बसंत के बहार में संगीत के सुर
संगीत की भाषा में मान्यता है कि नाद ब्रह्म है। यानी ध्वनि ही ईश्वर है। ऐसा इसलिए कि इस अस्तित्व का आधार कंपन है, नाद है। यही कंपन ही ध्वनि या नाद है। इसे हर इंसान महसूस कर सकता है। इस नाद को हम अपनी संासों में, अपनी दिल की धड़कन में, अपने चलने में, अपने बोलने में भी महसूस करते हैं। संगीत और ध्यान के लिए कहा जाता है कि अगर आप अपने भीतर एक खास अवस्था में पहुंच जाएं, तो यह पूरा जगत सिर्फ ध्वनि या नाद बन जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत इसी तरह के अनुभव और समझ पर आधारित है, इसी नाद के आराधक कलाकार होते हैं।

इन्हीं नाद आराधक कलाकारों के लिए दो दिवसीय संगीत समारोह का आयोजन पिछले दिनों त्रिवेणी सभागार में किया गया था। यह संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से सोसायटी फाॅर एडुकेशन हेल्थ एंड रूरल डेवलपमेंट और रागांजलि एकेडमी आॅफ परफाॅर्मिंग आट्र्स ने मिल कर किया था। समारोह की पहली संध्या में कथक नृत्यांगना अंजुला कुमारी, सितार वादक अनिमेष, शास्त्रीय गायक प्रवीण गांवकर और संतूर वादक डाॅ बिपुल कुमार राय ने शिरकत किया। समारोह की दूसरी संध्या में कथक नृत्यांगना अरूणा भारती स्वामी, वायलिन वादक पंडित संतोष नाहर और हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक प्रो ओजेश प्रताप सिंह ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।
समारोह का आरंभ कथक नृत्यांगना अंजुला कुमारी के नृत्य से हुआ। उन्होंने नृत्य का आगाज शिव स्तुति से किया। शिव तांडव स्त्रोत के अंशो पर आधारित यह प्रस्तुति सुंदर थी। उन्होंने कथक की तकनीकी पक्ष को तीन ताल में पिरोया। इसके बाद, नृत्यांगना अंजुला ने नायिका यशोधरा के भावों को अभिनय में दर्शाया। उन्होंने गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की वेदना को संचारी और आंगिक अभिनय के माध्यम से दर्शाया।
इस संगीत समारोह में शास्त्रीय गायक प्रवीण गांवकर जी गोवा से पधारे थे। उन्हें संगीत उनके पिता पांडुरंग गांवकर से विरासत में मिली है। वैसे उन्होंनेे आगरा घराने के पंडित कमलाकर नाइक से भी संगीत सीखा है। साथ ही, पंडित अजय चक्रवर्ती और पंडित सत्यशील देशपांडे के कुशल मार्गदर्शन में अपने उन्नत कौशल को निखारा है। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में राग पुरिया को शामिल किया। वहीं समारोह के अगले युवा कलाकार सितार वादक अनिमेष ने राग पटदीप बजाया। अनिमेष को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा आपके पिता पंकज विशाल से मिली। अनिमेष वर्तमान में पंडित शुभेंद्र राव के मार्ग दर्शन में उच्च स्तर का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के सितार वादक हैं। अपनी उम्र के अनुरूप अनिमेष ने स्तरीय वादन पेश किया। युवा सितार वादक को समय समय पर ऐसे मंचों पर प्रस्तुति का अवसर मिलेगा तो निश्चित ही उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा होगा। उनके साथ तबले पर मुस्तफा हुसैन ने बहुत संतुलित और सधी हुई संगत की।
पहली संध्या के अंतिम कलाकर डाॅ बिपुल थे। बिपुल ने संतूर वादन की शिक्षा सूफियाना घराने के मशहूर संतूर वादक पद्मश्री पंडित भजन सोपोरी से प्राप्त की है। उन्होंने राग मालकौंस बजाया। उनके साथ संगत करते हुए, तबले पर हिंदोल मजूमदार ने गतों को तालबद्ध किया।
त्रिवेणी सभागार में आयोजित इस समारोह की दूसरी संध्या में कथक नृत्यांगना अरूणा स्वामी ने संतुलित और सुघड़ता से कथक नृत्य पेश किया। उनके नृत्य में स्थिरता और परिपक्वता दिखी। वह गुरु सुनयना हजारीलाल की शिष्या हैं। उनके नृत्य में बनारस घराने की बानगी छनकर उभरती दिखी। उन्होंने कृष्ण वंदना से नृत्य आरंभ किया। यह वंदना आदि शंकराचार्य की रचना 'भजे ब्रजेका मण्डनम' पर आधारित थी। उन्होंने तीन ताल में शुद्ध नृत्त, खंडिता नायिका के भाव और चतुरंग को अपनी प्रस्तुति में समाहित किया।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक प्रो ओजेश प्रताप ने अपने सुरों से समां बांधा। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित उल्लास कशालकर के शिष्य हैं। सो ग्वालियर घराने की गायकी उनकी शैली में सहज ही दिखी। उन्होंने राग पूरिया और बसंत में बंदिशों को पेश किया। इसके साथ ही, वरिष्ठ वायलिन वादक पंडित संतोष नाहर ने राग पटदीप बजाया। उनका वादन मधुर, सुरीला, रसीला और मर्मस्पर्शी था। उनके साथ तबले पर जहीन खां ने संगत किया। जहां एक ओर ओजेश प्रताप ने मौसम के अनुरूप राग बसंत को गाकर, रस की अनुभूति को सार्थकता प्रदान किया, वहीं राग पटदीप का माधुर्य देर तक रसिकों को अपने घेरे में बांधे रखा। वाकई, वह शाम सुनकारों के लिए यादगार बन गई।
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