G7 Summit: नेहरू के बाद हिरोशिमा जाने वाले दूसरे पीएम नरेंद्र मोदी, जानें भारत और जापान की दोस्ती का इतिहास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान दौरे पर जा रहे हैं, जहां वह हिरोशिमा भी जायेंगे। मोदी वहां दुनिया के सबसे ताकतवर संगठनों में एक जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।

19 मई से 24 मई 2023 के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान, पापुआ न्यू गिनी और ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर रहेंगे। जापान के हिरोशिमा में जी-7 का सम्मेलन हो रहा है जो 21 मई तक चलेगा। प्रधानमंत्री मोदी 19 मई को जापान पहुंच जाएंगे। दुनिया के सबसे ताकतवर संगठनों में एक जी-7 (जापान, इटली, कनाडा, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी) की अध्यक्षता इस बार जापान कर रहा है।
इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए जापान ने भारत को निमंत्रण दिया है। जहां पीएम मोदी कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी करेंगे। वैसे पीएम मोदी इससे पहले भी तीन बार जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग ले चुके हैं। इसमें बियारिट्ज, फ्रांस (2019) और एलमाऊ, जर्मनी (2022), और एक बार वर्चुएल (कॉर्नवाल, यूके 2021) शामिल है।
आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद हिरोशिमा जाएंगे। आइए, जानते हैं कि आखिर क्या है दोनों प्रधानमंत्रियों के दौरे में अंतर और इतिहास? और प्रधानमंत्री नेहरू के बाद हिरोशिमा क्यों नहीं गया कोई दूसरा भारतीय प्रधानमंत्री?
जब नेहरू के स्वागत में पहुंचे जापानी पीएम
ब्रिटेन की न्यूजरिल्स और डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली एक पुरानी संस्था British Pathe की वेबसाइट के मुताबिक 4 अक्टूबर 1957 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने 10 दिवसीय दौरे पर जापान पहुंचे थे। तब एयर इंडिया का विमान टोक्यो के हनेडा हवाई अड्डे उतरा था। उस दौरे में उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी, विदेश मंत्रालय के महासचिव एन.आर. पिल्लई, पीएम के निजी सचिव एम.ओ. मथाई व अन्य लोग थे। उनका स्वागत एयरपोर्ट पर खुद तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री नोबुसुको किशी और विदेश मंत्री आइचिरो पुजियामा ने किया था।
पीएम को सुनने के लिए 30 हजार जापानी हुए इकट्ठा
पीएम जवाहरलाल नेहरू 9 अक्टूबर 1957 को जापान के उस हिरोशिमा शहर पहुंचे थे, जहां द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में अमेरिका ने परमाणु बम गिराया था। पीएम नेहरू ने यहां पर मृतकों के लिए बने स्मारक 'पीस मेमोरियल पार्क' पर माल्यार्पण किया था। साथ ही हिरोशिमा में उन्होंने भाषण भी दिया था। जिसे सुनने के लिए 30 हजार लोगों की भीड़ जुट गई थी।
नेहरू ने लगाया था एक देवदार का पेड़
जापान की एक वेबसाइट The Chugoku Shimbun में छपे एक लेख में नसरीन अजीमी, विजिटिंग स्कॉलर, तेरासाकी सेंटर फॉर जापानी स्टडीज लिखती है कि हिरोशिमा में पीस मेमोरियल पार्क के पश्चिम में एक लंबा और घना देवदार का पेड़ है। यह स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का उपहार था। जब उन्होंने अक्टूबर 1957 में हिरोशिमा का दौरा किया था तब यह पेड़ लगाया गया था। वह ऐसे पहले विदेशी गणमान्य लोगों में से एक थे, जो परमाणु बम पीड़ितों के लिए बने मेमोरियल पार्क में गये थे।
क्या है हिरोशिमा का इतिहास?
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त 1945 की सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर अमेरिका ने हिरोशिमा शहर पर लिटिल बॉय नाम का एटम बम गिराया गया था, जिसकी लंबाई 3.5 मीटर, वजन- 4 टन और क्षमता 20 हजार TNT के बराबर थी। इस बम को आसमान से जमीन पर आने में सिर्फ 43 सेकेंड लगे थे।
जहां यह एटम बम गिरा, वहां से कई किलोमीटर के एरिया में हर चीज भाप बनकर हवा में उड़ गई। एक माइक्रो सेकेंड के अंदर सबकुछ खत्म हो गया और वहां का तापमान 10 लाख डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच गया था। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक इससे लगभग 1.40 लाख निर्दोष लोगों की मौत हुई थी। जबकि इससे निकले रेडिएशन की वजह से लाखों लोग अपंग हो गये और तकरीबन कई दशकों तक वहां पैदा होने वाले बच्चे अपंग होते रहे।
जी-7 सम्मेलन हिरोशिमा में क्यों?
जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के लिए भी हिरोशिमा अहम है, क्योंकि वह खुद इस शहर से आते हैं। मध्य हिरोशिमा ही उनका चुनावी क्षेत्र है। साथ ही जी-7 जैसा बड़ा समिट हिरोशिमा में आयोजित करने का उद्देश्य यह भी है कि परमाणु हथियारों के बढ़ते खतरे को लेकर दुनिया को एक संदेश दिया जा सके।
भारत-जापान के कूटनीतिक संबंध
28 अप्रैल 1952 को भारत-जापान के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे। यह संधि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान द्वारा हस्ताक्षरित पहली शांति संधियों में से एक थी। साल 1974 तक रिश्ते अच्छे रहे लेकिन जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने 1974 में पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, तो दोनों देशों के रिश्ते थोड़े बिगड़ गये। पश्चिमी देशों के साथ जापान भी सुर में सुर मिलाकर भारत के खिलाफ हो गया।
इसके कुछ सालों बाद रिश्तों में कुछ सुधार होता, उससे पहले 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण कर दिया गया। जापान इसके खिलाफ था और भारत पर उसने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी जमकर आलोचना की। जिसकी वजह से दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गये।
21वीं सदी में सुधरे भारत-जापान के रिश्ते
साल 2000 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री योशिरो मोरी दिल्ली दौरे पर आये, इसके बाद से दोनों देशों के रिश्तों के सुधरने की शुरुआत हुई। फिर 2006 में भारत के तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह जापान दौरे पर गये और तब जापान के पीएम शिंजो आबे थे। शिंजो आबे ने जापान की ओर से भारत के साथ रिश्तों को सुधारने में सबसे अहम भूमिका निभाई।
मोदी-आबे की दोस्ती और बने स्ट्रैटेजिक पार्टनर
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2014 में जापान का दौरा किया और प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ शिखर बैठक की। फिर दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री आबे ने भारत की अधिकारिक यात्रा की। इसके बाद नवंबर 2016 में पीएम मोदी एकबार फिर जापान गए।
नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आसियान समिट में हिस्सा लेने के लिए फिलीपींस पहुंचे। यहीं पर उनकी मुलाकात शिंजो आबे से हुई। गौर करने वाली बात है कि इस समिट के मौके पर मनीला में चार देशों भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने 10 सालों से ठंडे बस्ते में पड़े क्वाड के प्रस्ताव पर मुहर लगाई। इस तरह से जापान और भारत एक स्ट्रैटिजिक पार्टनर भी बन गये।












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