Article 370: जम्मू-कश्मीर और धारा 370, क्या हैं ऐतिहासिक संदर्भ
1846 में ईस्ट इंडिया कंपनी और राजा गुलाब सिंह के बीच अमृतसर संधि के बाद जम्मू-कश्मीर रियासत राज्य की स्थापना हुई। 27 अक्टूबर, 1947 को इंडिया इंडिपेंडेंस ऐक्ट के तहत महाराजा हरि सिंह ने राज्य का विलय भारत के साथ करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये। 1939 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के रूप में स्थापित पार्टी ने 1947 में रियासत के भारत में विलय का समर्थन किया।
मार्च 1948 में, महाराजा हरि सिंह ने राज्य में एक अंतरिम सरकार नियुक्त की, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाया गया। जुलाई 1949 में, शेख अब्दुल्ला और तीन अन्य सहयोगी भारतीय संविधान सभा में शामिल हुए और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति पर बातचीत की, जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 370 अस्तित्व में आया।

नवंबर 1947 में जम्मू क्षेत्र में प्रजा परिषद का उदय हुआ और उसी समय से प्रजा परिषद् ने शेख अब्दुल्ला की नीतियों का विरोध करना शुरू किया। परिषद ने जम्मू कश्मीर राज्य का भारतीय संघ में पूर्ण एकीकरण की मांग की। इसके लिए आंदोलन भी शुरू किए गए। फिर 1949 में धारा 370 के लागू होने के कारण जम्मू के लोगों में अलगाव की भावना बढ़ी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी "कश्मीर छोड़ो" आंदोलन शुरू किया, जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर के महाराजा पर लोगों को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए दबाव डालना था, जबकि जम्मू के हिंदू चाहते थे कि महाराजा ही वहां के प्रमुख बने रहें।
बलराज मधोक, पंडित प्रेम नाथ डोगरा और बलराज पुरी जैसे कद्दावर नेता राज्य के प्रशासन में बदलाव और नई संवैधानिक व्यवस्था में सत्ता हस्तांतरण के खिलाफ उठ खड़े हुए। जम्मू के डोगराओं का मानना था कि धारा 370 राज्य में हिंदू निहित हितों को ख़त्म कर देगी, जबकि शेख अब्दुल्ला का कहना था कि हमें पूरा अधिकार है कि कश्मीर के बारे में फैसला करें, क्योंकि आत्मनिर्णय ही मूलमंत्र है।
प्रजा परिषद का आंदोलन
जम्मू के नेताओं को यह लगने लगा कि शेख अब्दुल्ला राज्य पर कब्ज़ा करने की प्रवृत्ति से काम कर रहे हैं, जबकि शेख अब्दुल्ला भारत के प्रति वफादारी का दिखावा करते हुए जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए काम कर रहे थे। प्रजा परिषद आंदोलन के नेता मानते थे कि जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ पूर्ण विलय करना राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। प्रजा परिषद द्वारा शेख मोहम्मद के विरुद्ध कई प्रदर्शन किये गये। नेशनल कॉन्फ्रेंस और प्रजा के बीच कई झड़पें हुईं, सैकड़ों डोगरा कार्यकर्ता इसमें गिरफ्तार हुए। गिरफ्तार किये गये लोगों में ब्राह्मण, हरिजन, राजपूत, खत्री और महाजन शामिल थे। 70 साल के अध्यक्ष पंडित प्रेम नाथ डोगरा को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
मुखर्जी का बलिदान
धारा 370 को हटाने की मांग के साथ 1951 में प्रजा परिषद् के नेताओं ने जो जन आन्दोलन प्रारम्भ किया, उसमे भारत के कई और राजनीतिक संगठन जैसे भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद, पंजाब के आर्य समाज और अकाली दल ने भरपूर समर्थन प्रदान किया। प्रजा परिषद ने एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का नारा दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ के सक्रिय समर्थन के साथ यह मुद्दा उठाया और एक अभियान शुरू किया। दिसंबर 1952 की शुरुआत में प्रजा परिषद ने जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण सत्याग्रह शुरू किया। इस आंदोलन को भारतीय जनसंघ का समर्थन प्राप्त था। आंदोलन से जम्मू-कश्मीर में हालात बिगड़ गए।
मुखर्जी को राज्य में हो रहे अत्याचारों के बारे में कई पत्र मिले। आख़िरकार मुखर्जी को एहसास हुआ कि उनके पास जम्मू-कश्मीर का दौरा करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। वह 8 मई 1953 को ट्रेन से दिल्ली से रवाना हुए। यात्रा के दौरान, उन्होंने अंबाला (आज के हरियाणा में) में एक सार्वजनिक बैठक को संबोधित किया। वह 11 मई को पठानकोट पहुंचे और तब तक शेख अब्दुल्ला ने उन्हें टेलीग्राम के जरिए यह कहा कि उनकी प्रस्तावित यात्रा अनुचित है, लेकिन मुखर्जी पठानकोट से जम्मू-कश्मीर पहुंच गए। जैसे ही वह कश्मीर में दाखिल हुए, उन्हें जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक ने गिरफ्तार कर लिया।
जनसंघ के नेता को जम्मू ले जाया गया और वहाँ से उन्हें श्रीनगर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्हें महीने से अधिक समय तक श्रीनगर में हिरासत में रखा गया था। 23 जून 1953 को श्रीनगर में हिरासत के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। और इस तरह से धारा 370 को हटाने के लिए संघर्ष में एक राष्ट्रीय नेता की शहादत हो गई।
इंदिरा-शेख अब्दुला समझौता
24 मार्च 1972 को, इंदिरा गांधी ने संसद को सूचित किया कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर के पूर्ण विलय पर सहमत हो गए हैं। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर संविधान में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरु कर दी गई है। लेकिन शेख अब्दुला ने राष्ट्रपति शासन को मनमाने ढंग से लागू करने से रोकने के लिए अनुच्छेद 356 को निरस्त करने की मांग रख दी जिसे स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन वार्ता जारी रही।
13 नवंबर 1974 को इंदिरा गांधी ने एक समझौता पत्र अब्दुल्ला को भेज दिया। इंदिरा गांधी के प्रतिनिधि के तौर पर मिर्ज़ा मोहम्मद अफ़ज़ल बेग और जी. पार्थसारथी ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस प्रस्ताव में भी अनुच्छेद 370 को बरकरार रखने की बात की गई। लेकिन कश्मीर की स्वायत्तता को कम करने के लिए कुछ बदलाव किए गए।
समझौते में आगे प्रावधान किया गया कि भारतीय संसद के पास संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को अस्वीकार करने, सवाल उठाने या बाधित करने या भारतीय क्षेत्र के एक हिस्से पर कब्जा करने की गतिविधियों की रोकथाम से संबंधित कानून बनाने की शक्ति बनी रहेगी। अब्दुल्ला ने जनमत संग्रह पर अपनी जिद छोड़ दी। यहां तक कि उन्होंने वज़ीर-ए-आज़म कहलाने के अपने अधिकार को भी जाने दिया। अब्दुल्ला ने अपने जीवनकाल में समझौते पर कोई विवाद नहीं किया। उन्होंने सत्ता संभाली, उसका आनंद उठाया।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अंतिम मुहर
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र द्वारा 2019 में धारा 370 हटाए जाने को वैधानिक वैधता प्रदान कर इस ऐतिहासिक भूल को अंतिम रूप से दुरुस्त कर दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय सुनाया है। अब किसी को शक नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला प्रावधान केवल अस्थायी था।












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