Chinese Panda: चीन की "पांडा डिप्लोमेसी" को समझने लगे हैं अन्य देश
Chinese Panda: अमेरिका के राष्ट्रीय चिड़ियाघर में रह रहे तीन विशाल पांडा - मेई जियांग, तियान तियान और उनके शावक जिओ क्यूई जी को देखने आ रहे पर्यटक आँखों में आंसू लेकर जा रहे हैं क्योंकि ये तीनों दिसंबर की शुरुआत में ही चीन वापस लौट जाने वाले हैं। क्योंकि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा चीन के साथ किया गया 50 साल पुराना समझौता समाप्ति की कगार पर है। चिड़ियाघर ने हाल ही में पांडा पालूज़ा: ए जाइंट फ़ेयरवेल नाम से एक उत्सव का आयोजन किया था। हालाँकि दोस्ती और सौदा दो अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन चीन ने पांडा जैसे शांत जीव को भी डिप्लोमेसी का हिस्सा बना दिया है। उसकी यह पांडा डिप्लोमेसी विश्व राजनीति में बड़ी रणनीति की तरह उजागर हुई।
क्या है पांडा डिप्लोमेसी
सरल भाषा में पांडा कूटनीति या पांडा डिप्लोमेसी का मतलब है कि एक देश (मूल रूप से चीन) के शासक की ओर से दूसरे देश के शासक को अपना प्रिय पशु पांडा उपहार के रूप में देना, और इसके जरिये दोनों देशों के बीच आपसी रिश्ते को और मधुर बनाने की कोशिश करना। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। उपहार देने-लेने की परंपरा तो सदियों पुरानी है। पांडा डिप्लोमेसी के जरिये चीन सिर्फ रिश्ते नहीं जोड़ता है, वह इस कूटनीति के जरिये अपना कारोबारी हित और कई तरह की सहूलियत और रियायत को भी बदले में पाना चाहता है। साम्राज्यवादी विचारधारा वाला चीन कभी भी मुफ्त में रिश्ते नहीं बनाता है। पांडा को उपहार में देने का काम तो वह चालीस के दशक से कर रहा है, बाद में वह इसे पट्टा या लीज पर देने लगा।

राष्ट्रपति निक्सन और चीनी नेता माओत्से तुंग से पांडा का संबंध
सन 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन तब के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के निमंत्रण पर चीन की यात्रा पर गये। बीजिंग में जब उनकी मुलाकात चीनी नेता और पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के चेयरमैन माओत्से तुंग से हुई तो उन्होंने सिंबल ऑफ फ्रेंडशिप के नाम पर अमेरिका को दो पांडा देने का प्रस्ताव रखा। उस वक्त चीन अखंड सोवियत संघ से बिगड़ते रिश्ते को देखते हुए अमेरिका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहता था। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने उपहार को बहुत ही नम्रता से कबूल किया। उन्होंने भी चीनी नेता माओ को एक जोड़ा कस्तूरी बैल उपहार में दिया। इसके दो साल बाद 1974 में ब्रिटेन को भी पांडा दिया गया था। खुद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ ने इसे लेने की इच्छा जताई थी।
उपहार में पांडा ही क्यों दिया गया
पांडा भालू की शक्ल का एक विशाल सुंदर जानवर है, जो दुनिया में सर्वाधिक चीन में ही पाया जाता है। पांडा टेडी बियर जैसा दिखते हैं, इसलिए देखने में अच्छे लगते हैं। इन्हें चीनी भाषा में झुयांगमाओं कहा जाता है। ये स्वभाव से बेहद आलसी, समूह में रहने वाले और बांस खाने के आदी होते हैं। एक पांडा दिन भर में 35 से 40 बांस खा जाता है। दुनिया में बांस की सबसे ज्यादा पैदावार चीन में होती है, लिहाजा सबसे ज्यादा पांडा चीन में ही हैं। इसलिये चीन ने पांडा को सिंबल ऑफ फ्रेंडशिप का जरिया बनाया।
पांडा के नाम पर चीन की रणनीतिक मंशा
पांडा को बतौर उपहार देने का रिवाज चीन ने भले ही दोस्ती के नाम पर किया था, लेकिन उसकी मंशा सिर्फ दोस्ती ही नहीं थी। सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच शीत युद्ध के काल में चीन की रणनीति अपनी साम्राज्यवादी मंशा को पूरा करने में आ रही रुकावट को दूर करना था। चीन चाहता था कि एशिया में उसके छोटे-छोटे पड़ोसी उसकी गिरफ्त में रहें। यूं चीन ने अपने करीबी देशों को कभी देश नहीं माना, बल्कि वह उन्हें अपना हिस्सा ही मानता रहा है। इनमें ताइवान, हांगकांग, सेसेल्स, तिब्बत, मंगोलिया, वियतनाम, लाओस के अलावा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश को वह अब भी अपनी भूमि बताता है। चीन ने राष्ट्रपति निक्सन को उस वक्त अपने यहां आमंत्रित किया, जब वह सोवियत संघ से बढ़ती दूरी और खतरे की आशंका के बीच अपने रणनीतिक कार्यों में वैश्विक अवरोध से बचने के लिए अमेरिकी मदद का इच्छुक था। चीन की यह मंशा भी पूरी हुई।
चीन की लीज पॉलिसी क्या थी
80 के दशक में चीन को पता चला कि कई देशों के चिड़ियाघरों में कुछ पांडा की मौत हो गई है। ये वही पांडा थे, जिन्हें चीन ने बतौर उपहार उन्हें दिया था। चीन ने महसूस किया कि पांडा की मौत उनकी सही देखभाल नहीं होने और बेहतर रखरखाव में कमी की वजह से हुआ है। यह बात चीन को नागवार गुजरी। इसके बाद उसने अपनी नीति में परिवर्तन किया। अब चीन ने पांडा लेन-देन को लीज शर्त की तरह कर दिया। यानी किसी भी देश को चीन पांडा देगा तो उससे इसकी रकम वसूलेगा और निश्चित समय-सीमा के लिए ही देगा। शर्त यह भी रखी कि दूसरे देशों में जन्म लेने वाले पांडा के बच्चों को चीन अपनी अमानत मानेगा और उस देश को पांडा के बच्चों को चीन भेजना होगा।
अमेरिका का एतराज और फीस पर कानून
चीन ने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक खेलों के दौरान अमेरिका की मांग पर प्रति पांडा 50,000 डॉलर प्रति माह के हिसाब से दो पांडा भेजा। इससे चीन को काफी आर्थिक फायदा हुआ। सात साल बाद 1991 में चीन ने अपनी नीति में फिर बदलाव किया और तय किया कि अन्य देशों को केवल दस साल की लीज पर पांडा दिया जाएगा। इन शर्तों में प्रति वर्ष एक मिलियन अमेरिकी डॉलर फीस के रूप में लेने का प्रावधान भी शामिल था। दरअसल तब चीन ने कई देशों के चिड़ियाघरों को पांडा सीधे देना शुरू कर दिया था। यानी उस देश की सरकार से इस बारे में कोई बातचीत नहीं होती थी। अमेरिका ने 1998 में इस पर एतराज जताया और यह नियम बनाया कि उसके देश के चिड़ियाघर तभी पांडा को ले सकेंगे, जब चीन यह वादा करेगा कि वह अपनी फीस का आधा हिस्सा जंगली पांडा और उनके संरक्षण प्रयासों में लगाएगा। अमेरिका में बकायदा इसको लेकर अमेरिकी मछली और वन्यजीव सेवा नाम से एक कानून भी बनाया गया था।
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