इन बच्चों के लिये क्यों नहीं होते आंदोलन?
सरकार के विरोध में आवाजों की बुलंदी देखी.... तख्तियों में चमकते आंदोलन देखे.... कभी जातिवाद के सिपहसलारों से रूबरू हुए....कभी भारत के टुकड़े करने वालों से भी। लगभग हर रोज न जाने कितने मुद्दों से हम खुद को जोड़ते हैं। चाय पर चर्चा करते हैं। अपनी बातों को मनवाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते हैं लेकिन उन पर हमारी जुबानें क्यों बार-बार महज एक लेख, एक बहस, एक शो, एक वक्त के बाद सोचना बंद कर देती हैं। जी हां भारत के भविष्य की बात कर रहा हूं मैं।
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उन बच्चों की जो अपने नन्हे नन्हे हाथों की लकीरों में कोई राजयोग, कितनी पढ़ाई, कितनी कमाई को नहीं ढूंढ़ सकते क्योंकि इनकी हर लकीर महज निवालों को जुटाने में व्यस्त है। रात में किस फुटपाथ को मखमली बिस्तर मानकर सो जाना है इसकी उधेड़बुन करने में लगे हैं।
यहां हर चेहरा एक्सक्लूसिव है...
जरा गूगल कीजिए इस शब्द को ''गरीब बच्चे''...फिर देखिए गरीबी की कितनी सारी एक्सक्लूसिव तस्वीरें निकल कर सामने आएंगी। और या तो आपने, हमने, हम सबने इनको देखना अब तक मुनासिब नहीं समझा या फिर हम देखकर भी अब तक इन्हें नजरंदाज करते रहे।
जिम्मेदार सो रहे हैं....
भारत में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में रखा गया है। फिर देश की सड़कों पर खुलेआम लोगों के सामने इतने सारे हाथ कैसे उम्मीद और ख्वाहिश में फैले रहते हैं? अगर भीख मांगना अपराध है तो बिना किसी तरह की हिचक के सबके सामने यह 'अपराध' कैसे चलता रहता है? घोषित अपराध को रोकने वाला हमारा महकमा कहां सो रहा होता है?
हैरान कर देने वाले आंकड़े
- 60 हजार बच्चे हर साल गायब होते हैं, जिनमें से 44 हजार से भीख मंगवायी जाती है।
- गायब बच्चों में से एक चौथाई कभी नहीं मिलते हैं।
- राज्यसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 4,13,670 लाख भिखारी हैं।
- राज्यसभा की रिपोर्ट- 81 हजार भिखारी पश्चिम बंगाल में, 65 हजार यूपी में।
- आंध्र प्रदेश में 30, बिहार में 29, मध्य प्रदेश में 28 हजार लोग भीख मांगते हैं।
- देश में 2.2 लाख पुरुष और 1.91 लाख महिलाएं भीख मांगती हैं।
- हर साल करीब 10 लाख बच्चों के अपने घरों से दूर होकर अपने परिजन से बिछड़ने का अंदेशा है।
प्रयास तमाम फिर भी गरीबी में बचपन गुमनाम
इन सारी बातों पर बहसें लगातार होती रही हैं। लेकिन मंच पर सजी राजनीतिक जुबानों पर इनका जिक्र कहीं नहीं आता है, क्योंकि राजनेताओं ने राजनीति का मतलब महज धर्म का बंटवारा और जाति में मतभेद बना रखा है। लेकिन ''मासूम भिखारी'' या कहिए ''बाल भिखारी'' मुद्दा लाख टके का है। कभी भी उछालिए तो खूब बिकेगा भी। लोग अफसोस भी जताएंगे। कुछ दिन के लिए नजर और नजरिया भी बदलेगा। दानी, धर्मात्मा भी बन जाएंगे। पर, कुछ चाट पकोड़े के पैकेट थमाकर, चंद सिक्के देकर फर्ज को झटक कर सरकार से जोड़ देते हैं।
किताबों के बजाय हाथ में कटोरा
एक तरफ गरीबी की चक्की में पिसते लोग हैं तो दूसरी ओर गरीबी को भी एक धंधा बना दिया गया है। इसमें बाकायदा वैसे दलाल शामिल हैं, जो अपहरण करते हैं और बच्चों को भीख मांगने के लिए तैयार करते हैं। इसमें उन्हें अपंग बनाने से लेकर सभी तरह के अत्याचार शामिल हैं। जिन बच्चों का अपहरण हो जाता है वे बच्चे कहां जाते हैं? क्या वे मानव तस्करों और गैरकानूनी अंग व्यापार करने वालों के हत्थे चढ़ जाते हैं?
लगभग पूरा भारत इस गिरफ्त में है। लेकिन सच यह है कि भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के चंगुल में फंस कर भीख मांगने पर मजबूर होते हैं। इनके पास किताबों के बजाय हाथ में कटोरा आ जाता है। लेकिन इसका कारण क्या है, शायद इसकी वजह जानने के लिए जिम्मेवारों ने...हमने, आपने कोशिश की हो।
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सच्चे प्रयासों की जरूरत
सच कहें तो इन मासूमों के लिए काम करने के दावों के बीच वादे खो गए। हां कई एनजीओ इन बच्चों के लिए काम करते हैं। पर काम की हल्की धुंध दिखती है लेकिन नाम से जमकर कमाई की जाती है। इस बीच मासूमियत को बचाए रखने के लिए वास्तव में प्रतिबद्ध लोगों के प्रयासों की भी सही मायने में गिनती नहीं हो पाती। न उनको इस बात का ईनाम मिल पाता है, न ही किसी तरीके से सहयोग ही।
सरकार के प्रयास भी निराधार प्रतीत होते हैं। जाहिर है, सरकार या गैरसरकारी स्तर पर की जाने वाली कोशिशें और इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं। खासतौर पर सरकार को भीख मांगना अपराध घोषित करना तो जरूरी लगता है, लेकिन इस समस्या की जड़ में जाकर इसे खत्म करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं होती। जरूरत है सच्चे प्रयासों की।
आपकी एक सेल्फी बना सकती है जिंदगी
जरा सोचिये अगर हम सड़क पर किसी बच्चे को भीख मांगते देखें और उसके साथ एक सेल्फी लेकर फेसबुक पर अपलोड कर दें। तो क्या हो? आपको इस सेल्फी के पीछे बेवकूफी नजर आ रही होगी, लेकिन सच तो यह है कि अगर #StopChildBegging के साथ तस्वीर सोशल मीडिया पर डालें, तो हर हाल में सरकार कदम बढ़ायेगी। उनके लिये कुछ करने की चाह में कोई तो खड़ा होगा ही।
जरूरत है वास्तविक प्रयासों की। ताकि भारत को इस बद्नुमे दाग के साथ न जाना जाए। मासूमों के भविष्यों पर राजनीति न हो, आंदोलनों का दिखावा न हो...प्रयास और प्रयास हों। इनके भविष्यों को सुरक्षित करने के लिए इन्हें काबिल बनाने के लिए।












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