Last Rites by Women: समय के साथ बदलाव, अब महिलाएं भी देती हैं चिता को मुखाग्नि और करती हैं कपाल क्रिया
भारतीय वेद-पुराण और शास्त्रों में महिलाओं का श्मशान में जाना वर्जित माना गया है। हाल ही में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निधन पर महिलाओं ने अंत्येष्टि में भाग लिया।

Last Rites by Women: माना जाता है कि जिस व्यक्ति का जन्म जिस धर्म में होता है, उसका अंतिम संस्कार भी उसी के अनुसार ही करना चाहिए। अंतिम संस्कार का हर धर्म में बहुत महत्व है। इसीलिए अलग-अलग धर्मों में निधन के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया अलग होती है। फिर भी कुछ धर्मों में कुछ-कुछ समानताएं रहती हैं। ईसाई और मुस्लिम समुदायों में शव को दफनाने का रिवाज है। वहीं, पारसी और बौद्ध धर्म में शव को चील और गिद्ध जैसे मांसाहारी पक्षियों का भोजन बनने के लिए छोड़ दिया जाता है। हिंदू और सिख धर्म में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में काफी समानताएं हैं। दोनों धर्मों में शव का दाह-संस्कार किया जाता है।
हिंदू और सिख धर्म में दाह संस्कार की प्रथा एक
सिख और हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया काफी मिलती-जुलती है। दोनों धर्म में शव का दाह संस्कार किया जाता है। हालांकि हिंदू धर्म में जहां महिलाएं श्मशान घाट नहीं जा सकती हैं, वहीं सिख धर्म में महिलाओं को श्मशान घाट जाने की छूट है। क्योंकि गुरु गुरुनानक देव ने महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा दिया है। गुरुजी ने कहा कि "सो क्यों मंदा आखिए, जित जन्मे राजान।" यानी उन महिलाओं को क्यों बुरा कहें, जो राजाओं और शूरवीरों, सब को पैदा करती हैं।
इसके अलावा दोनों ही धर्म में किसी के निधन के बाद शव को नहलाना, नए वस्त्र धारण कराना और उसके बाद में अंतिम संस्कार किया जाता है। दोनों ही धर्मों में मृतक का कोई करीबी ही शव को मुखाग्नि देता है। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि अगर पिता या माता की मृत्यु होने पर बड़ा पुत्र उनको मुखाग्नि व कपाल क्रिया करता है तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। मुखाग्नि की वैदिक परंपरा हिंदू और सिख धर्म में देखी जा सकती है।
ऋग्वेद में महिलाओं को अधिकार, बाद में लगा अंकुश
ऋग्वेद में महिलाओं को युद्ध में भाग लेने तथा संपत्ति ग्रहण करने की स्वतंत्रता दी गई थी। अगर ऋग्वेद के पंचम, षष्ठम वशों का विश्लेषण करें तो यहां महिलाओं के लिए कई तरह के कार्य नियत किए गए हैं। किंतु उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथों का अध्ययन करने पर महिलाओं की अवनत होती अवस्था का निदर्शन होता है। स्मृतियों के काल में महिलाओं के लिए कई तरह के निषेध नियम आरोपित किए गए।
महर्षि याज्ञवल्क्य तथा गार्गी संवाद में ऋषि का रुष्ट होकर गार्गी को चेतावनी देना यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तत्कालीन समाज में महिलाओं की स्थिति दयनीय होनी शुरू हो चुकी थी। उन्हें शास्त्रार्थ करने का अधिकार नहीं रह गया था तथा भूमि पर से भी उनका अधिकार छीन लिया गया था।
गरुड़ पुराण में भी स्पष्ट उल्लेख नहीं
किसी भी इंसान के जीवन-मरण सम्बंधित प्रक्रियाओं का उल्लेख 18 पुराणों में से एक गरुड़ पुराण में मिलता है। यह एक प्राचीन हिंदू शास्त्र है जो वेदों की परंपरा का ही हिस्सा है। हालांकि, इस ग्रंथ में महिलाओं और दाह संस्कार जैसी किसी व्यवस्था का जिक्र नहीं है। इसलिए जाहिर तौर पर, गरुड़ पुराण या उस मामले के लिए कोई भी अन्य धार्मिक ग्रंथ, महिलाओं को दाह संस्कार करने से स्पष्ट रूप से मना नहीं करता है।
नारी का मन कोमल इसलिए श्मशान वर्जित
बुद्ध कालीन भारत में महिलाओं के लिए निषेध नियम कठोर होने लगे थे। बाद के कालों में सबसे बड़ी बात शव के अंतिम संस्कार के अधिकार से जुड़ी जब स्त्री को इसके लिए वर्जित घोषित कर दिया गया। इसके पौराणिक व वैदिक साक्ष्य तो नहीं है कि कब ऐसा किया गया किंतु स्मृतिकारों ने इस पर अधिक बल दिया कि स्त्री को श्मशान का रुख नहीं करना चाहिए। हालांकि सामाजिक तौर पर ऐसा किए जाने के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि नारी मन से कोमल होती है, इसलिए उसके हृदय पर इसका विपरीत प्रभाव न पड़ सके जिस कारण ऐसा विधान किया गया।
श्मशान घाट में हमेशा नकारात्मक ऊर्जा का डर
भारतीय परिवारों में एक बच्चे की अवधारणा ने मुखाग्नि का स्वरूप बदला है। अनेक परिवारों में एक ही बच्चा (लड़का या लड़की) होता है। ऐसे में आधुनिक दौर में अब महिला या लड़की भी मुखाग्नि दे रही है। हालांकि अनेक साधु, संत, शंकराचार्य और धर्म शास्त्र इस प्रक्रिया को शास्त्र के अनुरूप नहीं मानते, उनका मानना है कि अगर महिला या लड़की मुखाग्नि देती है तो उस आत्मा को सद्गति की प्राप्ति नहीं होती। श्मशान में हमेशा नकारात्मक ऊर्जा होती है। नकारात्मक ऊर्जा से उनके अंदर बीमारी फैलने की संभावना ज्यादा होती है। महिलाओं का मन कमजोर और कोमल होता है। श्मशान में जो दृश्य होते हैं उसको देखकर वह अपने आपको विलाप करने से नहीं रोक पाती हैं। जिससे मृत आत्मा को भी दुख होने लगता है। इस कारण से भी महिलाएं श्मशान में नहीं जाती।
महिलाओं का मुंडन कराना शुभ नहीं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार में परिवार के सदस्यों को अपने बाल कटवाने पड़ते हैं और शव के जलते समय वातावरण में कीटाणु फैल जाते हैं और शरीर के हिस्सों में चिपक जाते हैं। इसलिए श्मशान में बाल कटवाने के बाद स्नान किया जाता है। जबकि महिलाओं के मुंडन को शुभ नहीं माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि श्मशान घाट पर मृत आत्माएं भटकती रहती हैं ऐसे में महिलाओं के शरीर में इन आत्माओं के प्रवेश होने की संभवानाएं सबसे ज्यादा रहती है। इसलिए श्मशान में महिलाओं के जाने पर पाबंदी होती है।
इसके अलावा ऐसा कहा जाता है कि शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने के बाद पूरे घर की सफाई की जाती है, जिससे कोई भी नकारात्मक शक्ति घर में न रह सके। इसलिए घर की साफ-सफाई और अन्य घरेलू कामों के लिए औरतों को घर में रोका जाता है। अंतिम संस्कार के बाद पुरषों का घर में प्रवेश स्नान के बाद ही होता है।
जीवन का अंतिम 16वां संस्कार है अंत्येष्टि
पितृमेध या अन्त्यकर्म या अंत्येष्टि या दाह संस्कार, यह हिंदू धर्म संस्कारों में षोडश अर्थात् 16वां अंतिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात वेदमंत्रों के उच्चारण द्वारा किए जाने वाले इस संस्कार को दाह-संस्कार, श्मशानकर्म तथा अन्त्येष्टि-क्रिया आदि भी कहते हैं। इसमें मृत्यु के बाद शव को विधिपूर्वक अग्नि को समर्पित किया जाता है। केवल संन्यासी-महात्माओं के लिए निरग्रि होने के कारण शरीर छूट जाने पर भूमिसमाधि या जलसमाधि आदि देने का विधान है।
समय के साथ अंतिम संस्कार में महिला भागीदारी बढ़ी
बदलते समय और छोटे परिवार की अवधारणा ने अब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया मुखाग्नि व अन्य क्रिया कर्म को नया रूप दे दिया गया है। उसी का परिणाम है कि बदलते दौर में महिला या बालिका द्वारा मुखाग्नि देना आम होता जा रहा है। सोशल मीडिया के बढ़ते सामाजिक प्रभाव के बाद यह परिपाटी सामान्य होती जा रही है। महिला सशक्तिकरण, एकल परिवार, महानगर की संस्कृति, रिश्तों में दरार व असहयोग की भावना इसके लिए विशेष तौर पर जिम्मेवार हैं। इसके अलावा मीडिया में आने की चाह, आधुनिकता और अलग दिखने की धारणा ने भी इसको बढ़ावा देने में महती भूमिका निभाई है। बीते डेढ़ दशकों में इस व्यवस्था को चुनौती देने, व्यावहारिक बनाने वाली दर्जनों नजीरें इसी भारतीय परंपरागत व्यवस्था में सामने आई है।
अब समाज में महिला पंडित व पुजारी का भी प्रचलन
महिलाएं मुखाग्नि या अंतिम संस्कार कर सकती है या नहीं कर सकती है, इन सब सवालों को पीछे छोड़ते हुए आज की महिला पुरुषों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में भी दखल देने लगी है। आज अनेक शहरों में महिला पंडित व पुजारी देखी जा सकती हैं। केरल में तो अयंगर महिलाएं जनेऊ धारण करती है और सभी धार्मिक अनुष्ठान कराती हैं। हाल फिलहाल महिलाएं निधन के बाद होने वाले कर्मकांड नहीं कराती। लेकिन अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में श्मशान में महिला क्रियाकर्म, अंतिम संस्कार के बाद होने वाले एकादशा, बारहवां, त्रयोदशी, अष्टोद व वर्षीय के कार्यक्रम कराते हुए भी मिल जाएगी। राजस्थान के जोधपुर शहर में तो एक महिला श्मशान का भी संचालन करती है, जब कपाल क्रिया के बाद सभी परिजन चले जाते हैं तो वह शव के पूरे दहन की प्रक्रिया संपन्न करती है, ऐसे उदाहरण अनेक शहरों में भी मिल जाएंगे।
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