...तो नेशनल डिमॉलिश अलायंस बन जायेगा एनडीए
समय का पहिया जब घूमता है तो उसके आगे सभी को विवश होना पड़ता है। पहले तो कहा जा रहा था कि लोकसभा चुनाव 2014 में भारतीय जनता पार्टी अपने सभी दागी नेताओं से कोसों दूर रहेगी लेकिन उम्मीदवार सूची को देखने के बाद हकीकत जनता के सामने आ ही गई। जिस रफ्तार से भारतीय जनता पार्टी दलबदलुओं और दागी नेताओं से भरे छोटे दलों को अपने साथ जोड़ रही है, उससे एक आशंका उभर कर सामने आ रही है, वो है- एनडीए नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस की जगह भाजपा के लिये नेशनल डिमॉलिश अलायंस न बन जाये!
भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाते हुए आम चुनाव में पार्टी का लक्ष्य साफ कर दिया दिया था। कांग्रेस हटाओ देश बचाओ का नारा जनता के सामने लाने के बाद यह भी समझना आसान हो गया कि भाजपा अगर बहुमत में नहीं आती है तो गठबंधन करने से भी कोई परहेज नहीं। गठबंधन होने के बाद अगर सरकार बनती है तो भाजपा को इसका नकारात्मक प्रभाव भी झेलना पड सकता है। लेकिन इसके नकारात्मक प्रभाव से पार्टी अछूती नहीं रहेगी।
देश के लगभग सभी राज्यों में केंद्र सरकार से ज्यादा बोलबाला क्षेत्रीय पार्टियों का रहने लगा है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य हैं। आम चुनाव में इन राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां सरकार बनाने और बिगाडने में एक अहम भूमिका निभाती हैं।
बात अगर उत्तर प्रदेश की हो तो सपा और बसपा को कतई नहीं नजरंदाज किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही हाल तमिलनाडु का है जहां डीएमके एवं एआएडीएमके पूरी तरह से अपने पैर जमा चुका है। अब यह कहना कतई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए गठबंधन करना एक तरह से अनिवार्य हो गया है। हाल ही में हुए सर्वे भी यही बताते हैं कि केंद्र की सरकार गठबंधन किए बिना नहीं बन सकती।
वर्ष 2004 से देश की आम जनता ने भाजपा को लगातार अगले 10 सालों तक सत्ता में नहीं आने दिया। लेकिन कांग्रेस की दिनोंदिन बिगडती छवि और करोडों के घोटालों के खुलासे के बाद एक बार फिर भाजपा केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिए सबसे वर्तमान में सबसे सशक्त मानी जा रही है। वर्ष 2004 के बाद से नई दिल्ली की कुर्सी पर न बैठ पाने का विषय कहीं न कहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को आम चुनाव २०१४ में गठबंधन के लिए विवश कर सकती है। हाल ही में हुए ओपीनियन पोल सर्वे के आंकडे भी यहां बयां कर रहे हैं। ऐसे में अगर भाजपा गठबंधन कर सत्ता में आती है तो उसके कुछ फायदे और नुकसान दोनों पहलुओं का सामना भाजपा को करना पड सकता है।
इस समय गठबंधन के नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव देखें स्लाइडर में-

सकारात्मक प्रभाव- केंद्र में मिलेगा मौका
गठबंधन हुआ तो सबसे पहले भाजपा को केंद्र की सत्ता में आने का अद्भुत मौका मिलेगा।

छवि सुधारने का मौका
वर्ष 2014 के आम चुनाव में गठबंधन करने के बाद यदि भाजपा अपनी सरकार बनाती है तो प्रधानंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी समेत अन्य भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारने का एक अच्छा मौका मिलेगा।

मिट सकेंगे दंगों के दाग
गठबंधन के साथ अगर भाजपा की सरकार केंद्र में आती है तो तो आम जनों और खासकर मुस्लिम वर्गों में व्याप्त गुजरात दंगे कही कुंठा को एक हद तक मिटाया जा सकेगा।

कट्टर छवि से ऊपर उठेगी
नरेंद्र मोदी ने अभी तक अपने भाषण में एक बार भी हिंदुत्व और राम मंदिर जैसे पुराने मुद्दों को जनता के सामने नहीं लाया है। मोदी तो यह भी कह चुके हैं कि यदि पार्टी सरकार बनाती है तो सभी जाति और धर्म को एकसाथ लेकर विकास करेगी। ऐसे में यदि गठबंधन के बाद भाजपा की सरकार बनती है तो हिंदुत्व और राम मंदिर जैसी कट्टर छवि को पार्टी सुधारने में कामयाब होगी।

राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान की भरपायी होगी
वर्ष 2004 में सत्ता से जाने के बाद भाजपा को राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर काफी नुकसान हुआ। ऐसे में अगर गठबंधन के साथ भाजपा केंद्र में आती है तो पार्टी के अंदर एक बार फिर एकजुटता का रस फैलने की संभावना है और पार्टी एक मजबूत स्थित में अपना भ्विष्य देख सकती है।

नकारात्मक प्रभाव- पार्टी की छवि
गठबंधन किए जाने के साथ ही एक बात यह भी तय हो गई है कि भाजपा ने केंद्र की सत्ता को पाने के लिए एक बार फिर से दागी नेताओं से हाथ मिला लिया है। इस बात का बुरा प्रभाव पार्टी पर पड सकता है।

नकारात्मक- बिना पेंदी का लोटा बन जायेगी भाजपा
गठबंधन की सरकार बिना पेंदी के लोटा वाली कहावत को सिद्ध करती है। गठबंधन का सबसे बुरा प्रभाव भाजपा को यह भी हो सकता है कि कभी भी कोई पार्टी अपना समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा सकती है।

किनारे लग जायेंगे विचार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि भाजपा विचारों की पार्टी है लेकिन गठबंधन के बाद अन्य क्षेत्रीय दलों का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाएगा जिसे पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है।

पार्टी में असंतोष
गठबंधन की खबर सामने आने के साथ ही भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता पार्टी के ही सदस्यों के विचारों से असंतुष्टि जताने लगे हैं। गठबंधन का एक सबसे बडा खमियाजा भाजपा को यही हो सकता है कि विचारों का मतभेद एक बार फिर से पार्टी के अंदर पैदा होने की संभावना बढ गई है।

फिर हो सकता है भ्रष्टाचार
गठबंधन करने के बाद अगर केंद्र की सत्ता पर काबिज पर रहना है तो पार्टी में शमिल होने वाले दागी नेताओं को एक बार फिर से भ्रष्टाचार करने का खुला मौका मिलेगा।

गठबंधन का महत्व
पिछले दस सालों से केंद्र की सत्ता में कांग्रेस अगर विराजमान है तो वो गठबंधन की वजह से? कहा तो यह भी जाता है कि कुछ राजनीतिक पार्टियां गठबंधन का इस्तेमाल सत्ता में रहने के लिए करती हैं तो कई राजनीतिक पार्टियां इसका इस्तेमाल सत्ता में रहकर अपने विचारों के साथ देश का विकास करने के लिए करती हैं। इतिहास तो यही कहता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा पूरे देश में इमरजेंसी लगाने के बाद केंद्र की सत्ता गठबंधन के ही पालने में पल-बढ़ रही है।












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