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मध्य प्रदेश की धरती पर हुआ था झंडा सत्याग्रह का शंखनाद, हिल गई थी ब्रिटिश हुकूमत

मध्य प्रदेश की धरती पर हुआ था झंडा सत्याग्रह का शंखनाद, हिल गई थी ब्रिटिश हुकूमत

हमें आजादी मिले 75 साल हो गए हैं। इन 7 दशकों में भारत ने हर क्षेत्र में स्वर्णिम उपलब्धि हासिल की है। हम अपनी एकता, अखंडता, विविधता, परिश्रम, जीवटता, जिजिविषा का जश्न मना रहे हैं और इस उत्सव का नाम है 'आजादी का अमृत महोत्सव'। ये अवसर है हर उस चीज को सेलीब्रेट करने का जिससे हमारा इतिहास, हमारा संघर्ष, हमारी कुर्बानियां और हमारा शौर्य जुड़ा है। और ये सब है उस झंडे के नीचे, जिसे देखते सिर सम्मान से झुकता है, सिर गर्व से उठता है, हिम्मत आती है कि हम भारतवासी हैं।

Indian flag

आजादी के 75वें वर्ष में देश 'हर घर तिरंगा' अभियान का हिस्सा बन रहा है। मध्यप्रदेश में भी आजादी के अमृत महोत्सव में इस स्वतंत्रता दिवस पर 'हर घर तिरंगा' अभियान से प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को जोड़ा जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने हर वर्ग और हर व्यक्ति से 'हर घर तिरंगा' फहराने का आह्वान किया है। इस अवसर पर आइए आपको मध्यप्रदेश से जुड़ी ऐसी ऐतिहासिक कहानी सुनाते हैं, जिसमें जबलपुर की मिट्टी से शुरू हुए झंडा सत्याग्रह ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था। जिसने स्वाधीनता की चिंगारी को आग में बदल दिया था।

विविधता में एकता का प्रतीक है हमारा राष्ट्रीय ध्वज

किसी स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान उस देश के ध्वज से होती है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहलाता है। तिरंगा तीन सुंदर रंगों केसरिया, श्वेत और हरे रंग से मिलकर बना है। इन रंगों के अलग-अलग अर्थ हैं। ये देश की गतिशीलता, विकास और शांति को प्रदर्शित करते हैं। तिरंगे के बीच में नीले रंग का अशोक चक्र है। राष्ट्रीय ध्वज संपूर्ण राष्ट्र की गरिमा एवं प्रतिष्ठा का वर्णन करता है। राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधता हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा विविधता में एकता का प्रतीक है।

जबलपुर से शुरू हुआ झंडा सत्याग्रह

आप आजादी के अमृत महोत्सव और हर घर तिरंगा अभियान का हिस्सा बनने से पहले इसके इतिहास के बारे में जरूर जान लें। अपने अनेक स्वरूपों में बदलाव के साथ-साथ अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में कई जगह ध्वज को फहराया गया। भारतियों ने कई यातनाएँ सही और मध्य प्रदेश में हुए झंडा सत्याग्रह ने अंग्रजों को ये बता दिया कि जब-जब राष्ट्रीय ध्वज के लिए ब्रिटिश हुकूमत से टकराने का इतिहास याद किया जाएगा, जबलपुर का नाम सबसे पहले आएगा।

जबलपुर का टाउन हॉल झंडा सत्याग्रह का गवाह

झंडा सत्याग्रह या ध्वज सत्याग्रह भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय का एक शान्तिपूर्ण नागरिक अवज्ञा आन्दोलन था। इसमें में लोग राष्ट्रीय झण्डा फहराने के अपने अधिकार के तहत जगह-जगह झण्डे फहरा रहे थे। असहयोग आंदोलन की तैयारी के परिप्रेक्ष्य में जबलपुर का दौरा कर रहे अजमल खां और कांग्रेसियों के सम्मान के लिए जबलपुर जिला कांग्रेस कमेटी ने जबलपुर टाउन हॉल में तिरंगा फहरा दिया। झंडा दमोह के युवा प्रेमचंद जैन उस्ताद ने फहराया था। साल 1922 में टाउन हॉल में जब झंडा फहराया गया था, तो उसकी धमक से अंग्रेजी हुकूमत हिल गई थी। इसके बाद अंग्रेजों ने फौरन कार्रवाई की। अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने इस झंडे को हटाने का आदेश दिया। पुलिस ने झंडे को उतारकर पांव तले रौंद दिया। इस पर भारतवासी आग बबूला हो उठे। कार्रवाई की वजह से आंदोलन और तेज हुआ। जबलपुर के बाद नागपुर में भी झंडा सत्याग्रह शुरू हुआ और देखते ही देखते देशभर में फैल गया। लोगों ने अपने-अपने घरों में झंडा फहराना शुरू किया। जबलपुर के झंडा सत्याग्रह ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संजीवनी का कार्य किया।

इस वजह से शुरू हुआ झंडा सत्याग्रह

मार्च 1923 में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की दूसरी समिति आई। जिसमें बाबू राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जमनालाल बजाज और देवदास गांधी प्रमुख थे। म्युनसिपल कमेटी ने मानपत्र देने का विचार बनाया। कंछेदीलाल जैन कमेटी के म्युनसिपालिटी के अध्यक्ष थे। उन्होंने टाउन हॉल पर झंडा फहराने की अनुमति डिप्टी कमिश्नर हेमिल्टन से मांगी। अनुमति न मिलने से आंदोलन शुरू हुआ, जिसे मध्य प्रदेश झंडा सत्याग्रह का नाम दिया गया।

देशव्यापी आंदोलन में बदला झंडा सत्याग्रह

इस आंदोलन की शुरुआत के बाद वर्ष 1923 में पंडित सुंदरलाल नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। जिन्होंने जनता को आंदोलित किया गया कि टाउन हॉल पर झंडा अवश्य फहरेगा।18 मार्च 1923 को पंडित सुंदरलाल ने बालमुकुंद त्रिपाठी, बद्रीनाथ दुबे, सुभद्रा कुमारी चौहान, ताजुद्दीन अब्दलु रहीम व माखन लाल चतुर्वेदी को साथ लेकर टाउन हॉल पर झंडा फहरा दिया। इस समय सीताराम यादव, परमानंद जैन, उस्ताद प्रेमचंद, खुशहाल चंद्र जैन साथ थे। जबलपुर की सफलता से आंदोलित होकर झंडा सत्याग्रह नागपुर पहुंचा। जिसका नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया। 18 जून 1923 को झंडा सत्याग्रह ने झंडा दिवस के रूप में देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिय

वीरों के बलिदानों, आंदोलनों और क्रांतियों की बदौलत 15 अगस्त 1947 को भारत ने आजादी का पहला सवेरा देखा। हमारा ध्वज शान से लहरा रहा है। किसानों ने, जवानों ने, वैज्ञानिकों ने, खिलाड़ियों ने कभी हमारे तिरंगे को झुकने नहीं दिया। किसी ने जान की बाजी लगाकर, तो किसी ने ज्ञान से इस देश का मस्तक ऊंचा रखा है। आज खेलों के मैदानों पर, रेस्क्यू के विमानों पर हम जब भी अपनी शान तिरंगा देखते हैं, तो सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कवि कुमार विश्वास की कविता की पंक्तियां याद आती हैं "जीते-जी इसका मान रखें, मर कर मर्यादा याद रहे, हम रहें कभी न रहें मगर, इसकी सज-धज आबाद रहे, जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तंरगा हो, होंठो पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो।

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