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Bankruptcy Process: किसी कंपनी के दिवालिया होने पर क्या होता है, जानिए क्या हैं नियम-कानून?

कानूनी तौर पर दिवालिया घोषित होने के बाद ही कोई कंपनी दिवालिया मानी जाती है। केंद्र सरकार ने बैंकों और अन्य देनदारों सहित आम जनता तथा कंपनी के कर्मचारियों को राहत प्रदान करने के लिए संवैधानिक व्यवस्था बनायी हुई है।

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Bankruptcy Process: वित्तीय संकट से जूझ रही वाडिया समूह के स्वामित्व वाली गो फर्स्ट एयरलाइन ने अपनी सभी उड़ानों को रद्द कर दिया है। यह एयरलाइन बीते कई महीनों से आर्थिक संकट के दौरे से गुजर रही थी, जिसके चलते यह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गयी। कंपनी ने इसके लिए एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में वॉलंटरी इनसॉल्वेंसी प्रॉसीडिंग यानि दिवालिया होने के लिए आवेदन कर दिया है। कंपनी के मुताबिक उनके पास न तो तेल है और न ही पैसा। यहां तक कि अब कंपनी के पास तेल कंपनियों का बकाया चुकाने तक का पैसा नहीं है।

दरअसल नकदी संकट से जूझ रही एयरलाइंस की माने तो अमेरिकी इंजन कंपनी को इसके लिए दोषी बताया है। क्योंकि एयरलाइन को अमेरिकी कंपनी प्रैट एंड व्हिटनी से ऑर्डर के मुताबिक इंजन समय पर नहीं मिले। जिसकी वजह से यह समस्याएं पैदा हुई और 50 प्रतिशत विमान ही उड़ान भर पाते थे।

पहले भी दिवालिया हो चुके हैं ये एयरलाइंस

आर्थिक संकट और फिर दिवालिया होने की लिस्ट में एयरलाइन कंपनियों का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है। इससे पहले ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस, अर्चना एयरवेज, सहारा एयरवेज, एनईपीसी एयरलाइंस, मोदीलुफ्त, दमानिया एयरवेज, जेट एयरवेज, किंगफिशर एयरलाइंस, डेक्कन एविएशन, एयर पेगासस, इंडस एयर, वायुदूत एयरलाइन और पैरामाउंट एयरवेज ऐसी एयरलाइंस हैं, जो या तो दिवालिया हो गयी, या फिर उनका अधिग्रहण कर लिया गया।

वहीं बीते कुछ सालों में इन एयरलाइंस कंपनियों के अलावा फ्यूचर रिटेल, खेतान ग्रुप, और सुपरटेक, मीनाक्षी एनर्जी जैसी कम्पनियां भी दिवालिया हो चुकी है। अब ऐसे में सवाल पैदा होता है कि यह दिवालियापन होता क्या है और आवेदन देकर कैसे दिवालिया घोषित किया जाता है? क्या है इसके नियम और दिवालिया होने के पीछे की कहानी?

दिवालियापन क्या होता है?

दिवालिया होने की एक कानूनी कार्यवाही होती है। जो तब शुरू होती है, जब किसी कंपनी के पास अपना व्यवसाय चलाने के लिये जरूरी कैश (पूंजी) खत्म हो जाए। इस आर्थिक संकट के कई कारण हो सकते हैं, इसमें सबसे प्रमुख कारण है - आय कम हो और खर्चे ज्यादा। इसके बाद पैदा होते गये आर्थिक संकटों जैसे कर्जा न चुका पाना, लेनदारों का बढ़ता दवाब इत्यादि के चलते कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच जाती है।

वैसे, किसी भी कंपनी के दिवालिया होने से पहले कई तरह के संकेत मिलने लगते हैं। जैसे ऑडिटर्स का कंपनी छोड़ना, कर्मचारियों को एक मुश्त में नौकरी से निकलना, कोई नयी घोषणाएं न करना, ब्याज और मूलधन सहित लगातार बढ़ता कर्ज और समय पर टैक्स जमा नहीं कर पाना।

ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि दिवालियापन की प्रक्रिया देनदार (कंपनी या व्यक्ति) द्वारा दायर एक याचिका के साथ शुरू होती है। वहीं कभी-कभी यह याचिका लेनदार (बैंक या अन्य) की ओर से भी दायर की जाती है। इस मामले में देनदार की सभी संपत्तियों का मूल्यांकन किया जाता है, और उस संपत्ति का उपयोग बकाया कर्ज के एक हिस्से को चुकाने के लिए किया जा सकता है।

दिवालिया कैसे घोषित होती है कंपनी?

जब व्यावसायिक उपक्रम कानूनी रूप से यह घोषणा करता है कि उसके बाद अब व्यापार चलाने के लिए पूंजी एकदम समाप्त हो गयी है तो ऐसा समझा जाता है कि उसने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। हालांकि, इसके आगे कानूनी प्रक्रिया भी है। अगर कानूनी तौर पर किसी व्यक्ति या कंपनी को दिवालिया घोषित किया जाता है तो कोर्ट उसकी संपत्ति को बेचने के लिए नियुक्ति अधिकारी को नियुक्त करता है। इस दौरान तीन धाराओं 7, 12 और 29 का जिक्र किया गया है।

● इस कोड की धारा 7 किसी कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया की शुरुआत से जुड़ी है अर्थात जब कोई कर्ज देने वाला व्यक्ति, संस्था या कंपनी, कर्ज नहीं चुकाने वाली कंपनी के खिलाफ दिवालिया कोर्ट में अपील दायर करते हैं।

● धारा 12 दिवालिया प्रक्रिया को पूरी किये जाने की समयसीमा को तय करती है। इस धारा के तहत यह पूरी प्रक्रिया 180 दिनों के भीतर पूरी कर ली जानी अनिवार्य है।

● धारा 29 में संबंधित व्यक्ति और कंपनी को पारिभाषित किया गया है। सरकार ने इस कोड में संशोधन कर यह तय कर दिया था कि किसी दिवालिया हो रही कंपनी की नीलामी में इसके तहत आने वाले व्यक्ति भाग नहीं ले पाएंगे।

एक मौका फिर से दिया जाता है

दिवालिया होने की सार्वजनिक घोषणा करने के बाद कंपनी को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास याचिका दायर करनी होती है। एनसीएलटी द्वारा यहां इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल नियुक्त किया जाता है, जिसे 180 दिनों के भीतर कंपनी को रिवाइव करने का प्रयास करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। अगर 180 दिनों के भीतर कंपनी रिवाइव हो जाती है तो वह फिर से सामान्य कामकाज करने लगती है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो उसे दिवालिया मानकर आगे की कार्यवाही शुरू कर दी जाती है।

इसके बाद शुरू होती है कानूनी प्रक्रिया

दिवालिया घोषित होने की दिशा में कंपनी द्वारा वाइंड अप पिटीशन दाखिल की जाती है। इसका मतलब है कि अब कोई विकल्प नहीं बचा है और कंपनी दुबारा फिर से खड़ी नहीं हो सकती। इस दौरान कंपनी के शेयर सहित चल-अचल संपत्तियों को बेचकर रकम एकत्र की जाती है। फिर नियमों के अनुसार संपत्ति बेचकर जुटाई गयी रकम से सबसे पहले वहां काम करने वाले कर्मचारियों का बकाया मेहनताना दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी लिया संज्ञान

अप्रैल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने दिवालिया होने वाली कंपनी और उसके भुगतानों पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। न्यायमूर्ति एम.आर. शाह और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की बेंच के अनुसार अगर कोई कंपनी दिवालिया घोषित होने की प्रक्रिया में जाती है तो वहां काम करने वाले कर्मचारियों के सभी भत्‍ते जैसे ग्रेच्‍युटी और पीएफ भी उसे देने होंगे। जब कंपनी की संपत्तियों को बेचा जाता है तो उससे मिलने वाली रकम में से इनका भी पूरा भुगतान करना होगा। उसके बाद उसमें निवेश करने वाले छोटे ग्राहकों जैसे कोई बिल्डर दिवालिया हुआ तो उसके फ्लैट खरीददार को, उसके बाद पैसा बचता है तो बैंक इत्यादि का कर्ज वापस करना होगा। अंत में आयकर व बाकी अन्य देनदारियों को चुकाना होगा।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड क्या है?

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) देश में दिवाला और दिवाला कार्यवाही के लिए नियामक प्राधिकरण है। एक अक्टूबर 2016 को इसका गठन हुआ था। इसे दिवाला और दिवालियापन संहिता के माध्यम से वैधानिक शक्तियां दी गयी हैं। साल 2016 को संसद द्वारा पारित इस कानून में व्यक्तियों, कंपनियों, सीमित देयता भागीदारी और भागीदारी फर्मों को शामिल किया गया है। यह बोर्ड दिवालियापन को नियंत्रित करने वाले संबंधी व्यवस्थाओं और इसकी प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास करता है। यह NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) और DRT (डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल) जैसे दो ट्रिब्यूनल का उपयोग करके मामलों को हैंडल करता है।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल एक अर्ध न्यायिक निकाय है जो भारतीय कंपनियों और कॉरपोरेट्स से संबंधित विवादों एवं मुद्दों से निपटता है। ट्रिब्यूनल का गठन कंपनी अधिनियम 2013 के तहत किया गया था और वर्ष 2016 में गठित किया गया था। इस कामों में कंपनियों के समझौते, मध्यस्थता, व्यवस्था, पुनर्निर्माण, निपटान और समापन शामिल है।

जबकि डीआरटी का मुख्य उद्देश्य और भूमिका उधारकर्ताओं से धन की वसूली करना है जो बैंकों और वित्तीय संस्थानों को देय है। यह वहां लागू होता है जहां देय ऋण की राशि 10 लाख रुपये से अधिक होती है। यह तब लागू होता है जब ऋणों की वसूली के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा वाद दायर किया जाता है।

सुपरटेक ने कैसे लौटाया पैसा?

मार्च 2022 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने रियल स्टेट कंपनी सुपरटेक को दिवालिया घोषित कर दिया था। यह फैसला एनसीएलटी ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा दायर एक याचिका को स्वीकार करने के बाद दिया था। तब सबसे ज्यादा चिंता सुपरटेक के फ्लैट खरीदने वाले 25 हजार खरीददारों की थी।

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    इसके बाद तय किया गया कि कंपनी बैंक कर्ज से पहले अपने फ्लैट खरीददारों का पैसा वापस देगी। इसके लिए अप्रैल 2022 में ग्राहकों को कंपनी की ओर से supertechlimited.com/public-announcement.php पर जाकर अपनी रकम क्लेम करने को कहा। साथ ही जरूरी कागजात भी अपलोड करवाये गये। जो कोई ग्राहक ऑनलाइन तौर-तरीकों को नहीं समझ पा रहा था, उन्हें एक नंबर 8904039001 पर फोन करने को कहा गया। इसके कुछ महीनों बाद से ग्राहकों के पैसे लौटने शुरू गये। हालांकि, अब भी सभी ग्राहकों के पैसे नहीं लौटाये गये हैं। हालांकि, अभी कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है कि कितने ग्राहकों का पैसा लौटा और कितना अभी बाकी है?

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