Rajasthan CM: 1980 के बाद 10 साल में कांग्रेस ने पांच मुख्यमंत्री बदले, पहली बगावत 1954 में ही हो गयी थी
राजस्थान में सत्तारूढ़ अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ कांग्रेस में ही गुटबाजी चल रही है। ऐसा ही पूर्व मुख्यमंत्रियों जयनारायण व्यास और भैरों सिंह शेखावत के साथ भी हो चुका है।

Rajasthan CM: अशोक गहलोत सरकार के विरोध में कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट फिर से बगावत पर उतर आए हैं। राजस्थान की राजनीति में आंतरिक कलह अथवा बगावत का यह कोई पहला मामला नहीं है। साल 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के करीबी जयनारायण व्यास को भी मुख्यमंत्री का पद गंवाना पड़ा था। तब उनके खिलाफ 38 साल के युवा नेता मोहनलाल सुखाड़िया ने बगावत की थी। हालांकि प्रधानमंत्री ने उस दौरान व्यास की सरकार बचाने की पूरी कोशिश की थी। मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इस समस्या के समाधान के लिए पार्टी के तत्कालीन महासचिव बलवंत राय मेहता को जयपुर भेजा गया। उनकी मौजूदगी में पार्टी विधायकों ने मतदान के माध्यम से नेता चुनने का फैसला लिया। इसके बाद विधायकों ने मतदान किया और सुखाड़िया विजयी रहे।
इसके बाद भी ऐसे कई मौके सामने आये जब मुख्यमंत्रियों को अपने पद को बचाने के लिए जोर-आजमाइश करनी पड़ गयी। इसमें कांग्रेस ही नहीं भाजपा के भी मुख्यमंत्री शामिल हैं। आइये आपको बताते है राजस्थान की इस रोचक राजनीति के बारे में। फिलहाल शुरुआत करते हैं मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही रस्साकशी से।
कहां से शुरू हुई कलह?
साल 2018 में जब से राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी है, तब से अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच गतिरोध बना हुआ है। चुनाव के बाद कांग्रेस आलाकमान ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया। दोनों नेताओं की खींचतान उसी समय से चली आ रही है।
इसके बाद राजस्थान में पहला बड़ा सियासी संकट जुलाई 2020 में आया, जब सचिन पायलट के साथ कांग्रेस के 19 विधायक गहलोत सरकार से समर्थन वापस लेकर हरियाणा के मानेसर में एक होटल में जाकर बैठ गये। बाकी बचे 80 कांग्रेसी विधायकों को मुख्यमंत्री गहलोत, जयपुर और जैसलमेर के लक्जरी होटलों में लेकर घूमते रहे। उस समय मुख्यमंत्री गहलोत ने लड़ाई को 80 बनाम 20 का बना दिया था और आज भी हालात कमोबेश यही बने हुए हैं।
इसके बाद तमाम आरोप-प्रत्यारोप और राजनैतिक उठापटक के बाद दिल्ली में प्रियंका गांधी ने बीच-बचाव कर सचिन पायलट और मुख्यमंत्री में सुलह करवाई। तब जाकर राजस्थान में कांग्रेस की मौजूदा सरकार बची। पायलट की वापसी तो कांग्रेस में हो गयी लेकिन उनको बगावत के नुकसान का दंश जरुर झेलना पड़ा।
दरअसल, इसके बाद पायलट के हाथ से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद चले गये और उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है। पायलट दो साल बाद भी न तो संगठन में कोई पद पा सके हैं और न ही राजस्थान की सत्ता में उनके लिए रास्ते खुल सके हैं। हालांकि, इस सुलह के बाद भी दोनों नेता कई बार सार्वजनिक मंचों पर जुबानी जंग लड़ते रहे हैं।
अब पायलट के पोस्टर से कांग्रेस के नेता गायब
वर्तमान में पायलट, भाजपा सरकार में हुए कथित भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री गहलोत को घेरने का प्रयास कर रहे है। उन्होंने अप्रैल में जयपुर में एक दिवसीय सांकेतिक अनशन किया और अब मई में अजमेर से जयपुर तक जनसंघर्ष यात्रा निकाल रहे हैं। गौरतलब है कि यात्रा में लगाये जा रहे पोस्टरों में सोनिया गांधी की तो तस्वीर है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तस्वीरें नहीं हैं। उनके अलावा पोस्टर के एक तरफ महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरें हैं। दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी की तस्वीरें हैं।
सीएम नहीं बन पाए थे मिर्धा
राजस्थान के इस वर्तमान संकट का नतीजा क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा। मगर सीएम की कुर्सी की इस खींचतान में इससे बड़ा हंगामा तब मचा जब 11 अक्टूबर 1973 को तत्कालीन सीएम बरकतुल्लाह खान (प्यारे मियां) का हार्ट अटैक से निधन हो गया। फिर हरिदेव जोशी को सीनियर होने के नाते कार्यवाहक मुख्यमंत्री बना दिया गया। अब सबकी नजर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर थी।
ऐसा कहा जाता है कि इंदिरा गांधी, हरिदेव को लेकर बहुत उत्साही नहीं थी। क्योंकि उन्हें याद था कि जब राष्ट्रपति के चुनाव के समय कांग्रेस दो फाड़ हुई थी, तब जोशी विरोधी खेमे में थे। इसलिए उन्होंने विधायकों को अपना नेता खुद चुनने को कहा। जबकि उनकी खुद की पसंद गृहराज्य मंत्री और सूबे के बड़े जाट नेता रामनिवास मिर्धा थे। गौरतलब है कि विधायक दल के नेता की वोटिंग में मिर्धा हार गये और जोशी 13 वोट से जीत कर राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गये।
कांग्रेस में मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा
1980 से 1990 तक के कालखंड में सबसे ज्यादा सीएम बदले गये। राष्ट्रपति शासन के बाद चुनावों में मार्च 1980 में कांग्रेस ने जगन्नाथ पहाड़िया को सीएम बनाया था। उनके काम करने के तरीके और ब्यूरोक्रेसी के फीडबैक के बाद आलाकमान ने जुलाई 1981 में उन्हें हटाकर शिवचरण माथुर को सीएम बना दिया। फिर फरवरी 1985 में भरतपुर में मानसिंह एनकाउंटर की घटना हुई। जाट समाज के आक्रोश को शांत करने के लिए आलाकमान ने शिवचरण माथुर को हटा दिया। उनकी जगह हीरालाल देवपुरा को कार्यवाहक सीएम बना दिया।
जल्दी ही, मार्च 1985 में हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पार्टी का विरोधी गुट लगातार जोशी के खिलाफ सक्रिय रहा। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जोशी को बुलाकर इस्तीफा ले लिया और असम का राज्यपाल बनाकर भेज दिया। इसके बाद, जनवरी 1988 में शिवचरण माथुर को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया। मगर लोकसभा चुनावों में हार के बाद सीएम शिवचरण माथुर को इस्तीफा देना पड़ा और हरिदेव जोशी को दिसंबर 1989 में फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया।
भाजपा में भी शेखावत का तख्तापलट करने का प्रयास?
भाजपा के भैरोंसिंह शेखावत भी इस सियासी घेराबंदी को झेल चुके थे। हालांकि, वह अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे थे। दरअसल, तब जनता दल के टिकट पर जीत कर आये भंवर लाल शर्मा ने 1996 में शेखावत सरकार के तख्तापलट के प्रयास किए थे। उस दौरान शेखावत अमेरिका में हार्ट का ऑपरेशन करवाने गये थे। इस बीच शर्मा ने राज्यमंत्री शशि दत्ता के साथ सरकार को गिराने की तैयारी कर ली थी। इसमें शर्मा ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भजनलाल की मदद ली थी।
तख्तापलट करने की इस साजिश की जानकारी करौली से निर्दलीय विधायक रणजी मीणा ने शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी तक पहुंचा दी। उस समय राजवी, शेखावत के साथ अमेरिका में थे। जैसे ही इस बात की जानकारी शेखावत को हुई तो वह अमेरिका से ऑपरेशन कराए बिना ही लौटे आये। शेखावत ने लौटने के बाद विधायकों और मंत्रियों को चौखी ढाणी में ले जाकर ठहरा दिया। करीब 15 दिन तक वे यहीं रुके रहे। इसके बाद विधानसभा में बहुमत सिद्ध किया।
1990 में धोखा मिला, इसलिए सरकार गिराने की साजिश रची
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भंवर लाल शर्मा का कहना था कि 1990 में केंद्र में तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार के समय राजस्थान में शेखावत सरकार को बचाने में उनका अहम योगदान था। इसी के चलते उपचुनाव में शेखावत ने राजाखेड़ा से चुनाव लड़ाने का आश्वासन दिया था। जब दूसरा उम्मीदवार तय कर लिया तो उन्हें ठेस पहुंची। इसी के चलते उन्होंने 1996 में शेखावत सरकार को गिराने का फैसला कर लिया था।












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