Bangladesh Pakistan Election: बांग्लादेश और पाकिस्तान में चुनाव, जनतंत्र पर हावी है दंडतंत्र

Bangladesh Pakistan Election: इस वर्ष 7 जनवरी को बांग्लादेश और 8 फरवरी को पाकिस्तान में चुनाव होने जा रहा है। भारत से अलग होकर बने ये दोनों इस्लामी देश अभी तक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे में खुद को ढाल नहीं सके हैं।

Bangladesh Pakistan Elections 2024 dictatorship dominates democracy

दोनों देशों के चुनाव हमेशा विवादों में रहते हैं। दोनों देशों में मार्शल लॉ भी लागू हो चुके हैं। बांग्लादेश में मार्शल लॉ 1975 से 1979 तक लागू रहा जबकि पाकिस्तान तीन बार सैनिक शासन के अधीन रहा। अब कहने को चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों देशों की प्रमुख राजनीनिक पार्टियां यह आरोप लगा रही हैं कि उनके खिलाफ जोर जबरदस्ती का इस्तेमाल कर उन्हें चुनाव मैदान से बाहर किया जा रहा है।

मौजूदा सरकार कटघरे में

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नेता रुमीन फरहाना कहती है कि जो कुछ हो रहा है उसे किसी भी तरह से चुनाव कहना उनके लिए असंभव है। लोग पहले से ही जानते हैं कि कौन सरकार में बैठेगा और कौन विपक्ष में। लोगों को यहाँ तक पता है कि कौन, किस सीट पर जीतेगा। जहां लोगों के पास मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों को निर्धारित करने की शक्ति नहीं होती, वहाँ चुनाव महज एक दिखावा है। मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं है।

धमकी और डर का माहौल

बांग्लादेश में लगभग 12 करोड़ मतदाता हैं। 300 सीटों के लिए लगभग 1,900 उम्मीदवार मैदान में हैं। अवामी लीग और उसकी सहयोगी जातीय पार्टी एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र से हिंसा की खबरें आ रही हैं। बांग्लादेश में इस बार ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव हो रहा है। इसलिए 7 जनवरी को भारी हिंसा होने की आशंका है। हालांकि बांग्लादेश के चुनाव का निरीक्षण कई देशों के प्रतिनिधि कर रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने बांग्लादेश के चुनाव को "एक-महिला का शो" करार दिया है। यह चुनाव शेख हसीना के लिए आगे और कठिन समय दिखाने वाला साबित हो सकता है, क्योंकि बांग्लादेश का आर्थिक संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। बैंक से नकदी गायब है और ढाका को तत्काल आईएमएफ़ और बड़े देशों से कर्ज चाहिए।

पाकिस्तान में पीटीआई पर सेना का शिकंजा

अप्रैल 2022 में सत्ता से बाहर होने के बाद से ही पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) और उसके सर्वमान्य नेता इमरान खान सैनिक अधिकारियों के कोपभाजन बने हुए हैं। इमरान खुद जेल में बंद हैं और बाहर उनकी पार्टी लगातार गतिरोध झेल रही है। मौजूदा सेना प्रमुख की नियुक्ति के समय से इमरान से सेना चिढ़ी हुई है, और 9 मई 2023 की घटना के बाद पीटीआई के खियाफ़ अभियान और तेज हो गया है। पार्टी से उनका पुराना चुनाव चुनाव चिह्न 'बल्ला' छीन लिया गया है।

पाकिस्तान का चुनाव आयोग भी पीटीआई के खिलाफ एक पार्टी बन गया है। चुनाव चिन्ह क्रिकेट बैट से वंचित करने के अलावा आयोग लगातार पीटीआई को अदालतों में ले जाकर परेशान कर रहा है। पार्टी के मौजूदा चेयरमैन गौहर कहते हैं कि - "चुनावी निगरानी संस्था हमारे मामले का ऐसे पीछा कर रही है जैसे उसने पहले कभी ऐसा नहीं किया था, ईसीपी का इस्तेमाल हर कीमत पर पीटीआई को घेरने के लिए किया जा रहा है।" उन्होंने सीधा आरोप लगाया है कि पाकिस्तान के हुक्मरान देश के 70 प्रतिशत से अधिक समर्थन रखने वाली पार्टी को रास्ते से हटाकर 20 या 25 प्रतिशत जन समर्थन वाली पार्टी को सत्ता देना चाहते हैं।

सेना से सुलह की कोशिश

बैरिस्टर गौहर अब सेना से समझौते के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। उन्होंने बयान दिया है कि पीटीआई को सैनिक प्रतिष्ठान सहित किसी के साथ कोई समस्या नहीं है। पीटीआई, इमरान खान और हम लगातार कहते रहे हैं कि देश हमारा है, सेना हमारी है। पीटीआई शक्तिशाली हितधारकों के साथ बातचीत करना चाहती है।

पाकिस्तान की जनसंख्या इस समय लगभग 25 करोड़ है और लगभग 13 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं। अरब का प्रमुख मीडिया अलजजीरा कहता है - पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान की कार्रवाई ने राजनीतिक भागीदारी को हतोत्साहित कर दिया है और यह धारणा बनने लगी है कि देश के वंशवादी राजनीतिक दलों में से किसी एक (पाकिस्तान मुस्लिम लीग या पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) के पक्ष में चुनावों में धांधली होगी।

ऐसे हालात में चुनाव में लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को नहीं मिल सकती है। उम्मीद है कि आने वाले चुनावों में मतदान का प्रतिशत भी पाकिस्तान के इतिहास में सबसे कम होगा। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए अदालतों ने उनके खिलाफ पिछली सजाओं को पलट दिया है और कई विश्लेषक उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री के लिए सेना के पसंदीदा उम्मीदवार के रूप में देखते हैं।

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