पुलवामा में देश के लिए जान देने वाले जवानों को जानिए क्यों नहीं मिल पाएगा शहीद का दर्जा?

पुलवामा। गुरुवार को पुलवामा में हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 44 जवानों का निधन हो गया है। इन जवानों को जम्‍मू कश्‍मीर के बडगाम में श्रद्धांजलि दी गई है। जवानों ने भले ही खतरनाक आत्‍मघाती हमले में अपनी जान देश के लिए गंवा दी हो लेकिन इसके बाद भी उन्‍हें सेना के जवानों की तरह शहीद कर दर्जा नहीं दिया जाएगा। आपको सुनकर थोड़ा अटपटा जरूर लगेगा लेकिन यही सच है कि सीआरपीएफ, बीएसएफ और सीआईएसएफ के अलावा कुछ और पैरा-मिलिट्री जवानों को ड्यूटी पर जान गंवाने के बाद भी शहीद का दर्जा नहीं मिलता है। आखिर क्‍या है इसकी वजह पढ़ें इस रिपोर्ट को और जानें।

सरकार कर रही है विचार

सरकार कर रही है विचार

पिछले वर्ष जुलाई में एक मामले सुनवाई के दौरान सरकार ने दिल्‍ली हाई कोर्ट से कहा था कि वह ड्यूटी पर तैनात अर्धसैनिक बलों के जवानों के निधन पर उन्हें शहीद का दर्जा देने पर विचार कर रही है। सरकार ने यह बात एक जनहित याचिका के जवाब में कही थी। इस याचिका में पैरामिलिट्री फोर्सेज के जवानों को आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के सैनिकों की तर्ज पर ही शहीद का दर्जा देने की मांग की गई थी। याचिका, एडवोकेट अभिषेक चौधरी की ओर से दाखिल की गई थी। चौधरी ने अपनी याचिका में कहा था कि पैरामिलिट्री फोर्सेज के जवानों को भी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के जवानों की तर्ज पर शहीद होने पर वही सुविधाएं मिलनी चाहिए।

क्‍यों नहीं मिलता शहीद का दर्जा

क्‍यों नहीं मिलता शहीद का दर्जा

चौधरी ने अपनी याचिका में यह दावा किया था कि पिछले 53 वर्षों में पैरामिलिट्री और पुलिस के 31,895 ने ड्यूटी पर अपनी जान गंवाई है। इस याचिका में यह भी कहा गया था कि पैरामिलिट्री और सेंट्रल फोर्सेज के जवानों ने कई ऑपरेशंस में अपनी जान देश के लिए गंवाई है। साल 2013 में राज्यसभा सांसद किरणमय नंदा ने इसी सिलसिले में सरकार से पूछा भी था कि पैरामिलिट्री फोर्सेज के जवानों को शहीद का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता है? क्या वो सेना, वायु सेना या नौसेना से नहीं होते है, ऐसा क्यों किया जाता है? जिसके जवाब में कहा गया था कि सरकार किसी जवान के साथ भेदभाव नहीं करती।

रक्षा मंत्रालय के पास नहीं है परिभाषा

रक्षा मंत्रालय के पास नहीं है परिभाषा

हालांकि ये भी माना गया था कि रक्षा मंत्रालय के पास कहीं भी 'शहीद' शब्द की परिभाषा नहीं है। साल 2016 में रक्षा मंत्रालय की ओर से दिल्‍ली हाई कोर्ट को बताया गया था कि 'शहीद' शब्‍द का प्रयोग तीनों सेनाओं के लिए नहीं किया गया था। साल 2015 में गृह राज्‍य मंत्री किरण रिजीजु ने भी लोकसभा में कहा था कि शहीद शब्‍द की कोई परिभाषा नहीं है। सरकार की ओर से कहा गया था कि सेना, नौसेना और वायुसेना में शहीद शब्‍द का प्रयोग बैटल कैजुअलिटी और फिजिकल कैजुअलिटी के लिए होता है। शहीद शब्‍द का प्रयोग तीनों सेनाओं में प्रयोग नहीं किया गया है।

शहीद जैसा कोई शब्द नहीं

शहीद जैसा कोई शब्द नहीं

कोर्ट के मुताबिक, 'शहीद' जैसा कोई शब्द नहीं है और न ही रक्षा मंत्रालय ने ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले जवानों को 'शहीद' करार देने का आदेश या अधिसूचना है। इस तर्क के साथ जनहित याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार इस संबंध में कोई निर्देश जारी करे, यह जरूरी नहीं है।कोर्ट ने कहा कि देश के लिए जान गंवाने वाले को हर कोई याद करता है। उसके लिए यह पहचान गर्व की बात है और इससे ज्यादा कुछ भी जरूरी नहीं है।

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