अनुभव: बिना रोशनी की ये आंखे सिखा देती है इंसानियत

नयी दिल्ली। आज के इस आधुनिक और भागम भाग वाले युग में, जहां किसी के पास फुर्सत से एक पाल सांस लेने तक का वक्त नहीं है, वहां मानवता शब्द बेमाने लगने लगते है। इंसानियत जैसी भावनाएं अब केवल किताबों तक ही सिमट कर रह गई है, लेकिन कई बार हमारे साथ बीत जाता है जो हमें जिंदगी से रूबरू करवा देती है। बैंगलोर के ब्लाइंड स्कूल के एक दिन से सफर की ये कहानी आपको एकबार फिर ने जिंदगी के असली मायने सिखा जाएगी।

Journey of a blind school: The Blind Make Us Human

दिव्या के बैंगलोर के इस ब्लाइंड स्कूल के बच्चों के साथ जब सफर पर निकली तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि ये सफर उन्हें इतना कुछ सिखा जाएगा। ब्लाइंड स्कूल के बच्चों और 6 टीचरों के साथ दिव्या लालबाग गार्डेन पहुंची। रास्ते भर वो बच्चों के भावों को, उनकी खुशियों को निहारती रही। स्कूल ने बाहर निकलकर ये नेत्रहीन बच्चे मानो खिल गए हो। रास्ते भर जितनी भी गाड़ियां बगल से गुजरती उन्हें कभी वो हाथ हिलाकर आकर्षित करते या फिर तरह-तरह के चेहरे बनाकर बाहर की दुनिया को अपने मन की आंखों से महसूस करने की कोशिश करते ।

कैब जब लालबाग गार्डन पहुंची बच्चों की खुशियों का ठिकाना नहीं रह गया था। वो जल्द से जल्द पहाड़ी की ऊंचाई तक पहुंचना चाहते थे। टीचर्स की मदद और एक-दूसरे के कंधे को थामे बच्चे लालबाग गार्डन की पहाड़ी पर पहुंच गए। आंखों से ना देख पाने का ये दर्द यहां झलक गया। बच्चे अपने टीचर्स से पूछने लगे कि वहां से नजारा कैसा दिखता है? आसमान कैसा दिख रहा है? दिव्या ने बच्चों को वहां का अनुभव शब्दों में बयां किया। 400 एकड़ में बने इस गार्डन में घंटे-दो घंटे रहने के बाद बच्चों को नीचे उतरने को कहा गया, कतारें बनाई गई, लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं। वो कहां किसी की सुनने वाले थे। दौड़ते-भागते वो पहाड़ी से नीचे उतरें। नीचे उतरे ही थे कि एक फोटोग्राफर ने दिव्या के हाथों में 200 रुपए थमा दिए। दिव्या ने आश्चर्य के साथ उसे देखा और पूछा तो उसने बस इतना कहा कि उसके पास इसके अलावा इन बच्चों को देने के लिए कुछ नहीं है। दिव्या हैरान रह गई।

जो फोटोग्राफर दिनभर घूमने के बाद 1000-1200 रुपए कमाता है उसने अपनी कमाई से 200 रुपए इन बच्चों के लिए निकाल दी। दिव्या उसे बिना कुछ बोले वहां से निकल गई, लेकिन जैसे ही वो बच्चों की ओर मुड़ी उसने देखा कि बच्चे ऑर्गेज फ्लेवर की आइसक्रीम खा रहे हैं। पहले उसे लगा कि टीचरों ने बच्चों को आइसक्रीम खिलाई होगी, लेकिन उसे मालूम चला कि आइसक्रीम वाले ने उसे फ्री में बच्चों को आइसक्रीम खिलाई है। आज के जमाने में जहां लोग पैसे को ही सबकुछ समझते है, वहां इन बच्चों के लिए कोई फ्री में आइसक्रीम दे रहा है तो कोई 200 रूपए। बात पैसे की नहीं बल्कि इंसानियत और मानवता की है। इन नेत्रहीन बच्चों की मासूमियत कैसे लोगों को इंसानित सिखा जाती है। खुद तो ये बच्चे रोशनी के बिना जीते हैं, लेकिन अपनी मासूमियत से हमें जिंदगी का असली मतलब सिखा जाते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि The Blind Make Us Human.

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