Balasaheb Deoras: आरएसएस के तीसरे प्रमुख थे बालासाहब देवरस, जिन्होंने संघ को दी एक नयी दिशा
मधुकर दत्तात्रेय देवरस का प्रचलित नाम बालासाहब देवरस था। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक (1973-1994) थे। उनका जन्म 11 दिसंबर 1915 को नागपुर में हुआ, लेकिन उनका पैतृक गांव मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का कारंजा था। उनके पिता नागपुर में एक सरकारी कर्मचारी थे। उनके छोटे भाई भाऊराव देवरस भी आजीवन संघ के प्रचारक रहे और उन्होंने संघ के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साल 1927 में बालासाहब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे। वह स्वयंसेवकों के उस पहले समूह में शामिल थे, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार द्वारा नागपुर के मोहिते बाड़ा में शुरू की गयी संघ की पहली शाखा में हिस्सा लिया था।
बालासाहब से प्रभावित थे गुरु गोलवलकर
दो बार राज्यसभा सांसद रहे भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी के अनुसार बालासाहब के व्यवहार तथा नेतृत्व क्षमता को देखते हुए संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) स्वयंसेवकों से कहा करते थे कि आपमें से जिन लोगों ने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को नहीं देखा, उन्हें बालासाहब को देखना चाहिए। आपको इनमें डॉ. हेडगेवार दिखेंगे। गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि बालासाहब देवरस के कारण ही मैं सरसंघचालक कहलाता हूं।
बालासाहब को मिला संघ में दायित्व
साल 1937 में बी.ए. एल.एल.बी. की पढ़ाई के बाद बालासाहब देवरस नागपुर के नगर कार्यवाह बने। 1939 में उन्हें प्रचारक बनाकर कलकत्ता भेजा गया, लेकिन 1940 डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया और नागपुर का प्रांत प्रचारक बनाया गया। क्योंकि, पूरे देश में संघ के कार्य में विस्तार के लिए नागपुर केंद्र का मजबूत होना आवश्यक था, इसलिए संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर ने बालासाहब को नागपुर की ही जिम्मेदारी सौंपी। देवरस 1962 में सह-सरकार्यवाह, 1965 में सरकार्यवाह और गोलवलकर के निधन के बाद 1973 में संघ के सरसंघचालक बने।
बालासाहब के सरसंघचालक काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कांग्रेस सरकार द्वारा दो बार प्रतिबंध भी लगाया गया। पहली बार, आपातकाल के दौरान 1975 में इंदिरा गांधी की सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया, जो मार्च 1977 में इंदिरा गांधी के चुनाव में हार जाने के बाद हटा लिया गया। दूसरी बार, अयोध्या में बाबरी ढांचे को गिराए जाने के बाद 10 दिसंबर 1992 को केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसे छह महीनों के अंदर ही हटाना पड़ा।
आपातकाल के दौरान जेल में रहे कैद
साल 1973 में बालासाहब देवरस संघ के सरसंघचालक बने। दो साल बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल लगा दिया। 30 जून को देवरस को गिरफ्तार करके पुणे की यरवदा जेल भेज दिया गया। इसके साथ ही, इंदिरा गांधी की सरकार ने 4 जुलाई को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसे 1977 में हटा दिया गया। 21 मार्च 1977 को आपातकाल के खात्मे के बाद बालासाहब जेल से बाहर आए। इस दौरान वह 20 महीनों से भी ज्यादा समय तक जेल में रहे।
जेल से बाहर आने के बाद 11 अप्रैल को बालासाहब देवरस ने दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता में बताया कि आपातकाल के दौरान संघ के लगभग 25 हजार से भी अधिक स्वयंसेवकों को 'मीसा कानून' के तहत गिरफ्तार किया गया था और इतने ही लोग 'डी.आई.आर. कानून' के तहत जेलों में बंद थे। इसके साथ ही लगभग एक लाख स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करके अपनी गिरफ्तारियां भी दी। कुल मिलाकर लगभग डेढ़ लाख स्वयंसेवक विभिन्न जेलों में आपातकाल के दौरान बंद रहे। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि आपातकाल के दौरान पूरे भारत में 70 व्यक्तियों की जेलों में मौत हुई, जिनमें से 60 लोग संघ से संबंधित थे।
छुआछूत पर बालासाहब के विचार
मई 1974 में पुणे की वसंत व्याख्यानमाला में बालासाहब देवरस ने अपने व्याख्यान में कहा कि छुआछूत अपने समाज की विषमता का एक अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। जानकारों का कहना है कि प्राचीन काल में छुआछूत का कोई अस्तित्व नहीं था। समय बीतने के साथ इसकी जड़ें मजबूत होने लगीं। वास्तविकता चाहे कुछ भी हो, लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि छुआछूत एक भयंकर भूल है और उसका पूर्णतया उन्मूलन जरूरी है। इस अवसर पर देवरस ने कहा कि अब्राहम लिंकन ने दास-प्रथा के बारे में कहा था कि "यदि दासता गलत नहीं है, तो कुछ भी गलत नहीं है।" ठीक उसी प्रकार अब हम सभी को यही सोचना चाहिए कि "यदि छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है।"
अतः हम सभी के मन में सामाजिक विषमता के उन्मूलन का ध्येय अवश्य होना चाहिए। हमें लोगों के सामने यह बात स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए कि विषमता के कारण हमारे समाज में किस प्रकार दुर्बलता आई और उसका विघटन हुआ। उसे दूर करने के उपाय बताने चाहिए तथा इस प्रयास में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि हिंदू समाज के किसी भी वर्ग को अन्याय व अत्याचार का पुतला कहकर कोसते रहना और अपमानित करना ठीक नहीं है।
उनका आत्मबल बनाए रखकर नए प्रकार के अच्छे सामाजिक व्यवहार के उदाहरण और आदर्श उनके सामने रखे जाना जरूरी है। अखिर वे सभी हिंदू समाज के ही अंग हैं। अतः उनका स्वाभिमान भी बना रहे, इसका हमें खास ध्यान रखना होगा।
शोषितों, वंचितों के लिए कार्य
गरीबों, वंचितों, दलितों और आदिवासियों के उत्थान के लिए बालासाहब देवरस ने संघ के स्वयंसेवकों से विचार-विमर्श करने के बाद 2 अक्टूबर 1979 को 'सेवा भारती' नामक संस्था का गठन किया। यह संस्था स्कूल, पुस्तकालय, संस्कार केंद्र, विशेष बच्चों के लिए कोचिंग सेंटर जैसे शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हजारों परियोजनाओं को निर्बाध रूप से चला रही है। इसके अतिरिक्त बाल कल्याण, स्वास्थ्य, आपदा और राहत कार्यों में भी यह संस्था अग्रणी भूमिका निभाती है।
मीनाक्षीपुरम की घटना पर बालासाहब का बयान
साल 1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सैकड़ों दलित परिवारों ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम अपना लिया। इस घटना से भारत के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मच गई। इस सामूहिक धर्मांतरण पर बालासाहब देवरस ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसमें कोई दो मत नहीं है कि धर्मांतरण के पीछे बाहरी तत्व और बाहरी धन के स्रोत हैं, लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है।
मैं इस बात से सहमत हूं कि हिंदू समाज में तरह-तरह के दोष पैदा हुए हैं और इसके कारण भी हिंदू समाज के सामने समस्याएं पैदा हुई हैं। हमारा अपने ही समाज के लोगों की ओर ध्यान नहीं जा रहा है और उनके साथ हम अन्यायपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं, जो कि धर्मांतरण का एक बड़ा कारण है। इस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है। बालासाहब के इसी चिंतन से संघ ने सामाजिक समरसता या समाज को जोड़ने वाले प्रयासों की शुरुआत की।
लंबे समय तक मधुमेह की बीमारी के कारण जब बालासाहब को लगा कि अब वे स्वस्थ नहीं हो सकते, तो उन्होंने 11 मार्च 1994 को प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) को संघ का सरसंघचालक नियुक्त कर दिया। एक सरसंघचालक के जीवित रहते दूसरे सरसंघचालक को नियुक्त करने की परंपरा की शुरुआत बालासाहब देवरस ने ही की थी। 17 जून 1996 को बालासाहब देवरस का निधन हो गया।
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