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Giani Zail Singh: राष्ट्रपति एवं गृहमंत्री रहे ज्ञानी जैल सिंह, विवादों में रहा राजनीतिक जीवन

ज्ञानी जैल सिंह ने 1977 में पंजाब विधानसभा चुनाव हारने के बाद संजय गांधी को एक सलाह दी थी। उन्होंने अकाली दल को कमजोर करने के लिए दो सिख संतों के नाम संजय गांधी को सुझाए, जिसमें एक नाम जरनैल सिंह भिंडरावाले का था।

Remembering Giani Zail Singh President and Home Minister political life in controversies

Giani Zail Singh: पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का जन्म 5 मई 1916 को फरीदकोट-कोटकपूरा हाइवे के किनारे स्थित गांव संधवा में हुआ था। उनके पिता का नाम भाई किशन सिंह व मां का नाम इंद कौर था। वह उनकी चार संतानों में सबसे छोटे थे। इनका वास्तविक नाम "जरनैल सिंह" था। अमृतसर के शहीद सिख मिशनरी कालेज से गुरुग्रंथ साहिब का पाठ मुंह जबानी याद करने के कारण इन्हें ज्ञानी की उपाधि मिली थी।

जरनैल से जैल सिंह होने के पीछे भी एक किस्सा है। दरअसल 1938 में जरनैल सिंह ने प्रजा मंडल नामक राजनीतिक दल का गठन किया था। यह दल भारतीय कांग्रेस के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया करता था। इस मामले में फरीदकोट रियासत के राजा ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया। तब जेल में रहने के दौरान विरोध स्वरूप उन्होंने अपना नाम जैल सिंह रख लिया था।

ज्ञानी जैल सिंह ने सुझाया भिंडरावाले का नाम

1977 में पंजाब में विधानसभा चुनाव हारने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संजय गांधी को एक सलाह दी। उन्होंने दो सिख संतों के नाम संजय गांधी को सुझाए, जिसमें एक नाम जरनैल सिंह भिंडरावाले का था। कुलदीप नायर ने अपनी पुस्तक 'Beyond the Lines, An Autobiographyʼ में लिखा कि संजय के दोस्त व संसद सदस्य कमलनाथ याद करते हैं कि पहले संत से जब हम मिले तो वह कम साहसी दिखाई दिए। पर भिंडरावाला की आवाज में दम था और वह हमें काम का आदमी लगा। हम उसे कभी-कभी पैसे भी दिया करते थे लेकिन हमने यह नहीं सोचा था कि वह आंतकवादी बन जाएगा।

जीबीएसए संधू अपनी पुस्तक 'The Khalistan Conspiracy' में लिखते हैं कि संजय गांधी को जरनैल सिंह भिंडरावाले के धार्मिक कार्य में कोई रुचि नहीं थी। वह उसका इस्तेमाल सिख जनता को रिझाने और अकाली दल को सत्ता से हटाने के लिए करना चाहते थे। इसके बाद लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी की जीत के साथ ही तत्कालीन पंजाब सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। वहां विधानसभा के फिर से चुनाव हुए और इस बार कांग्रेस को बहुमत हासिल हो गया। इंदिरा गांधी ने ज्ञानी जैल सिंह के प्रतिद्वंदी दरबारा सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया और ज्ञानी जैल सिंह को केंद्र में गृहमंत्री का पद मिल गया।

दल खालसा और ज्ञानी जैल सिंह के संबंध

लोकसभा में 1 दिसंबर 1981 को 'Conspiracy against integrity of India' चर्चा के दौरान भाजपा के सदस्य सूरजभान ने तत्कालीन गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह पर आरोप लगाया कि चरमपंथी संगठन दल खालसा के मुखिया हरसिमरन सिंह के साथ उनके घनिष्ठ संबंध हैं। उन्होंने आगे बताया कि 1978 में चंडीगढ़ के अरोमा होटल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस पहले दल खालसा की तरफ से हुई और उसके थोड़ी देर बाद ज्ञानी जैल सिंह ने उस होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उन दोनों प्रेस कॉन्फ्रेंस का बिल उन्होंने दिया था।

सूरजभान के अनुसार ज्ञानी जैल सिंह जब गृह मंत्री बनने के बाद पहली बार चंडीगढ़ गए तो उसी हरसिमरन सिंह ने जो दल खालसा का मुखिया है उसने उनके लिए एक शानदार रिसेप्शन पंजाब यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में किया था। मार्क टुली और सतीश जैकब ने भी अपनी पुस्तक में लिखा कि ज्ञानी जैल सिंह का दल खालसा से लगातार संपर्क बना हुआ था। 1982 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने चंडीगढ़ के एक पत्रकार को फोन करके कहा था कि वह अपने समाचार पत्र में दल खालसा की खबरों को पहले पन्ने पर लगाया करें।

1981 में भिंडरावाले को बचाया

इस दौर में, केंद्र और राज्य दोनों स्थानों पर कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी पंजाब में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। खालिस्तानी चरमपंथी हर आए दिन किसी न किसी प्रमुख व्यक्ति की हत्या करते रहे और केंद्र की कांग्रेस सरकार के इशारे पर उन्हें रोकने की कोशिशों में अनिच्छा दिखाई देने लगी।

इसी बीच पंजाब केसरी अखबार के संस्थापक लाला जगत नारायण की भिंडरावाले के समर्थकों ने 9 सितंबर 1981 को हत्या कर दी। मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने डीआईजी ऑफ पुलिस डीएस मंगत को तुरंत हिसार जाकर भिंडरावाले को गिरफ्तार करने के आदेश दिए। कुलदीप नायर ने इस संदर्भ में लिखा कि ज्ञानी जैल सिंह ने हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल को फोन करके संदेश भेजा कि न उन्हें इस मामले में फंसना है और न ही भिंडरावाले को गिरफ्तार होने देना है। सतीश जैकब आगे की जानकारी देते हुए लिखते हैं कि इस एक फोन के बाद खुद भजनलाल ने अपने अधिकारियों को भिंडरांवाले को जितना संभव हो सके वहां तक सकुशल छोड़ने के आदेश दिए थे। इस प्रकार भिंडरांवाले को 300 किलोमीटर दूर अमृतसर में उसके गुरुद्वारे तक सुरक्षित पहुंचा दिया गया था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जैल सिंह की निष्क्रियता

अप्रैल 1982 में पंजाब के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह को पत्र लिखकर एक महत्वपूर्ण सूचना दी कि "200 आदमियों के साथ जनरैल सिंह भिंडरावाले अनलाईसेंस्ड (बिना परमिट के) हथियार लेकर दिल्ली आ रहा है।" पूर्व सूचना मिलने के बाद भी केंद्र सरकार ने उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। भिंडरावाले अपने समर्थकों के साथ तीन हफ्तों तक दिल्ली में रहा और कनॉट प्लेस सहित बाबा खड़क सिंह मार्ग पर अपने हथियारों के साथ खुलेआम घूमता रहता था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निष्क्रियता पर चौधरी चरण सिंह ने उन्हें पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने लिखा कि "इतने राजनीतिक महत्व की बात आपकी इत्तिला में न हो यह हो नहीं सकता। बकायदा अखबारों में खबरें छपती हैं लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं होती।" चरण सिंह ने प्रधानमंत्री गांधी को यहां तक लिख दिया कि आपने संत भिंडरावाले को हीरो बनाया है। गुरु नानक निवास के क्या मायने हैं? ठीक है, वह मंदिर है, क्या दुनिया के किसी मंदिर-मस्जिद अथवा गिरिजाघर में क्रिमिनल चला जाए तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता?

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