Pushpa 2 Review: ठीक ठाक कहानी से वाइल्ड फायर बने अल्लू अर्जुन, 'पुष्पा 2' का खामियों और तारीफ से भरा रिव्यू

कास्ट- अल्लू अर्जुन, रश्मिका मंदाना, फहाद फासिल और जगपति बाबू

डायरेक्शन- सुकुमार

रेटिंग्स- 3 स्टार

साल 2021 में फिल्म पु्ष्पा आई,कोविड का दौर था। इसने पैन इंडिया सिनेमा लवर्स को थिएटर में जाने के लिए मजबूर कर दिया। फिल्म की जबरदस्त हाइप और बज बना हुआ था। फायदा मिला और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ कमाई की। हर किसी की चाहत थी कि अल्लू अर्जुन की पुष्पा को सिनेमाघर में जाकर देखा जाए। लोग पहुंचे भी और लगा कि कोविड के बाद एक बार फिर दर्शक अब लौट रहे हैं। ठीक तीन साल बाद इस फिल्म का सीक्वल आया है। नाम है Pushpa 2: The Rule (Review) ये 5 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। इस सीक्वल की भी उतनी ही हाइप है। नॉर्थ इंडिया में सुबह 7 बजे का शो 70% फुल मिला। हमने भी ये फिल्म देख ली है। अब हम आपको इस फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं। इस डिटेल रिव्यू में बताएंगे फिल्म की खामियां और अच्छाई।

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नेशनल से इंटरनेशनल तस्कर बना पुष्पा
पुष्पा द रूल की कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पहला पार्ट खत्म हुआ था। पुष्पा लाल चंदन की लकड़ियों की तस्करी करता है। यहीं उसकी एसपी भवंर सिंह शेखावत से दुश्मनी हो जाती है। इस बार पुष्पा राज अब नेशनल स्मगलर से इंटरनेशनल लेवल पर पहुंच गया है। वो चित्तूर का रहने वाला है। यहां हर काम उसके इशारे में होता है। यहां के लोग उसकी बात को भगवान के आदेश की तरह सुनते हैं। लेकिन फिर से अड़चन आती है, यानी एसपी भवंर सिंह शेखावत। इसी बीच पुष्पा को उसके जीवन का सबसे बड़ी डील मिलती है। 2000 करोड़ लाल चंदन की लकड़ियों की तस्करी की। जिसे उसे देश के बाहर पहुंचाना है। अब क्या होगा और क्या अड़चने आएंगी। यही पुष्पा 2 की फिल्म की कहानी है।

अल्लू का नेवरसीन अवतार
एक्टिंग की बात करें तो पुष्पा राज के किरदार में अल्लू अर्जुन इस बार ज्यादा खतरनाक दिखे हैं। उनका वाइल्ड फायर अंदाज दिखा है। वो जब एक्शन मोड में दिखे तो भी परफेक्ट लगे। लेकिन इमोशनल सीन में भी उन्होंने अपने अभिनय की दमदारी दिखाई है। एक सीन में जब उनकी पत्नी श्रीवल्ली सीएम से मिलने जाने पर कहती है कि फोटो जरूर खिचवाना। लेकिन सीएम के मना करने पर उसने प्रदेश की सत्ता बदल दी। ये सीन अच्छा है। इस बार पुष्पा अपनी पत्नी की इज्जत भी करता है। जतारा वाले सीक्वेंस में अल्लू का एक अलग अवतार दिखा है। एसपी भवंर सिंह के रोल में फहाद फासिल के बात ही अलग है। उन्होंने फिर इस बार फिल्म में जान ला दी है। उनकी किरदार को जबरदस्त तरीके से खड़ा किया गया। लेकिन उनको मरते हुए दिखाना बहुत कमजोर था। इसकी उम्मीद नहीं थी। रश्मिका मंदाना ने भी ठीक काम किया है। उनके हिस्से जो काम आया है, उसे निभाने की कोशिश की है। जगपति बाबू का काम भी ठीक दिखता है। हालांकि मेकर्स ने अनसूया को उतना यूज नहीं किया जितनी उनकी एक्टिंग अच्छी है।

लंबाई से फर्स्ट हाफ करता है बोर, क्लाइमैक्स में संभाला
डायरेक्शन और कहानी सुकुमार की ही है। पिछले पार्ट की तरह इस बार भी वो दोहरी भूमिका में हैं। इस बार उनकी लेखनी थोड़ी कमजोर पड़ी है। फिल्म का पहला हाफ कमजोर है, कहानी लचर लगती है। कुछ सीन जबरदस्ती के खींचे हुए से महसूस करवाते हैं। हालांकि उन्होंने सबकुछ क्लाइमैक्स के लिए बचाया हुआ होता है, जिसे वो आखिर में दिखाते हैं। लेकिन पहले हाफ में हमें कुछ ज्यादा देखने को नहीं मिलता है। इसकी सिनेमैटोग्राफी मिरोस्लॉ कूबा ब्रोजेक ने की है। ये उनका सुकुमार के साथ दूसरा काम है। सिनेमैटोग्राफी में मेहनत देखने को मिलती है। ऐसा लगता है कि मिरोस्ला ने गजब का काम किया है। फिल्म का जतारा वाला सीक्वेंस और उसकी लाइटिंग पूरी कमाल दिखते है। नवीन नूली ने फिल्म को एडिट किया है। उनके हाथ में बहुत कुछ था। वो उसका उपयोग भी कर सकते थे। जैसे की फिल्म की लंबाई को को काटना। वो एक बड़ा माइनस फैक्टर है, जो कि इस पार्ट में दिखाना लॉजिकल नहीं लगता है। खैर वो डायरेक्टर की डिमांड के आगे तो एडिटर भी कुछ नहीं कर पाता।

म्यूजिक में नहीं है दम
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर देवी श्री प्रसाद का है। लेकिन इस बार उनका काम बेहद हल्का दिखाई दिया है। कोई भी गाना इस बार चार्टबस्टर समझ नहीं आता है। पुष्पा 1 में एक से बेहतरीन एक गाने थे। लेकिन यहां ना किसिक और ना पीलिंग्स काम आया। दोनों औसत दिखाई देते हैं।

फि्लम की कुछ गंभीर खामियां
अब आते हैं फिल्म की खामियों की तरफ। 3 घंटे 15 मिनट की पुष्पा में कई खामियां हैं। जो हम अपने इस डिटेल रिव्यू में जरूर बताएंगे। पहली खामी तो यही है कि फिल्म बड़ी है,लेकिन उसकी लंबाई समझ आती है। दूसरी खामी ये है कि फिल्म साउथ के चित्तूर में सेट है, लेकिन लीड एक्टर मराठी बोलाता है। इसका क्या तुक है, ये पता नहीं चलता। मेकर्स ने भी इसे क्लियर करने की नहीं सोची। पुष्पा मराठी बोलता है, लेकिन उसकी बायको यानी श्रीवल्ली के मुंह से ऐसे शब्द देखने को नहीं मिलते। फिल्म का म्यूजिक भी इस बार की बड़ी खामी है।

हाइफ पर खरी उतरती पुष्पा
कुल जमा फिल्म पुष्पा द राइज अपने हाइप में खरी उतरती है। कुछ खामियों को छोड़ दें या सिनेमाई भाषा में सिनेमैटिक लिबर्टी को नजरअंदाज करें तो फिल्म देखी जा सकती है। फिल्म में मारधाड़ है लेकिन गाली गलौज नहीं है। ये पुष्पा यानी अल्लू अर्जुन का नेवरसीन अवतार भी है। जिस हिसाब से इसका बज बना है, वो सिनेमाघरों में भी देखने को मिलते हैं। दिल्ली एनसीआर में अर्ली मॉर्निंग शो भरे हुए हैं। यही हाल लेट नाइट शो का भी है।

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