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Vulture Population: जानें क्या महत्त्व है पर्यावरण बचाने में गिद्ध का, कैसे इन्हें बचा रही है सरकार

भारत में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट देखने को मिली है। जिसके चलते प्रकृति के इको-सिस्टम पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। हालांकि भारत सरकार गिद्दों के संरक्षण की एक योजना पर काम कर रही है जिसके नतीजे अभी आने बाकी हैं।

know what importance of vultures in saving the environment

Vulture Population: एक मीडिया समूह से बातचीत करते हुए बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सहायक निदेशक सचिन रानाडे ने बताया कि 80 के दशक में भारत में लगभग चार करोड़ गिद्ध थे लेकिन वर्तमान में मुश्किल से चार लाख गिद्ध ही बचे हैं। उन्होंने बताया कि 1980 के बाद से भारत में गिद्दों की आबादी में 99 प्रतिशत की गिरावट एक बड़ी चिंता का विषय है। गौरतलब है कि एक जमाने में भारत दुनिया में सबसे ज्यादा गिद्दों की आबादी वाला देश था।

गिद्दों का धार्मिक महत्व

गिद्दों का हिन्दुओं सहित दुनिया के अन्य धर्मों में ऐतिहासिक जिक्र मिलता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार रामायण काल में जब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता की तलाश में भटक रहे होते है तो उनकी मुलाकात जटायु से होती है। यह जटायु एक विशालकाय गरुड़ या गिद्ध ही थे। जटायु ने ही माता सीता को रावण से बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।

इसी तरह पारसी धर्म में जब किसी इंसान का निधन होता है तो उसके शव को टावर ऑफ साइलेंस नाम की एक जगह पर छोड़ दिया जाता है। जहां पहले से मौजूद गिद्ध उस शव को खा जाते हैं। आपको बता दें कि भारत में ऐसे कई टावर ऑफ साइलेंस है। मगर गिद्दों की विलुप्त होती आबादी के चलते पारसियों ने कई टावर ऑफ साइलेंस में शवों को रखना बंद कर दिया है।

गिद्ध और उनकी पर्यावरण में भूमिका

भारत में गिद्धों की तीन सबसे प्रमुख प्रजातियां पायी जाती है। जिसमें सफेद पूंछ वाले गिद्ध, लंबी चोंच वाले गिद्ध और पतली चोंच वाले गिद्ध शामिल हैं। इसके अलावा भारत में मिस्र के गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, हिमालयी गिद्ध, लाल सिर वाले गिद्ध, ग्रिफॉन गिद्ध और दाढ़ी वाले गिद्ध भी पाये जाते हैं।

यह गिद्ध सदियों से प्रकृति के इको-सिस्टम का हिस्सा रहे हैं। दरअसल, यह मरे हुए जानवरों के सड़े मांस को खाकर जीवित रहे हैं। जिससे पर्यावरण को साफ रखने में सहायता मिलती है। मगर इनकी घटती आबादी के चलते जानवरों की सड़ चुकी लाश से किसी बीमारी अथवा महामारी फैलने का खतरा बना हुआ है। किसी भी सड़ी हुई लाश में कई तरह के खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया होते हैं। इन लाशों को जब इंसानों के आसपास रहने वाले जीव जैसे चूहे और और कुत्ते खाते हैं तो उन खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया का खतरा इंसानों में भी पैदा हो जाता है।

गिद्धों की आबादी में कमी के कारण

भारत में गिद्धों की आबादी में गिरावट मुख्य रूप से डाइक्लोफिनेक नाम के एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लैमेटरी ड्रग (एनएसएआईडी) के कारण आई है। डाइक्लोफेनाक का इस्तेमाल मवेशियों में सूजन और दर्द के इलाज के लिए किया जाता था। जब एक स्टडी में पता चला कि गिद्ध अगर डाइक्लोफेनाक वाले मवेशियों के शवों को खाते हैं तो इसका असर उनकी किडनी पर पड़ता है, जिसके चलते उनकी मौत हो जाती है।

इसके अलावा, खेती में प्रयोग होने वाले कीटनाशक भी गिद्दों के लिए एक बड़ा खतरा बन गए हैं। दरअसल, भारत में क्लोरीनयुक्त हाइड्रोकार्बन डी.डी.टी. (डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राईक्लोरोइथेन) का प्रयोग किया जाता है। खेती से शुरू होकर यह कीटनाशक खाद्य श्रृंखला के जरिये गिद्दों के शरीर में प्रवेश करता है। नतीजतन गिद्दों के अंडकोश कमजोर हो जाते हैं।

साथ ही, गिद्धों को जंगलों की तेजी से कटाई और जंगलों में बढ़ रही इंसानी आबादी भी गिद्दों के लिये एक खतरा बन चुकी है। वहीं, जंगली शिकारी भी आमतौर पर जंगली पशुओं के चमड़े, दांत, कस्तूरी और सींग निकालने के लिए जहरीले अवयवों का सहारा लेते हैं। जब जहरीला भोजन खाकर मरने वाले पशुओं के शवों को गिद्ध खाते हैं तो वे भी मर जाते हैं।

भारत सरकार के प्रयास

भारत सरकार ने गिद्धों की आबादी को बढ़ाने के लिए कई प्रयास शुरू किये हैं। नवंबर 2020 में भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वल्चर कंजर्वेशन प्लान 2020-2025 की घोषणा की थी। प्लान का मुख्य मकसद देश में गिद्धों की गिरती संख्या को रोकना और मौजूदा गिद्धों की सुरक्षा करना था।

इसके तहत सरकार ने डाइक्लोफेनाक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और वैकल्पिक दवाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया है जो गिद्धों के लिए नुकसानदायक नहीं है। हालांकि, सरकार द्वारा डाइक्लोफिनेक पर प्रतिबंध के बावजूद इसका अवैध रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसके अलावा देश के विभिन्न भागों में गिद्ध प्रजनन केंद्र और संरक्षण कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं। ये केंद्र गिद्धों के प्रजनन और उनके पालन-पोषण के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करते हैं। एक बार जब गिद्ध ठीक हो जाता है या फिर उड़ने की स्थिति में होता है तो उसे वापस जंगल में छोड़ दिया जाता है। सरकार ने विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में गिद्ध संरक्षण क्षेत्र बनाए हैं, जहां वे मानवीय गतिविधियों से डरे बिना भोजन और प्रजनन कर सकते हैं।

गिद्धों का भारत में भविष्य

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) द्वारा 2019 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में सफेद पूंछ वाले गिद्ध, लंबी चोंच वाले गिद्ध और पतली चोंच वाले गिद्धों की आबादी में थोड़ी वृद्धि हुई हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार भारत में अभी गिद्धों की आबादी प्रचुर होने में समय लगेगा। तबतक सरकारों, संरक्षण संगठनों और स्थानीय समुदायों सहित नागरिकों को ठोस प्रयास करने होंगे। रिपोर्ट्स बताती है कि सरकार जो प्रयास कर रही है यदि ये प्रयास जारी रहते हैं तो इससे देश में गिद्धों की आबादी बढ़ सकती है।

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