Sector 36 Review: कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है 'सेक्टर 36', विक्रांत मैसी को देख खड़े हो जाएंगे रोंगटे
फिल्म- सेक्टर 36
स्टारकास्ट- विक्रांत मैसी, दीपक डोबरियाल
डायरेक्टर- आदित्य निंबालकर
ओटीटी प्लेटफॉर्म- नेटफ्लिक्स
स्टार- ***
Sector 36 Film Review: साल 2006 में नोएडा के निठारी गांव में हुए हत्याकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस केस में नोएडा के सेक्टर 31 की एक कोठी के पीछे वाले नाले से करीब दो दर्जन बच्चों के नर कंकाल बरामद हुए थे। कई कंकाल तो जमीन में गड़े हुए मिले थे। इस मामले में कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उनके नौकर सुरेंद्र कोली आरोपी थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सुरेंद्र कोली ने बच्चों के साथ जबरदस्ती की थी और उन्हें बेदर्दी से मौत के घाट उतारने के आरोप को कबूल किया था। इस मामले में पहले दोनों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि बीते साल सबूतों के अभाव में दोनों को बरी कर दिया गया।

अब फिल्म 'सेक्टर 36' इसी हत्याकांड की यादों को ताजा करती नजर आ रही है। हालांकि फिल्म के मेकर्स इसे सिर्फ कई सच्ची घटनाओं से प्रेरित बता रहे हैं पर असल में ये निठारी केस की ही तमाम परतें खोलती नजर आ रही है। विक्रांत मैसी की फिल्म सेक्टर 36 आज यानी 13 सितंबर 2024 को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है।
'सेक्टर 36' मूवी की कहानी
-फिल्म 'सेक्टर 36' की कहानी एक कोठी में शुरू होती है, जहां प्रेम सिंह (विक्रांत मैसी) सोफे पर लेटे हुए टीवी पर करोड़पति बनाने वाला शो देख रहा होता है। शो खत्म होने पर वह उठता है, प्लेट में पड़ी हड्डियां साफ करता है और ऊपर अपने कमरे में पहुंचता है, जहां पहले से बंधी हुई एक स्कूली बच्ची को बेरहमी से मौत के घाट उतार देता है। ये पहला ही सीन आपके रोंगटे खड़ा कर देगा।
- फिल्म में आगे पता लगता है कि कोठी के पास की बस्ती से लगातार बच्चे गायब हो रहे हैं। बच्चों के पैरेंट्स थाना प्रभारी इंस्पेक्टर राम चरण पांडे (दीपक डोबरियाल) के पास लगातार शिकायत दर्ज कराने आ रहे हैं, पर पांडे जी को लगता है कि इस गरीब बस्ती के बच्चे गायब नहीं हो रहे हैं, बल्कि खुद ही भाग रहे हैं।
-इसके बाद एक शाम थाना प्रभारी इंस्पेक्टर राम चरण पांडे की बेटी अगवा होने के कगार पर आ जाती है। तब राम चरण पांडे का जमीर जागता है और इस हत्याकांड को लेकर वह एक के बाद कई चौंकाने वाले खुलासे करता है।
'सेक्टर 36' मूवी रिव्यू
-निर्देशक आदित्य निंबालकर ने अपनी पहली ही फिल्म में संवेदनशील और सनसनीखेज रह चुके विषय को चुना है, जिसे वह गंभीरता से स्क्रीन पर उतारने में कामयाब साबित हुए हैं। फिल्म के डायरेक्टर ने ऐसे वारदात करने वाले साइकोपैथ की मनोदशा, अमीर-गरीब की खाई, सिस्टम की खामियां जैसे पहलुओं को भी बखूबी दर्शाया है।
-फिल्म में बहुत ही बातों को बड़ी ही बारीकी से दिखाया गया है जैसे कि अमीर बिजनेसमैन के बेटे को दो दिन में खोज निकालने वाली पुलिस गरीब बच्चों की गुमशुदगी को लेकर दो साल तक कुछ नहीं करती है।
-फिल्म के कई सीन बहुत ही जानदार हैं। अच्छी बात ये भी है कि बचपन के एक ट्रॉमा को वजह बताने के बावजूद वह आरोपी के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश नहीं करते।
फिल्म की स्टारकास्ट और उनकी एक्टिंग
-साइकोपैथ के रूप में विक्रांत मैसी ने दमदार एक्टिंग की है। वहीं इंस्पेक्टर के रोल में दीपक डोबरियाल भी काफी अच्छे लग रहे हैं। उन्होंने अपने कॉमिक किरदारों से बाहर निकलकर काफी शानदार काम किया है।
-फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू, एडिटिंग, बैकग्राउंड स्कोर जैसे तकनीकी पक्ष भी काफी सही हैं। लेकिन ये फिल्म कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। अगर आप क्राइम ड्रामा देखने के शौकीन हैं, तो क्रिमिनल साइकोलॉजी को दिखाती ये फिल्म आपको एक बार जरूर देखनी चाहिए।












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