Mid Term Poll: क्या देश में समय से पहले होंगे लोकसभा चुनाव? जानिए इंदिरा गांधी से जुड़ा वह किस्सा
Mid Term Poll: लोकसभा चुनाव 2024 में एक साल से भी कम समय बचा हुआ है। इसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियां जोर-शोर से तैयारियों में जुटी हैं। इसी बीच 23 जून को पटना में सभी विपक्षी दलों की बैठक बुलाई गयी है। इस बैठक से पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक बड़ा बयान सामने आया, जिसके बाद से सियासी गलियारों में तय समय से पहले लोकसभा चुनाव होने की चर्चाएं गरम हो गई हैं।
नीतीश कुमार ने कहा कि देश में इसी साल लोकसभा चुनाव हो सकते हैं। देश में कब चुनाव होंगे, कोई नहीं जानता है, लेकिन जैसी स्थिति बनी है उससे लगता है कि यह किसी भी समय हो सकते हैं। हालांकि, बिहार के सीएम का यह बयान तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के बयान के बाद आया है। उन्होंने कहा था कि बीजेपी कर्नाटक में हार के चलते लोकसभा चुनाव की घोषणा समय से पहले कर सकती है।

अब यहां सवाल उठता है कि क्या इससे पहले कभी पूर्ण बहुमत से चुनी हुई सरकार ने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव करवाया था? सबसे पहले देश में इंदिरा गांधी की सरकार ने मध्यावधि चुनाव करवाया था। जानें क्यों और किन परिस्थितियों में इंदिरा गांधी ने करवाया मध्यावधि चुनाव?
इंदिरा गांधी ने करवाया था समय से पहले चुनाव
अप्रैल 1967 में चौथा लोकसभा चुनाव पूर्व की राजनीतिक गतिविधियों से गुजर रहा था। क्योंकि 11 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया। इसके बाद प्रधानमंत्री का पद खाली हो गया। उस दौरान इंदिरा गांधी के पास सूचना व प्रसारण मंत्री का कार्यभार था।
1966 में इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाने में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका पुराने कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई ने कड़ा विरोध किया था, इसके बावजूद इंदिरा गांधी 24 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री बनीं। वास्तव में यह समय कांग्रेस के लिए सबसे अच्छा नहीं था।
इन समस्याओं से जूझ रहा था देश
पार्टी आंतरिक संकटों से जूझ रही थी और देश हाल में लड़े गए दो युद्धों के प्रभाव से उबर रहा था। अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ था और मनोबल काफी गिरा हुआ था। जिन अन्य मुद्दों ने लोकसभा को हिलाकर रख दिया था, उनमें मिजो आदिवासी बगावत, अकाल, श्रमिक अशांति और रुपए के अवमूल्यन के मद्देनजर गरीबों की बदहाली शामिल थी। वहीं पंजाब में भी भाषायी और धार्मिक अलगाववाद के लिए आंदोलन तेजी से जोर पकड़ रहा था। जिस कांग्रेस ने अब तक के लोकसभा चुनावों में 73 प्रतिशत से कम सीटें नहीं जीती थीं, आने वाला समय उसके लिए और बुरा साबित होने वाला था।
विधानसभा में हारे 6 राज्य पर लोकसभा जीते
कांग्रेस के आंतरिक संकट की वजह से 1967 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 283 सीटें ही जीत पायी थी। आजादी के बाद से 1967 तक पार्टी ने विधानसभा चुनावों में भी कभी 60 प्रतिशत से कम सीटें नहीं जीती थीं। यहां भी कांग्रेस को एक बड़ा झटका सहना पड़ा, क्योंकि बिहार, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब और पश्चिम बंगाल में गैर-कांग्रेसी सरकारें स्थापित हो गईं थीं।
मोरारजी देसाई ने की बगावत
13 मार्च, 1967 को प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी ने शपथ ली। पार्टी के अंदर असंतुष्ट आवाजों को शांत करने के लिए उन्होंने मोरारजी देसाई को भारत का उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री पद दिया। लेकिन, मोरारजी देसाई वरिष्ठ कांग्रेसी नेता होने के कारण अनुभवहीन इंदिरा गांधी को राजनीतिक रूप से उतना महत्व नहीं देते थे। इसलिए इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लोकसभा व विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन को लेकर मोरारजी देसाई मुखर होकर बोलने लगे। इसके बाद इंदिरा गांधी के हर फैसले पर अड़ंगा भी लगाने लगे। इसके बाद पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ा और कांग्रेस ने 12 नवंबर 1969 को 'अनुशासनहीनता' के लिए उन्हें निष्कासित कर दिया।
दो भागों में बंटी कांग्रेस
इस घटना ने कांग्रेस को दो भागों में बांट दिया। कांग्रेस (ओ) यानि ऑर्गेनाइजेशन, जिसका नेतृत्व मोरारजी देसाई ने किया और दूसरा कांग्रेस (आई) यानि इंदिरा, जिसका नेतृत्व इंदिरा गांधी कर रही थीं। इसके बाद इंदिरा गांधी ने सरकार चलाने के लिए दिसंबर, 1970 तक सीपीआई (एम) के समर्थन से एक अल्पमत वाली सरकार चलायी। लेकिन, इंदिरा गांधी अल्पमत की सरकार नहीं चलाना चाहती थीं क्योंकि उन्हें सरकार गिरने का डर था। इसलिए उन्होंने चुनावों की अवधि से एक साल पहले मध्यावधि लोकसभा चुनावों की घोषणा कर दी। इसके साथ ही देश अपने पांचवें आम चुनावों के लिए तैयार था।
283 से सीधा 352 सीटें जीत गयी
इसके बाद साल 1971 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भारी बहुमत से जीत दिलाई। 'गरीबी हटाओ' (गरीबी को खत्म करो) के चुनावी नारे के साथ प्रचार किया। इंदिरा गांधी ने लोकसभा में 352 सीटों के साथ संसद में वापसी की। पिछले चुनावों की 283 सीटों के मुकाबले उनके नेतृत्व में यह उल्लेखनीय सुधार था।












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