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Guru Govind Singh: कहानी श्री गुरु गोविंद सिंह की, जिन्होंने किया ‘खालसा’ का गठन

आज सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह की जयंती है। उनकी जयंती के अवसर पर प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। श्री गुरु गोविंद सिंह धर्म रक्षा, शौर्य और न्याय के प्रतीक हैं।

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Guru Govind Singh: श्री गुरु गोविंद सिंह (1666-1708) सिख पंथ के दसवें गुरु, आध्यात्मिक प्रमुख, योद्धा, कवि और दार्शनिक थे। वे श्री गुरु तेग बहादुर (नौवें सिख गुरु) और माता गुजरी की इकलौती संतान थे। उनका जन्म बिहार के पटना में हुआ और बचपन का नाम गोविंद राय था।

1670 में उनका परिवार पंजाब आ गया और मार्च 1672 में वे शिवालिक की पहाड़ियों स्थित चक्क नानकी में चले गये, जहां उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। पिता श्री गुरु तेग बहादुर द्वारा इस्लाम में धर्मांतरण से इंकार करने और सिख तथा इस्लामी साम्राज्य के बीच चल रहे संघर्षों के परिणामस्वरूप औरंगजेब के आदेश पर उन्हें 11 नवंबर 1675 को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया था। जब श्री गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम में धर्मांतरित होने से इंकार कर दिया तो औरंगजेब के आदेशानुसार उनका सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर दिया गया।

इस शहादत के बाद, 29 मार्च 1676 को वैसाखी के दिन गोविंद राय को दसवें सिख गुरु के रूप में प्रतिष्ठा दी गयी। श्री गुरु गोविंद सिंह की शिक्षा उनके 10वें गुरु बनने के बाद भी जारी रही। वे पढ़ने-लिखने के साथ-साथ घुड़सवारी, तीरंदाजी और नियमित युद्ध भी करते थे। उनके घर, जहाँ उन्होंने जीवन के पहले चार साल बिताये उसे तख्त श्री पटना हरमंदिर साहिब नाम से तीर्थ स्थल घोषित किया गया है। गुरु की जयंती का वार्षिक उत्सव नानकशाही कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है। इस वर्ष यह 29 दिसंबर 2022 को पड़ रहा है और यह गुरु गोविंद सिंह जी की 356वीं जयंती है।

व्यक्तिगत जीवन

श्री गुरु गोविंद सिंह की तीन पत्नियां - माता जीतो, माता सुंदरी और माता साहिब थी। 10 साल की उम्र में उन्होंने 21 जून 1677 को आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित बसंतगढ़ में माता जीतो से विवाह किया। माता जीतो के तीन पुत्र थे, जिनका नाम जुझार सिंह (जन्म 1691), जोरावर सिंह (जन्म 1696) और फतेह सिंह (जन्म 1699) था।

17 साल की उम्र में उन्होंने 4 अप्रैल 1684 को आनंदपुर में माता सुंदरी से विवाह किया। माता सुंदरी के एक पुत्र थे, जिनका नाम अजीत सिंह (जन्म 1687) था। 33 साल की उम्र में उन्होंने 15 अप्रैल 1700 को आनंदपुर में माता साहिब देवान से विवाह किया। वे निःसंतान थी, लेकिन सिखों में उनकी भूमिका प्रभावशाली थी। इसलिये श्री गुरु गोविंद सिंह ने उन्हें खालसा की माता के रूप में घोषित किया।

खालसा की स्थापना

श्री गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में 'खालसा' नामक सिख योद्धा दल का गठन किया, जिसका अर्थ है 'पवित्रता'। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए पांच 'क' - केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कछैरा को आस्था के स्तम्भ के रूप में निर्धारित किया। इन्हें सिख हमेशा धारण किये रहते हैं और यह प्रतीक के रूप में खालसा परंपरा का परिचय देते हैं।

1699 में ही उन्होंने सिखों से वैशाखी पर आनंदपुर में एकत्र होने का अनुरोध किया। वहां गुरु गोविंद ने भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई साहिब सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई हिम्मत सिंह नामक पांच स्वयंसेवकों को आशीर्वाद दिया और उन्हें पंज प्यारे (पांच प्यारे) और सिख परंपरा का पहला खालसा घोषित किया। इसके बाद गुरु ने एक लोहे के कटोरे में पानी और शक्कर लेकर दोधारी तलवार से उसे हिलाते हुए एक घोल तैयार किया और उसे अमृत नाम दिया। पांचों दीक्षित स्वयंसेवकों को गुरु ने 'सिंह' का एक नया उपनाम दिया जिसका अर्थ 'शेर' होता है। तब गुरु ने दीक्षा लेने वाले पांचों सिखों को स्वयं उन्हे खालसा के रूप में दीक्षा देने को कहा और इसी के साथ गुरु छठवें खालसा बन गए। इसके बाद वे गुरु गोविंद सिंह के नए नाम से पुकारे जाने लगे।

मुगल बादशाह औरंगजेब के खिलाफ युद्ध

मुगल बादशाह औरंगजेब ने श्री गुरु गोविंद सिंह और उनके परिवार को भगाने का आदेश जारी किया हुआ था। हालांकि, उन्होंने औरंगजेब का डटकर सामना किया और उसके खिलाफ चौदह युद्धों का नेतृत्व किया।

साहिबजादों का बलिदान

माता गुजरी और उनके दो छोटे पुत्रों को सरहिंद के मुसलमान गवर्नर वजीर खान ने पकड़ लिया था। 5 और 8 वर्ष की आयु के उनके सबसे छोटे बेटों को, इस्लाम में धर्मांतरित होने से मना करने के बाद उन्हें एक दीवार में जिंदा दफन करके मार दिया गया। माता गुजरी उनके पोतों की मौत की खबर सुनकर टूट गईं और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। 15 और 17 साल की उम्र में उनके दोनों बड़े बेटे भी मुगल सेना के खिलाफ दिसंबर 1704 की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुये।

गुरु गोविंद सिंह का बलिदान

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    1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई और उसके बेटों के बीच गद्दी के उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ। औरंगजेब के बाद मुगल सल्तनत का उत्तराधिकारी बहादुर शाह प्रथम बना। इसी दौर में, मुगल सेना के कमांडर और सरहिंद के नवाब वजीर खान ने दो अफगानों - जमशेद खान और वासिल बेग को गुरु की हत्या के लिये नियुक्त किया। दोनों ने गुपचुप तरीके से गुरु का पीछा किया। उस दौरान गुरु अपने सैनिक बेड़े के साथ दक्कन में थे। तभी जमशेद और वासिल ने गुरु के शिविर में प्रवेश किया। वे गुरु के पास पहुंच गये और जमशेद खान ने गुरु पर हमला कर दिया। इस अचानक हुए हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गये। इसके बावजूद गुरु ने अपनी कृपाण से वार करके उन हमलावरों को मार गिराया। फिर भी, गंभीर घावों की वजह से 7 अक्टूबर 1708 को श्री गुरु गोविंद सिंह का निधन हो गया।

    यह भी पढ़ें: Guru Govind Singh: बलिदान की अनूठी परंपरा शुरु करने वाले गुरु गोबिंद सिंह

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