलाने की अनुमति है लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में पराली जलाने की अनुमति नहीं दी गई है।
दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों के बिगड़ते हालात
पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के मुताबिक खेतों में आग की संख्या 8 नवंबर 2021 को 5430 तक पहुंच गई थी। यह उस सीजन का सर्वाधिक रिकार्ड था। साल 2020 में यही आकंडा 4500 के करीब थी। इसलिए नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को दोषी ठहराने और भूसे यानि पराली के प्रबंधन के लिए मशीन उपलब्ध नहीं कराने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी।
इस साल भी तात्कालिक प्रबंधन में कमी के चलते उत्तर प्रदेश, हरियाणा और खासकर में पंजाब मे जो पराली जलाई जा रही है और उसका धुआं दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके है कि पराली जलाने के दिनों में और उसके बाद दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 से ऊपर ही रहता है और कई बार 500 से ऊपर भी चला जाता है।
ऐसा नहीं है कि पराली को जलाने से उठने वाला धुआं सिर्फ दिल्ली का ही दम घुटाता है, बल्कि राजधानी के आसपास के शहरों के लिए भी यह बड़ी समस्या बन गया है। नवम्बर 2022 के पहले सप्ताह में नोएडा का एयर क्वालिटी इंडेक्स 529 चला गया, गुरुग्राम का 478, गाजियाबाद का 446 और फरीदाबाद का 463।
हलातों को काबू करने के लिए दिल्ली में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी गयी है। इस आयोग का गठन केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए किया था। इसका उद्देश्य दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता से संबंधित समस्याओं की पहचान कर राज्यों के बीच आपसी समन्वय स्थापित करना है। साथ ही अनुसंधान के माध्यम से इस इलाके को प्रदूषण की समस्या से भी निजात दिलाना इसके कार्यों में शामिल है।

पराली का प्रदूषण ने कैसे नुकसान पहुंचा रहा है?
पराली से होने वाले प्रदूषण को काबू करने को लेकर केंद्र सरकार 2017 से 2021 तक 2440 करोड़ रुपये की रकम खर्च कर चुकी है, लेकिन इसका नतीजा लगभग जीरो है। एक तरफ केंद्र सरकार का खजाना खाली हो रहा है तो दूसरी तरफ दिल्ली और आसपास की आर्थिक गतिविधियाँ भी ठप्प पड़ने से आर्थिक नुकसान भी होने लगा है।
अमेरिका के इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट एवं सहयोगी संस्थानों के अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, पराली के प्रदुषण से भारत को सालाना लगभग 30 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक साल 2015 में पराली के धुएं से सैकड़ों मौतें दर्ज की गयी थी। हालांकि, सरकार की तरफ से ऐसे कोई आकंडे जारी नहीं किये गए है। हर साल पराली को जलाने से उठने वाले धुंए से बीमार हुए लोगों के उपचार में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं।
पराली कैसे किसानों की आय दुगनी कर सकती है
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे हजारों किसान है जो पराली को बिना जलाये, उसे बेचकर अपनी आय में इजाफा कर रहे है। इस दिशा में केंद्र सरकार सहित राज्य सरकारों की तरफ से भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। पराली से चलने वाले ब्रिक्स पैलेट और पावर प्लांट बनाने के लिए किसानों से संपर्क किया जा रहा है। किसान अगर इस तरह के उद्योगों को संचालित करने वाले उद्यमियों को पराली बेचता है तो उसे उसकी ठीक-ठाक रकम देने की व्यवस्था भी बनाई जा रही है।
पराली आधारित बायोमास पैलेट की मांग बेहद तेजी से बढ़ने लगी है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि पराली के पेलेटाइजेशन और टॉरफेक्शन संयंत्रों की स्थापना के लिए ₹50 करोड़ की सहायता राशि घोषित की गई है। नॉन-टॉरेफाइड पेलेट संयंत्रों के लिए 70 लाख रुपये तक की और टॉरफेक्शन संयंत्रों के लिए ₹1.4 करोड़ तक की वित्तीय सहायता निर्धारित की गई है।
अगस्त 2021 में पंजाब सरकार की कैबिनेट ने धान की पुआल आधारित बॉयलर लगाने वाले पहले 50 उद्योगों को 25 करोड़ रुपए के फंड को मंजूरी दी थी। मंत्रिपरिषद ने धान की भूसी के भंडारण हेतु पंचायत भूमि को 33 वर्ष तक के लीज एग्रीमेंट के साथ उद्योगों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
हरियाणा में किसानों को पराली न जलाने के लिए बहुत प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। राज्य सरकार की तरफ से 1000 रुपए प्रति एकड़ किसानों और किसानों से जो पराली खरीद कर ले जाता है उनको प्रति बिल 500 रुपए टन दिया जाता हैं। इसके अलावा बेल बनाने या उस सारी पराली को खेतों के अंदर ही यानि बहाई करने के लिए जरुरी उपकरणों की खरीद पर किसानों को 50% से 80% की सब्सिडी दी जा रही है। इसमें तरह-तरह के उपकरण जैसे बेलर, कटर, रैकर, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर इत्यादि उपकरण आते है हैं। राज्य सरकार ने किसानों को साल 2021 तक 72 हजार उपकरण खरीद कर उपलब्ध कराए हैं।
(Writer intro: लेखक युवा पत्रकार एवं लेखक हैं।)












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