Government Advertisements: सरकारी विज्ञापनों पर क्यों उठ रहा विवाद, क्या कहते हैं नियम?
विपक्षी दल अक्सर सत्ताधारी पार्टी पर आरोप लगाते हैं कि सरकारी विज्ञापनों की आड़ में नेता अपनी व्यक्तिगत एवं राजनीतिक पब्लिसिटी पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च कर देते हैं, लेकिन हर पार्टी सत्ता में आने पर यही करती आई है।

हाल ही में दिल्ली के उप राज्यपाल के आदेश पर दिल्ली सरकार के ही प्रचार विभाग ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) को सरकारी खजाने में 163.62 करोड़ रुपये जमा कराने का नोटिस भेजा है। अधिकारियों के मुताबिक इसमें लगभग 99 करोड़ रुपए विज्ञापन खर्च की वसूली और 64 करोड़ रुपए से ज्यादा उस पर ब्याज शामिल है। आप को यह राशि 10 दिनों के भीतर जमा करनी होगी। दिल्ली सरकार पर आरोप लगा है कि सरकारी विज्ञापनों की आड़ में आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की पब्लिसिटी की गई, जो राजनीतिक हितों से प्रेरित थी।
गौर करने वाली बात यह है कि AAP को नोटिस दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय (डीआईपी) द्वारा भेजा गया है। डीआईपी ने AAP को कहा कि अगर तय समय में यह राशि जमा नहीं हुई तो इसकी वसूली की जाएगी। इस नोटिस का आधार सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2015 में तय की गई गाइडलाइंस को बनाया गया है।
सरकारी विज्ञापन के क्या हैं नियम?
सरकारी विज्ञापन को लेकर नियम यह है कि सरकारी विज्ञापन या घोषणाओं में सत्ताधारी पार्टी के हितों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और न ही उनमें से किसी विज्ञापन में राजनीतिक हस्तियों का महिमामंडन होना चाहिए। सरकारी विज्ञापन में पार्टी का नाम, प्रतीक, शहर या पार्टी का झंडा बिल्कुल भी नहीं जाएगा।
वहीं ऐसे विज्ञापनों में सत्ताधारी पार्टी द्वारा विपक्ष के विचारों या कामों पर तंज कसना या हमला (अपशब्द) नहीं किया जाएगा। साथ ही सरकारी विज्ञापन में किसी नेता या प्रसिद्ध व्यक्ति की जयंती या पुण्यतिथि पर विज्ञापन प्रसारित होंगे लेकिन वो किसी पार्टी के हित को नहीं साधेगी।
इसके अलावा निजता, चुनावी कानून और उपभोक्ता संरक्षण का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। वहीं किसी भी विज्ञापन में नेताओं की तस्वीर छापने से भी बचने की सलाह दी गई है। यदि जरूरी है तो सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गवर्नर या मुख्यमंत्री की फोटो प्रयोग की जा सकती है लेकिन ये किसी के राजनीतिक हित को पूरा करने वाले नहीं होने चाहिएं।
सुप्रीम कोर्ट ने बनाए थे नियम
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में सरकारी विज्ञापनों की देखरेख के लिए नियम बनाए थे। इसके लिए राज्यों से अपने तीन सदस्यीय पैनल गठित करने के लिए कहा गया था, जो सरकारी विज्ञापनों के कंटेंट की निगरानी करेगा। साथ ही इस तीन सदस्यीय कमेटी को यह तय करना था कि सरकारी विज्ञापनों का कंटेंट सत्ताधारी पार्टी के हितों को प्रमोट करने वाला न हो और न ही राजनीतिक हस्तियों का महिमा मंडन करने वाला। अगर ऐसा हुआ तो उन पर फाइन लग सकता है।
AAP ने मांगा पूरा ब्यौरा
आम आदमी पार्टी को मिले इस नोटिस के बाद दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि वह केजरीवाल सरकार और उसके मंत्रियों को निशाना बनाने के लिए दिल्ली के अधिकारियों पर 'असंवैधानिक' नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। AAP ने डीआईपी के सचिव से संबंधित विज्ञापनों की सूची मांगी है कि उनमें क्या अवैध है। सूचना एवं प्रचार निदेशालय की सचिव एलिस वाज ने नोटिस दिया है कि वर्ष 2017 से दिल्ली के बाहर के राज्यों में दिए गए दिल्ली सरकार के विज्ञापनों का खर्च मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से वसूला जाएगा। वहीं AAP के राष्ट्रीय सचिव पंकज कुमार गुप्ता ने इस वसूली नोटिस पर उन विज्ञापनों की प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की है, जिनका खर्च वसूला जाना है।
एक महीने पहले LG ने भी दिये थे वसूली के आदेश
इस मामले से ठीक एक महीना पहले दिसंबर, 2022 में दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्य सचिव को सरकारी विज्ञापनों की आड़ में राजनीतिक विज्ञापन प्रकाशित करने के मामले में AAP से 97 करोड़ रुपये वसूलने का आदेश दिया था। डीआईपी की ओर से जारी वसूली नोटिस में उक्त राशि पर लगाया गया ब्याज भी शामिल किया गया था। साथ ही यह भी आदेश दिये गये थे कि सितंबर 2016 से अब तक दिल्ली सरकार के सभी विज्ञापनों की एक्सर्ट कमेटी द्वारा जांच की जाएगी।
केंद्र-दिल्ली सरकारों द्वारा विज्ञापनों पर किया गया खर्च
13 दिसंबर 2022 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि वर्ष 2014 से उसने विज्ञापनों पर 6,491.56 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। उसमें 3,260.79 करोड़ रुपये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और 3,230.77 करोड़ रुपये प्रिंट मीडिया में विज्ञापन पर खर्च किये हैं।
वहीं साल 2022 के शुरुआत में एक आरटीआई (सूचना का अधिकार अधिनियम) के जवाब से पता चला कि 2012 से 2022 तक दिल्ली सरकार का विज्ञापन खर्च 4,200 प्रतिशत अधिक बढ़ गया है। दिल्ली सरकार ने साल 2021-22 में विज्ञापन पर 488.97 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। उसमें से 125 करोड़ रुपये तो एक महीने (मार्च) में ही खर्च किये गये थे।
एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2012-13 में दिल्ली सरकार का कुल विज्ञापन खर्च 11.18 करोड़ रुपये था। यह 2021-22 तक बढ़कर 488.97 करोड़ रुपये हो गया था। दरअसल, दिसंबर 2013 में दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का 15 साल का कार्यकाल समाप्त हो गया था।
उसके बाद 2013-14 में सरकार द्वारा विज्ञापन पर 25.24 करोड़ रुपये खर्च किया गया था। अगले साल 2014-15 में 11.12 करोड़ रुपये की राशि 'अन्य शुल्कों' पर खर्च की गई थी। यह वह साल था जब दिल्ली उपराज्यपाल के शासन में थी क्योंकि अरविंद केजरीवाल सरकार ने 49 दिनों के शासन के बाद फरवरी 2014 में पद छोड़ दिया था। 2015 में ही विधानसभा चुनाव हुए और केजरीवाल की सत्ता में वापसी हुई। इसके बाद, सरकारी विज्ञापन के खर्चों में भारी उछाल आई और साल 2015-16 में 81.23 करोड़ रुपये खर्च किये गए। इसके बाद 2016-17 में मामूली गिरावट आई और खर्च घटकर 67.25 करोड़ रुपये हुआ। फिर 2017-18 में यह तेजी से बढ़कर 117.76 करोड़ रुपये हो गया। 2018-19 में 45.54 करोड़ रुपये हुआ। उसके बाद 2019-20 में चार गुना खर्च बढ़ा 199.99 करोड़ रुपये हो गया।
वहीं कोविड-19 महामारी 2020-21 के दौरान 293.20 करोड़ रुपये का खर्च हुआ। उसके बाद साल 2021-22 में 488.97 करोड़ रुपये का भारी भरकम खर्च किया गया। वहीं कोविड के दौरान अप्रैल, 2019 में सबसे कम 2.54 लाख रुपये और सबसे ज्यादा मार्च, 2021 में 125.15 करोड़ रुपये हुआ।












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