उफ्फ! अब फ्लाइट में भी क्लास कॉंन्शियस नेताओं के नखरे

यह निर्देश, औपनिवेशिक की यादें ताजा करने के लिए पर्याप्त है। इससे साफ पता चलता है कि शाही वर्ग प्रणाली न सिर्फ पिछले कई दशकों वंशागत है बल्कि राजनैतिक नौकरशाही वर्ग पर भी इसका अच्छा खासा असर पड़ चुका है। सांसदों की समिति का एयरलाइंस से विशेष सुविधाओं की मांग करना, लोकतांत्रिक देश के लिए अच्छा नहीं लगता। लेकिन नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह ने इस बारे में कहा है कि इस प्रकार की कोई भी मांग नहीं की गई है और यह सारी बातें सिर्फ अफवाह है।
एयरलाइंस से इस तरह की मांग रखने वाले नेताओं के लिए यह बात ज्यादा गंभीर नहीं है और न ही उन्हे इसमें कोई दोष नजर आता है, एक लम्बे समय से उन्हे लगता है कि इस तरह की सुविधाएं उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। हालांकि, भारतीय नेताओं की संस्कृति बिल्कुल अलग है, वह खुद को इस तरह से जनता के सामने रखते है कि वह गांधीवादी सोच को मानते है, मितव्ययता का पालन करते है लेकिन इस मांग से सारी की सारी सोच खुलकर सामने आ गई।
फर्स्ट क्लास की सुविधा चाहिये
यह बात सिर्फ वीआईपी मांग रखने की नहीं है बल्कि मांग रखने वाले लोगों के बारे में है। भारत का हर नागरिक जानता है कि फ्लाइट में फर्स्ट क्लास में किस तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। इतना ही नहीं रेल में भी सांसदों को विशेष सुविधाएं दी जाती है और कई बार ऐसा हो चुका है कि कुछ उपद्रवी विधायक रेल के एक डिब्बे में घुस आते है और एक विधायी होने की हैसियत से उस सीट को अपना बना लेते है। वो बात अलग है कि जब किसी कैबिनट मंत्री, सदस्य, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को विशेष सुविधा दी जाएं, वो भी उनकी सुरक्षा के मद्देनजर दी जाती है।
लेकिन विशेषाधिकार की मांग करके, भारतीय नेताओं के राजनीतिक संस्कृति का सारा चिट्ठा खोलकर रख दिया, हो सकता है कि कुछ समय बाद हमें भारत की सड़कों पर सेडान या एसयूवी पर बडे - बडे स्टीकर देखने को मिलें, जिनमें लिखा हो - ''एक पूर्व विधायक का बेटा'' ताकि उसे भी अच्छा ट्रीटमेंट दिया जा सकें, अगर यही हाल रहा, तो ऐसा दिन दूर नहीं होगा।
हम सभी को एक सांसद के द्वारा ''कैटल क्लास'' वाला कॉन्सेप्ट याद ही है जिन्होने कम लागत में हवाई यात्रा के बारे में यह बात की थी। जब एक आम आदमी की मेहनत से कमाई धनराशि से कम लागत वाली हवाई सुविधाओं के बारे में सोचा जाता है तो उस आम आदमी के प्रतिनिधि के बारे में विशेष सुविधाओं को देने का जिक्र कैसे किया जा सकता है। देखा जाएं तो आम जनता इन सुविधाओं की असली हक़दार होनी चाहिये, क्योंकि वो इन यात्राओं के लिए खुद का पैसा देते हैं और नेताओं की यात्रा के लिए भी टैक्स के रूप में अप्रत्यक्ष तरीके से पैसा देते है। जो लोग सांसदों की ये मांग सही मानते है उन्हे नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है कि क्या ऐसी मांग वाकई में उचित है या ये सिर्फ वीआईपी सोच के वीआईपी नखरे है।
हम तीसरी दुनिया के देशों से भी पीछे हो गए
एक राष्ट्र के रूप में हम बहुत पिछड़ गए, हमारी दशा ठीक वैसी ही हो गई जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद थी, अब तो हालात इतने खराब हो गए है कि हम तीसरी दुनिया के देशों से भी पीछे हो गए। वर्तमान में, भारतीय रेलवे और चाइनीज रेलवे को कोई मुकाबला ही नहीं, उनके पास वो सब कुछ है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। यहां तक कि भारत और दक्षिण कोरिया का भी कोई मेल नहीं रहा, क्योंकि उस देश के नेता, देश के लिए काम करते हैं और हमारे देश के नेता पिछले 60 सालों से हाथ - पर - हाथ रखे बैठे हैं।
इन दिनों देश की जनता भी बैड गर्वेनेंस से तंग आ चुकी है और अब सभी की मांग है कि उन्हे ऐसा प्रतिनिधि चाहिये जो उनके लिए कुछ करें, देश के लिए कुछ करें, अपनी वीआईपी सुविधाओं की मांग न रखकर जनता के लिए वीआईपी सुविधाओं की मांग करें, उनके ह़क के लिए लड़े और महसूस करा दें कि हां, वो भी लोकतंत्र राष्ट्र का हिस्सा है।
अभी तक देश में भारतीय रेलवे या एयरइंडिया में सुधारों का विरोध वीआईपी कोटे में पहली बार इस तरह से हुआ है, क्योंकि हमेशा लोगों और जनता की वीआईपी सुविधाओं को लेकर ही सुधार हुए हैं। इस मांग को जानने के बाद ऐसा मानना सही नहीं है कि इस देश में अच्छे सांसद, नेता या विधायक नहीं है। भारत की राजनीति में कई लोग बहुत अच्छे विचारों के है, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। उनके नेक विचारों की वजह से वह कई बार चयनित भी नहीं हो पाते है क्योंकि भारत का नौकरशाही तंत्र बड़ा मजबूत और नेक विचारों का कट्टर विरोधी है, ऐसे में जनता के बारे में सोचने वाले लोग सामने ही नहीं आ पाते है। यही कारण है कि देश जर्जर हाल में आ खड़ा हुआ है।
फर्क नौकरशाही और राजशाही में
भारत का नौकरशाही वर्ग, हमेशा अपने कॅरियर में आगे बढ़ने के बारे में सोचता है, क्योंकि उसने इसके लिए बहुत मेहनत और बहुत पैसा लगाया होता है और इसलिए वह हमेशा राजनीतिक वर्ग की खुशामदी में लगा रहता है। इस तरीके से उनका कॅरियर तो बन जाता है लेकिन सिस्टम में खराबी आ जाती है। कई बार तो नेताओं की उन्नति, निलंबन, स्थानांतरण आदि के लिए भी ''जी - हुजुरी'' की जाती है, ऐसा करने में अगर नेता उनसे राय लें कि क्या उनकी मांग सही है, तो वह कभी न नहीं कह पाते और आगे क्या होता है, हम सभी को पता है।
लम्बे समय से इस प्रकार के विशेषाधिकारों की मांग को आसान बनाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों के एकाधिकार की बात हो रही है। लेकिन यह एक दूर का मुद्दा नजर आता है जो शायद कभी लागू न हो पाएं। प्राईवेट एयरलाइंस ने पिछले कुछ सालों में अच्छा विकास किया था, लेकिन क्लोजड् ईकोनॉमी के इस दौर में हर दूसरे इंसान के लिए विशेष सुविधाओं की मांग, निजीकरण को हानि में डाल सकती है।
अगर आम जनता, एक उच्च वर्ग, बिजनेसमैन, सेलीब्रेटी यहां की प्रसिद्ध उद्यमी अजीज प्रेमजी आदि इन उड़ानों में बिना शिकायत के, बिना विशेष सुविधाओं की मांग किए सफर कर सकते हैं तो सांसदों की ऐसी मांग करने का क्या औचित्य है। शायद उन्हे एकछत्र वंश के अधीन रहने और वीआईपी सुविधाओं की लत लग गई है, तभी उन्हे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार फूटी आंख नहीं सुहाते है, क्योंकि वो एक चाय वाले है। पर उन्हे नहीं पता कि भारत की जनता का मन बदलने लगा है और अब उन्हे नेताओं की कपट भरी भावना समझ में आने लगी है।












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