Israel under Attack: 76 साल पुरानी है इज़रायली-फ़िलिस्तीनी संघर्ष की कहानी
Israel under Attack: इजरायल और हमास के बीच एक बार फिर युद्ध छिड़ गया है। फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास ने एक साथ 500 रॉकेटों से इजरायल पर हमला कर दिया है। इधर इजरायल ने भी हवाई हमले तेज कर दिए हैं। दोनों तरफ से खून बहाए जा रहे हैं। कभी न ख़त्म होने वाले इस संघर्ष को लगभग 76 साल हो गए हैं। एक नजर डालते हैं अभी तक के सघर्षों की दास्तां पर।
इज़रायली-फ़िलिस्तीनी संघर्ष उतना ही पुराना है जितना कि भारत का विभाजन। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने ब्रिटिश कॉलोनी की विभाजन योजना को मंजूरी देते हुए अरब और यहूदी राज्यों के गठन को हरी झंडी दे दी थी। 14 मई, 1948 को, इज़राइल राज्य का निर्माण हुआ और उसके साथ ही अरब-इजरायल युद्ध भी छिड़ गया। 1949 में इज़राइल की जीत के साथ ही पहला युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन इस युद्ध में 750,000 फ़िलिस्तीनी विस्थापित हो गए। इस क्षेत्र को 3 भागों में विभाजित किया गया: इज़राइल राज्य, वेस्ट बैंक (जॉर्डन नदी का), और गाजा पट्टी।

समय के साथ शांति के बजाय इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता ही गया। इज़राइल और मिस्र, जॉर्डन और सीरिया आपस में लड़ते और उलझते रहे। 1956 के स्वेज संकट और सिनाई प्रायद्वीप पर इजरायल के आक्रमण के बाद, मिस्र, जॉर्डन और सीरिया ने इजरायली सैनिकों के खिलाफ लामबंदी के लिए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए।
जून 1967 में, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल गमाल नासिर के उकसावे पर इज़राइल ने मिस्र और सीरिया के वायु सेना ठिकानों पर हमला कर दिया और मिस्र से सिनाई प्रायद्वीप और गाजा पट्टी को छीन कर उस पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया। मिस्र और सीरिया ने अपने खोए हुए क्षेत्र को वापस पाने के लिए इज़राइल पर दो मोर्चों से भीषण हमला किया और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल-सादत ने युद्ध में विजय की घोषणा भी कर दी। 1979 में संघर्ष विराम और शांति वार्ता की एक पूरी श्रृंखला के बाद, मिस्र और इज़राइल के प्रतिनिधियों ने कैंप डेविड समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद मिस्र और इज़राइल के बीच तीस साल के संघर्ष को विराम मिला ।
भले ही कैंप डेविड समझौते से इज़राइल और उसके पड़ोसियों के बीच संबंधों में सुधार हुआ, पर फ़िलिस्तीनी आत्मनिर्णय और स्वशासन के सवाल पर आज भी जूझते नजर आ रहे हैं। 1987 में, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में रहने वाले हजारों फिलिस्तीनियों ने इजरायली सरकार के खिलाफ विद्रोह किया, जिसे पहले इंतिफादा के रूप में जाना जाता है। 1993 ओस्लो समझौता हुआ और उसके बाद फिलिस्तीनियों के लिए वेस्ट बैंक और गाजा में खुद पर शासन करने के लिए एक व्यवस्था स्थापित की गई और नव स्थापित फिलिस्तीनी प्राधिकरण और इज़राइल सरकार के बीच एक सहमति बनी। 1995 में, ओस्लो 2 के समझौते ने पहले समझौते को और विस्तृत किया और उसमें ऐसे प्रावधान शामिल किए गए जिनके तहत वेस्ट बैंक के 6 शहरों और 450 कस्बों से इज़राइल की पूर्ण वापसी की गारंटी दी गई ।
इज़राइली सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के विरोध के बावजूद, 2002 में वेस्ट बैंक के चारों ओर एक दीवार का निर्माण करा दिया। 2013 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने वेस्ट बैंक में इजरायली सरकार और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के बीच शांति प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। हालाँकि, शांति वार्ता तब बाधित हो गई जब फिलिस्तीनी प्राधिकरण की सत्तारूढ़ पार्टी फतह ने 2014 में अपने प्रतिद्वंद्वी गुट हमास के साथ मिलकर एक संयुक्त सरकार बना ली। हमास, मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा हुआ संगठन है जो 1987 में पहले इंतिफादा के बाद स्थापित किया गया था। इसे 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक आतंकवादी संगठन के रूप में घोषित किया था।
2014 की गर्मियों में इजरायली सेना और हमास के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ, जिसमें हमास ने इजरायल पर लगभग तीन हजार रॉकेट दागे, और इजरायल ने गाजा में एक बड़े हमले के साथ जवाबी कार्रवाई की। अगस्त 2014 के अंत में मिस्र की मध्यस्थता से शांति समझौता हुआ और झड़प समाप्त हो गई, लेकिन 73 इजरायली और 2,251 फिलिस्तीनी मारे गए।
2015 में इजरायलियों और फिलिस्तीनियों के बीच एक बार पुनः हिंसा की लहर चली। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने घोषणा की कि फिलिस्तीनी अब ओस्लो समझौते द्वारा बनाए गए क्षेत्रीय विभाजनों से बंधा नहीं रहेगा। 2018 के मार्च और मई में फिलिस्तीनियों ने गाजा पट्टी और इज़राइल के बीच की सीमा पर साप्ताहिक प्रदर्शन शुरू किए और कुछ ने दीवार पर पर धावा भी बोला। फिर सशस्त्र संघर्ष हुआ और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इसमें 183 प्रदर्शनकारी मारे गए।
2018 के मई में फिर हमास और इजरायली सेना के बीच लड़ाई शुरू हुई, जो काफी हिंसक रही। गाजा पट्टी से हमास ने इजरायल पर एक सौ से अधिक रॉकेट दागे; इज़राइल ने भी गाजा में पचास से अधिक ठिकानों पर हमले किए। 2018 में, ट्रम्प प्रशासन ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों को सहायता प्रदान करने वाली संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी की फंडिंग रद्द कर दी और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरूशलेम में स्थानांतरित कर दिया।












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