अनुच्छेद 370 पर भाजपा और उसके मिथक

जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर संबंधी अनुच्छेद 370 के खिलाफ एक अभियान चलाकर 7 अगस्त 1952 में एक नारा दिया 'एक देश दो निशान, एक देश दो विधान, नहीं चलेगा।'
इस अनुच्छेद के विरुद्ध मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो 1980 में भाजपा के रूप में परिवर्तित हो गया। वस्तुत: भाजपा का उदय ही अनुच्छेद 370 के विरोध में हुआ। ऐसे में जब भी भाजपा राजनीति की चक्रव्यूह में फंसती है तो वह अनुच्छेद 370 की 'संजीवनी' का इस्तेमाल करती है।
राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह कहना है कि केंद्र सरकार जम्मू एवं कश्मीर के हर वर्ग के साथ बात-चीत के माध्यम से असहमति को सहमति में बदलने की कोशिश करेगी। असहमति को सहमति में बदलने के खिलाफ कश्मीर की अवाम का विरोध प्रदर्शन साफ करता है कि जम्मू एवं कश्मीर उनके लिए किसी आस्था का नहीं बल्कि स्वायत्ता व स्वतंत्रता से जुड़ा मसला है।
बहरहाल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर जितेंद्र सिंह तक इस अनुच्छेद को समाप्त करने का तर्क 'देश हित' के रूप में देते हैं, तब सवाल उठता है कि आखिर 'देश हित' क्या है?
दर्शनशास्त्र में ऐसे अमूर्त विचारों और सिद्धांतों को निरंकुशता के रूप में चिह्न्ति किया जाता है। दक्षिणपंथी राजनीति का यही 'देश हित' राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या को 'वध' बताकर तर्कसंगत साबित करता है। यही 'देश हित' 2002 गुजरात दंगे को 'क्रिया की प्रतिक्रिया' बताता है। गौरतलब है कि ऐसे तमाम शब्दों के आडंबर निरंकुशता व फासीवाद के पोषक होते हैं।
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दिसंबर 2013 में नरेंद्र मोदी ने एक रैली में अनुच्छेद 370 के लाभ-हानि को अपने 'विवेक' के तराजू पर तौलकर उसे समाप्त करने का ऐलान किया था। दक्षिणपंथी हिंदुत्वादी गुट अनुच्छेद 370 को लेकर लगातार एक भ्रामक प्रचार करते रहे हैं कि यह महिला विरोधी है।
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वे भ्रम फैलाते हैं कि जम्मू एवं कश्मीर की कोई महिला यदि देश के अन्य किसी व्यक्ति से शादी करती है तो वह अपनी संपत्ति के अधिकार के साथ ही साथ उसकी कश्मीर की नागरिकता भी समाप्त हो जाती है। जबकि महिला की संपत्ति और नागरिकता का संबंध अनुच्छेद 370 से नहीं, बल्कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य के संविधान के कानून से था, जिसे वहां के उच्च न्यायालय ने 2002 में ही समाप्त कर दिया था।
एक तरफ जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आने का न्योता दिया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ जम्मू एवं कश्मीर के नागरिकों को चिढ़ाने के लिए जिस तरह से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का बयान दिया गया, उससे स्पष्ट है कि यह सरकार इस मुद्दे का कोई तार्किक हल नहीं चाहती।
राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह कुछ सीटों और वोट प्रतिशत का हवाला देकर अनुच्छेद 370 की समाप्ति की बात करते हैं तो उन्हें यह जानना चाहिए कि भारत सरकार ने 'नोटा' का अधिकार जम्मू एवं कश्मीर के नागरिकों को नहीं दिया है, क्योंकि वहां के नागरिक जनमत संग्रह की बात लगातार करते आए हैं और भारत सरकार को यह खतरा था कि अगर वह वहां नोटा का अधिकार देगी तो वह उसके खिलाफ एक जनमत संग्रह का प्रमाणपत्र हो सकता है।
इसलिए भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि देश जुमलों से नहीं चलता, जम्मू एवं कश्मीर की अवाम को सेना से नहीं, बल्कि उनके अधिकारों के संरक्षण व उनकी स्वायतत्ता और स्वतंत्रता जैसे मसलों पर हमें गंभीर होना होगा।
कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर सेवानिवृत्त न्यायाधीश सगीर अहमद के नेतृत्व में मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा गठित पांचवीं कार्य समिति ने अपनी अनुशंसा में कहा है कि कश्मीर के लोगों को ही तय करना है कि वह अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा चाहते हैं या नहीं।
कश्मीर मसले का हल 'संघ कार्यालय' से नहीं, बल्कि कश्मीर की जनता से बातचीत से ही संभव है। जितेंद्र सिंह को बताना चाहिए कि अगर उनकी कश्मीर के लोगों से बातचीत थी तो उनके इस बयान के बाद वहां हो रहे विरोध प्रदर्शन का आधार क्या है। राज्यमंत्री के अतार्किक बयान के आधार को हम 'पाञ्चजन्य' के सोशल साइट्स पर देख सकते हैं। पर मंत्री महोदय को जानना चाहिए कि देश 'पाञ्चजन्य' से नहीं, बल्कि डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित संविधान से चलता है।
हिंदुत्वादी धारा कहती है कि अनुच्छेद 370 वास्तविकता के मुकाबले एक मानसिक बाधा है। जम्मू एवं कश्मीर में आखिर बाधा क्या है? प्रसिद्ध मानवाधिकार नेता गौतम नवलखा द्वारा जारी रिपोर्ट 'अत्याचार और पीड़ा' में बताया गया है कि पिछले दो दशक में उत्तर कश्मीर के मात्र दो जिलों- कुपवाड़ा और वारामूला के पचास गांव से 500 व्यक्ति या तो मार दिए गए हैं या तो अभी तक लापता हैं। वहां सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार जग जाहिर है।
जम्मू एवं कश्मीर तथा अनुच्छेद 370 पर बहस करने वालों को यह जान लेना चाहिए कि संविधान की यह धारा भारत और कश्मीर का एक पुल है, इसे खत्म करने का अर्थ कश्मीर से अलग होना ही है, इन सारे तथ्यों को नजरंदाज कर भाजपा दूसरा मुद्दा उठा रही है।
भाजपा के घोषणापत्र या संघ के मुखपत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि भाजपा की नीति में हथियारों का खेल खेलना प्रमुख एजेंडा होगा। अनुच्छेद 370 खत्म करने का बयान देश की तमाम सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को सशक्त बनाने के नाम पर देश में तनाव का वातावरण कायम कर जनता के बुनियादी सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश मात्र है, और कुछ नहीं।
(लेखक अनिल यादव लखनऊ के निवासी हैं)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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