Khaleda Zia: कभी ताकतवर प्रधानमंत्री रही खालिदा जिया अब हाशिए पर
Khaleda Zia: बांग्लादेश में लगातार चौथी बार शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग की सरकार बन गई है। बीच में एक बार खालिदा जिया की भी सरकार रही है।

इस नई जीत के साथ ही शेख हसीना बांग्लादेश में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहने वाली शख्सियत बन जाएंगी। इस आम चुनाव का 15 विपक्षी दलों ने बायकॉट किया था, जिसका सीधा फायदा शेख हसीना को मिला। हसीना की पार्टी ने 300 सीटों वाली संसद में 223 सीटें जीतीं।
इधर ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में चुनाव परिणाम आने के बाद से ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख खालिदा जिया की तबीयत बिगड़ गई है। उन्हें ढाका के एवरकेयर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। जानते हैं कि कभी बांग्लादेश की फायर ब्रांड नेता रही खालिदा जिया कैसे हाशिये पर आ गईं।
खालिदा जिया और शेख हसीना की कहानी
बांग्लादेश का जन्म 1971 में पाकिस्तान के विभाजन से हुआ था। बांग्लादेश के जनक कहे जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान की मौत के बाद वहाँ तानाशाही आ गई थी। इस तानाशाही के खिलाफ मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना और 1975 से 1981 तक राष्ट्रपति रहे जिया उर रहमान की विधवा खालिदा जिया एक साथ राजनीति के मैदान में कूदीं। दोनों महिलाओं ने लोकतंत्र के समर्थन में कई प्रदर्शन किए। इन प्रदर्शनों की वजह से ही सैन्य तानाशाह जनरल इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी। साल 1991 में हुए चुनाव हुआ और खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बन गईं।
प्रधानमंत्री रहीं खालिदा कैसे हाशिए पर आ गईं?
बांग्लादेश के प्रमुख राजनीतिक दल बीएनपी के संस्थापक जिया उर रहमान के बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया ने पार्टी की बागडोर संभाली थी। जिया उर रहमान एक सैन्य शासक से राजनेता बने थे। खालिदा के प्रधानमंत्री बनने के कुछ साल बाद 1994 में शेख हसीना ने खालिदा जिया पर गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने शुरू कर दिए। उन्होंने मांग रखी कि एक कार्यवाहक सरकार की देख में अगला चुनाव कराया जाए। चुनाव हुआ और फिर से खालिदा चुनाव जीत गईं। शेख हसीना ने इस चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। 1996 में फिर से एक कार्यवाहक सरकार की निगरानी में चुनाव हुए। इस बार शेख हसीना जीत गईं और बांग्लादेश की दूसरी महिला प्रधानमंत्री बन गईं।
साल 2001 में आम चुनाव हुआ और इस बार फिर से खालिदा का गठबंधन जीत गया। इस दौरान खालिदा जिया की राजनीति का रुझान भारत विरोधी माना जाने लगा। कुछ अखबारों में इस आशय की रिपोर्ट छपी कि खालिदा के समय भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले कई आतंकी संगठनों के बांग्लादेश में कैंप सक्रिय हो गए थे।
खालिदा जिया के कार्यकाल में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने ढाका को भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना रखा था। इसका असर भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर भी पड़ रहा था। सत्ता में आने के बाद शेख हसीना की सरकार ने ना सिर्फ सभी भारत विरोधी कैंपों को बंद कराया, बल्कि कई आतंकवादियों को भारत को सौंपा भी।
2009 में बदली सत्ता और साथ में खालिदा जिया की किस्मत भी
साल 2006 में आम चुनाव कराने के लिए कार्यवाहक सरकार का प्रमुख कौन बनेगा? इस पर हसीना और खालिदा में सहमति नहीं बनी। इस कारण चुनाव को दो साल स्थगित करना पड़ा। इसी बीच कार्यवाहक सरकार के प्रमुख रहे फखरुद्दीन अहमद ने भ्रष्टाचार के मामलों में हसीना और खालिदा को जेल में डाल दिया। जब फखरुद्दीन को लगा कि अब देश में शांति है और चुनाव कराने चाहिए तो ऐसे में हसीना और खालिदा को जेल से रिहा किया गया। साल 2009 में शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग जीत गई। चुनाव जीतते ही शेख हसीना ने कार्यवाहक सरकार के नियम को खत्म कर दिया।
इसके बाद शेख हसीना की सरकार ने खालिदा जिया के कार्यकाल के दौरान किए गए भ्रष्टाचारों की फाइल खोलनी शुरू की। मीडिया रिपोर्ट्स बताते हैं कि साल 2001 से 2006 के दौरान बांग्लादेश भ्रष्टाचार के मामले में नंबर वन बन गया था। खालिदा के दोनों बेटों ने हर सरकारी ठेका देने में जमकर भ्रष्टाचार किया और सरकारी खजाने को खाली करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी। यहां तक कि बच्चों के अनाथालय के लिए विदेशों से आए करोड़ों डॉलर का भी गबन कर लिया था। इसके बाद खालिदा और उनके बेटों के खिलाफ कई तरह के आरोप लगाए गए और उन्हें जेल में डाला गया।
भ्रष्टाचार के इन्हीं मामलों में ढाका हाईकोर्ट ने अक्टूबर, 2018 में खालिदा जिया को 10 साल की सजा सुनाई। जबकि उसी महीने जिया चैरिटेबल ट्रस्ट के भ्रष्टाचार से जुड़े एक अन्य मामले में उन्हें 7 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। खालिदा जिया और उनका बेटा तारिक करीब दर्जन भर अन्य मामलों में भी मुख्य आरोपी हैं।
दरअसल, पिछले एक दशक के दौरान खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी संकट में घिरी है। भ्रष्टाचार के मामले में खालिद जिया जेल गईं तो पार्टी के सामने नेतृत्व संकट गहरा गया। बाद में बीएनपी ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन किया, जिसके बाद यह पार्टी धीरे-धीरे पिछड़ती चली गई। दूसरी ओर बांग्लादेश निर्माण के समय पाकिस्तान का साथ देने के लिए जमात-ए-इस्लामी के कई बड़े नेताओं को भी जेल में डाल दिया गया। इसकी वजह से काफी प्रदर्शन हुए।
जमात-ए-इस्लामी पर कसा नकेल
जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी है और खालिदा जिया की सबसे बड़ी समर्थक है। इसलिए 2009 में सत्ता वापसी के बाद शेख हसीना ने अपनी प्रतिद्वंद्वी खालिदा की पार्टी की अहम सहयोगी, जमात के शीर्ष नेताओं पर जनसंहार और युद्ध अपराधों को लेकर कई तरह के मुकदमे चलाए। 2013 से अब तक जमात के कई नेताओं को फांसी और उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
इसके बाद बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी को आम चुनावों में हिस्सा देने की इजाजत देने से इनकार कर दिया। तब जमात-ए-इस्लामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 2013 में प्रतिबंध को हटाने की अपील की। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक प्रावधान का हवाला देते हुए जमात के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। इसके बाद चुनाव आयोग में इसका पंजीकरण रद्द कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तब इसके राजनीति में हिस्सा लेने पर रोक नहीं लगाई थी, लेकिन यह किसी चुनाव चिह्न पर एक दल के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकती थी।
लंदन में निर्वासित जीवन जी रहा बेटा
रिपोर्ट के मुताबिक खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। तारिक को साल 2004 में शेख हसीना की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में सजा दी गई थी। इस तरह से मां-बेटे की गैर मौजूदगी में एक मजबूत पार्टी आज पूरी तरह से कमजोर हो गई है।
हालांकि, मार्च 2020 में खालिदा की तबीयत ज्यादा खराब होने के कारण सरकार ने उन्हें जेल से रिहा करने की इजाजत दे दी थी। बांग्लादेशी कानून और न्याय मंत्री अनीसुल हक ने तब कहा था कि उनकी रिहाई की शर्तों में कहा गया है कि वह इलाज कराने के लिए ढाका स्थित अपने आवास में ही रहेंगी और विदेश नहीं जाएंगी। तभी से खालिदा जिया ढाका में अपने घर पर हैं, तब से किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में नहीं देखी गई हैं। हाल के महीनों में तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया है।












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