Superboys Of Malegaon Review: रीमा की फिल्म में विनीत की एक्टिंग आदर्श, और शशांक तुम तो जबर एक्टर निकले यार

Movie Review- सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव (Superboys Of Malegaon Review)
एक्टर्स- शशांक अरोड़ा , आदर्श गौरव , विनीत सिंह , मुस्कान जाफरी , ऋद्धि कुमार , मंजरी पुपाला , अनुज दुहान , पल्लव सिंह , साकिब अयूब , ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ,
लेखक- वरुण ग्रोवर
निर्देशक- रीमा कागती
रेटिंग- 3.5 स्टार

Superboys Of Malegaon Review: 'आपके सपनो को नहीं पता आप कहां से आते हैं।' आप बड़े शहर के हैं, छोटे शहर के हैं, कस्बें के हैं या फिर गांव के हैं। सपने सबके होते हैं। वो अलग बात है कि सभी के सपनों की परेशानियां अलग होती हैं। बात ये भी होती है कि कुछ अपने सपने पूरे करने के पीछे लग जाते हैं। लेकिन कुछ के पास वो करने का माद्दा नहीं होता। जैसे फिल्म मेकिंग आज कई युवाओं का सपना है। कुछ ये सोच कर ठहर जाते हैं कि यार वहां तो बाहर वालों को मौका नहीं मिलता। ख़ैर आज एक ऐसे ही युवा की कहानी जिसने शोले देखने के बाद 'मालेगांव का शोले' बनाई थी। उसका नाम नासिर शेख है। उसने साइकिल में कैमरा रख उसे ट्रॉली और बैलगाड़ी को क्रेन के जैसे उपयोग किया। उसने अपने सपने मरने नहीं दिए। जिसके बाद उसे दुनियाभर में पहचान मिली। फिर बनी उसके ऊपर डाक्यूमेंट्री, जिसका नाम है 'मालेगांव का सुपरमैन। इसे फायजा अहमद खान ने बनाया। अब इसी डायक्यूमेंट्री पर रीमा कागती ने फिल्म बनाई है। आज इसी फिल्म पर दो-चार बात।

Superboys Of Malegaon Review

रीमा की कागती फिल्म 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' को जब आप देखना शुरू करते हैं। तब शुरुआत में भले ही ये थोड़ी आपको इतर बितर लगे, लेकिन ये धीरे धीरे आपको एक रुहानी यात्रा में ले जाती है। जिसका चरम इसका क्लाइमैक्स है। जिसे देख आपके मुंह से निकलेगा 'वाह'। साथ में आपके जेहन में कुछ बातें रह जाएंगी। दोस्ती, गहरी यारी, इसमें होने वाली उलझने की और अंत में दोस्ती में सबकुछ ठीक हो जाने की बातें। इन सबके इतर कुछ किरदार और उनको निभाने वाले एक्टर, जो अपनी जगह आपके सीने में मुकम्मल बना लेते हैं। इस पर भी हम विस्तार से बातें करेंगे। लेकिन सबसे पहले आप फिल्म की कहानी जान लीजिए।

मालेगांव के सुपरस्टार्स की कहानी
फिल्म 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' की कहानी यूं है कि महाराष्ट्र का एक कस्बा है। जिसका नाम मालेगांव है, यहां मनोरजंन के लिए दो वीडियो पार्लर चलते हैं। एक दिन एक पार्लर पर पुलिस का लट्ठ पड़ता है। क्योंकि वहां पायरेसी की फिल्में दिखाई जाती हैं। दरअसल, नासिर एक दिन नई फिल्म लेने शहर जाता है। यहां उसे एक दुकानदार हराम और हलाल की फिल्मों के बारे में समझता है। जिसके बाद वो उसी में टूट पड़ता है। वो अपने फिल्म मेकिंग के सपने को पूरा करने की शुरुआत कर देता है। जहां वो बनाता है मालेगांव का शोले। जिसमें कोई वीरू और कोई ठाकुर और गब्बर भी बन जाता है। सारे दोस्तों ने जब मिलकर ये 'शोले' की स्पूफ बनाई तो हिट हो गई। जिसके बाद उनके कदम रुके नहीं। लेकिन एक दिन उन्हीं का दोस्त कहता है कि यार ओरिजनल फिल्म बनाते हैं। कबतक नकल बनाते रहेंगे। यहीं से फिल्म नया मोड़ लेती है और वो देखने को मिलता है जो मजा दिलाता है।

राइटर होता है बाप
फिल्म में एक लाइन है राइटर बाप होता है। पूरी फिल्म इसके इर्द गिर्द घूमती है। तो शुरुआत फिल्म की लेखनी से, 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' को वरुण ग्रोवर ने लिखा है। और क्या लिखा है। यहां उनकी तारीफ करनी पड़ेगी। भले ही बतौर कॉमेडियन उनके तेवर आपको पसंद न आएं। लेकिन 'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' के राइटर के रूप में उन्होंने अपना दिल जीता है। फिल्म के कई डायलॉग ऐसे हैं जो आपके दिमाग में छप जाते हैं। जैसे- "वाहियात काम का टाइम नहीं मेरे पास.., ओरिजिनल का मतलब भी जानता तू..", "घर जो है वो लौटकर आने वाले की सूरत देखता है, हाथ नहीं..." और "कोई अपनी पहली मोहब्बत भुला दे, ये मैं भी नहीं चाहती..." ये कुछ ऐसी लाइन है जब आप सुनते हो तो एक अलग जगह पहुंचते हो। फिल्म को लेखन और डायलॉग ने बड़ा ही मुकम्मल बनाया है।

फिल्म में स्टार नहीं एक्टर हैं
फिल्म में एक्टर्स की भरमार हैं। यहां एक्टर्स इसिलए भी लिख रहा हूं कि ये स्टार या सुपरस्टार नहीं हैं। इन्हें एक्टिंग आती है इसलिए एक्टर लिखना ही शोभा देगा। शशांक अरोड़ा , आदर्श गौरव , विनीत सिंह , मुस्कान जाफरी , ऋद्धि कुमार , मंजरी पुपाला , अनुज दुहान , पल्लव सिंह , साकिब अयूब , ज्ञानेंद्र त्रिपाठी , और अनमोल खजानी जैसे एक्टर हैं। इस फिल्म के प्रमोशन और पोस्टर हर जगह आदर्श गौरव की ही चमक दिखी है। फिल्म में उनका काम भी अच्छा है। लेकिन इस चमक के पीछे एक और हीरा दमक रहा है।

जिसका नाम शशांक अरोड़ा है। उन्होंने फिल्म शफीक नाम के आदमी का किरदार निभाया है। जो फिल्म 'आनंद' के आनंद जैसा है। इस किरदार में उन्हें देखना एक अद्भुत अनुभव है। उनका किरदार और अभिनय आपकी आंखों को पानी से डबडबा देगा। उनका आखिरी सीन पूरी फिल्म की जान है। उनका ये डायलॉग 'जाना तो सबको है इस दुनिया से डरने का क्या है। कुछ बिना कुछ किए चले जाएंगे। एक चांस मिलता था, कछ बन सकता था।' आपको सोने नहीं देगा, अगर आप सपने देखते हैं। विनीत कुमार सिंह भी हैं। उन्होंने जिस बारीकी और जेहनी तरीके से इस किरदार को निभाया है, उसमें कुछ हैरानी नहीं होती। वो इसलिए क्योंकि विनीत एक ऐसे ही एक्टर हैं। उन्हें आप किरदार दीजिए वो सबको अभिनय का पाठ पढ़ा देते हैं। इसमें भी विनीत ने वो सब कुछ किया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं। इसके अलावा फिल्म के सभी बॉयज ने अपने किरदारों में जान डाली है। ऐसा काम किया है कि उनकी तारीफों पर एक कॉपी अलग से लिखी जा सकती है।

जरुरी है रीमा कागती की फिल्में
'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' 131 मिनट यानी 2 घंटे 11 मिनट की फिल्म है। मैंने अपनी बात की शुरुआत में ही बताया था फिल्म एक जर्नी में ले जाती है। इसलिए इसे इत्मीनान से देखना बहुत जरूरी है। रीमा ने इसे बड़े ही जहीन और महीने तरीके से बुना है। इसकी बुनावट में आपको वो सारे संदर्भ मिलते हैं जो आपको फिल्ममेकिंग का पाठ पढ़ाते हैं। उदाहरण के तौर पर एक सीन है जहां सलून में बैठा आदमी बाल कटवा रहा है, कैमरा पैन होकर दीवार में बने मिथुन चक्रवर्ती के फोटो पर जाता है। जिसमें उनकी आयकॉनिक हेयर स्टाइल दिखती है और फिर कैमरा पैन हुआ और वैसी कटिंग का किरदार फ्रेम में आता है। वैसे ही उस जमाने में जावेद अख्तर के साथ फोटो खिचाने वाले को सेलेब्रिटी मानने वाले लोग भी बड़ी बखूबी दिखाया है। हालांकि म्यूजिक और प्रोडक्शन डिजाइन में फिल्म थोड़ा मार खाती है। इसे देखने के बाद ये जरूर कहा जाएगा कि थिएटर में ये फिल्म चले या न चले। लेकिन रीमा आपको हर एक ऐसी फिल्म जरूर बनाना चाहिए। जिससे सिनेमा और एक्टर्स को देखना का मौका मिले।

फिल्म को इसके बॉयज की वजह से जरूर देखनी चाहिए। चाहे शशांक का अभिनय हो या फिर नासिर बने आदर्श गौरव का। राइटर बने विनीत को सच में कमाल हैं। रीमा और वरुण का काम भी उम्दा है। फिल्म आप देखिए और अपनी राय बनाइए। मेरी बात यहीं तक। जब आप फिल्म देख लें, फिर कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं कैसी लगी फिल्म।

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