COP28: पर्यावरण और लोगों की जान बचाने के लिए छोड़ना होगा पेट्रोलियम उपयोग
COP28: अगर जल्दी हम पेट्रोलियम ईंधन के उपयोग को न्यूनतम नहीं करेंगे तो न तो हम अपना पर्यावरण बचा सकते हैं और न ही हर साल लाखों लोगों की जान। दुबई में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन, कॉप28 में साझा रूप से सभी देशों को पेट्रोलियम ईंधन के उपयोग में कटौती करने का आग्रह किया गया। इसी सम्मेलन में एक वैश्विक अध्ययन के हवाले से यह बताया गया कि 2019 में दुनिया भर में हुई 80 लाख से अधिक मौतों में से लगभग 60 प्रतिशत मौत का कारण पेट्रोलियम ईंधन से निकला प्रदूषण था। ऊर्जा जरूरतों का अभी भी 40 प्रतिशत से अधिक स्रोत पेट्रोलियम ईंधन से आता है।
भारत और चीन सबसे ज्यादा प्रभावित
एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है कि पेट्रोलियम ईंधन की जगह यदि नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग किया जाए तो दुनिया भर में वायु प्रदूषण से होने वाली प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख अतिरिक्त मौतों को रोका जा सकता है। उल्लेखनीय है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौतें चीन और भारत में होती हैं। वैज्ञानिकों ने दुबई में पेश किए गए अपने शोध में बताया कि चीन में वायु प्रदूषण से संबंधित मौतों की संख्या सबसे अधिक है। यहां प्रति वर्ष 24 लाख से अधिक मौतें वायु प्रदर्शन से होती हैं। भारत में भी इसके कारण 21 लाख से अधिक मौतें होती हैं।

भारत और चीन ही दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं और दोनों ही पेट्रोलियम ईंधन के सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं। चीन में 2022 में पेट्रोलियम तेल की खपत रोजाना 14.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी। 1998 से 2021 के बीच चीन में प्रति दिन 10 मिलियन बैरल से अधिक की खपत बढ़ती चली गई थी। भारत भी पहले से कहीं अधिक डीजल, पेट्रोल और पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का उपयोग कर रहा है। तेल मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2023 में समाप्त वित्तीय वर्ष में, भारत ने 222.30 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों की खपत की, जो पिछले वर्ष से 10.2 प्रतिशत अधिक है। हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता हैं।
कॉप 28 दुबई बैठक में भविष्य की तैयारी
2050 तक संयुक्त राष्ट्र के जलवायु तटस्थता के लक्ष्य के अनुरूप स्वास्थ्य में सुधार और जीवन बचाने के लिए पेट्रोलियम ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के उपायों पर कॉप 28 एक प्रभावी चर्चा हुई । कॉप28 में ब्रिटेन, जर्मनी, स्पेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थानों के वैज्ञानिकों ने कहा कि यदि पेट्रोलियम पदार्थों के उपयोग की जगह नवीकरणीय ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों तक हम पहुंच जाये तो वायु प्रदूषण का पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर जोखिम कम हो सकता है। ऐसा करना बहुत मुश्किल नहीं है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2020 में दुनिया भर में 29 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से उत्पन्न हुई और उम्मीद है कि 2023 और 2024 में वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में लगभग 55 प्रतिशत वृद्धि चीन से ही होगी।
लगातार गर्मी में इजाफा
इस वर्ष भी रिकॉर्ड गर्मी रही है। सूखा, लू, बाढ़ और मूसलाधार बारिश के कारण दुनिया भर में हजारों लोगों की जान गई है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के पेरिस समझौते पर प्रगति का जायजा लिया जाना बहुत जरूरी है, क्योंकि पेरिस समझौते का उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है और इसके लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना जरूरी है।
इस मामले में चीन और अमेरिका के बीच मीथेन और गैर-कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) ग्रीनहाउस गैसों पर संयुक्त शिखर सम्मेलन काफी महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि ये दोनों देश कार्बन उत्सर्जक देशों में शीर्ष पर हैं। पहली बार बीजिंग और वाशिंगटन 2035 तक उत्सर्जन-कटौती योजनाओं में मीथेन को शामिल करने पर सहमत हुए हैं। पहली बार चीन ने भी यह प्रतिज्ञा की है कि वह गैर-CO2 ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के साथ-साथ वन हानि और प्लास्टिक पर अंकुश लगाने के लिए मिलकर काम करेगा।
चीन खुद बहुत परेशान
चीन में भले ही पिछले दशक में वायु प्रदूषण कुछ कम हुआ है, लेकिन वह अभी भी काफी हद तक पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भर है। चीन की एक बड़ी जनसंख्या बूढ़ी हो रही है। इस कारण जोखिम भी बढ़ रही है। चीन में पुरानी बीमारियाँ तेजी से फ़ैल रही हैं, जो विशेष रूप से बुजुर्गों को प्रभावित करती हैं। सूक्ष्म कण (ज्यादातर पीएम2.5) और ऑक्सीडेंट (ज्यादातर ओजोन) फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर रहे हैं, जिससे श्वसन और हृदय रोग के साथ-साथ कैंसर की बीमारियां भी हो रही हैं। वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पुरानी बीमारियाँ बिगड़ जाती हैं जो मृत्यु दर बढ़ने का कारण बनती हैं।












Click it and Unblock the Notifications