Do Patti Review: शश्श्श्श....आवाज उठाओ, सोशल मैसेज वाली कृति!

कास्ट- कृति सेनन, काजोल, ब्रिजेंद्र काला, तन्वी आजमी और विवेक मुश्रान

डारेक्टर- शशांक चतुर्वेदी

रेटिग- 4 स्टार्स

जुर्म करना ही गलत है। फिर भी जुर्म करने से ज्यादा बड़ा गुनाहगार उसे सहने वाला होता है। ये जानते हुए भी लोग जुर्म सहते हैं। इसे सबसे ज्यादा महिलाएं सहती हैं। क्यों? किस डर से? 21 शताब्दी में जीने के बाद भी आज महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। उनके पति उन्हें छोटी-छोटी बातों पर मारते हैं। खाने में नमक कम है, मनपसंद सब्जी नहीं बनाई, किसी दूसरे के सामने ऊंची आवाज में बात आदि-इत्यादि। ये वही पुरुष हैं जो घर के बाहर भीगी बिल्ली होते हैं, लेकिन अपनी पत्नियों को मार कर खुद को मर्द समझते हैं। घरेलू हिंसा से हर साल सैकड़ों महिलाएं अपनी जान खो बैठती हैं या अपनी जान ले लेती हैं। लेकिन वो अपने पति के खिलाफ आवाज नहीं उठातीं। क्योंकि उनको लगता है कि ऐसा करने से हमारे घर और परिवार की इज्जत उछल जाएगी। वो अपने पति की हिंसा को ही अपने तर्कों से जायज बताने लगती हैं। क्यों? क्यों वो नहीं उठाती हैं अपनी आवाज? किस डर से? क्या हमारा कानून उन्हें उचित न्याय नहीं दे पाता? या फिर उन्हें अपने शरीर से ज्यादा शादी बचाना सही लगता है?

ऐसी ही कहानी सौम्या की है। जिसने बचपन में अपनी मां को खो दिया। इसका असर उसपर इतना गहरा रहा कि वो अवसाद में चली गई। इसके लिए वो तरह तरह की गोलियां खाने लगी। उसकी जुड़वा बहन शैली भी है, जो उसकी विपरीत है। दोनों के बीच खूब लड़ाई होती, जिसके बाद पिता ने उसे हॉस्टल भेज दिया। कुछ दिन बाद पिता की भी मौत हो गई। शैली ने घर आना बंद कर दिया। सौम्या अभी भी अपने आप और भीतर के डर से जूझ रही है। उसके जीवन में ध्रुव आता है। वो सौम्या के जीवन को उलट-पलट कर देता है। दोनों के बीच प्यार का बीच पनपना शुरू करता है, लेकिन इसी बीच शैली आ जाती है। इसके बाद कहानी में उतार चढ़ाव आता है और कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन क्लाइमैक्स में खेल बदल जाता है।

do patti review in hindi

कृति का काम अच्छा
दो पत्ती में कृति सेनन हैं, उन्होंने डबल रोल किया है। सौम्या और शैली। दोनों ही किरदार उनकी पर्सनालिटी पर सूट करते हैं। ऐसा लगता है कि सौम्या और शैली दोनों ही असल जीवन की कृति हैं। उन्होंने अपने काम को अच्छी तरह से निभाया है। उनका काम धीरे धीरे और निखर रहा है। पिछली फिल्मों से ज्यादा इस बार उन्होंने कुछ नया और अलग करने की कोशिश की है। ये उनका पहला डबल रोल है। उस हिसाब से भी उनका काम ठीक है। पुलिसवाली के किरदार में काजोल हैं और उन्होंने गजब का काम किया है। काजोल का काम और रोल अब थोड़े अलग होते जा रहे हैं। लेकिन उनके हिस्से डायलॉग बेहद हल्के हैं। शहीर शेख ने ध्रुव का किरदार निभाया है। रोल के मुताबिक वो एक बड़े रईस व्यक्ति के बेटे हैं, लेकिन उनके हाव भाव से वो नहीं लगते हैं। उनके पिता भी ऐसे नहीं हैं, रसूखदार हैं। हरकते नहीं। इस फिल्म में काम देखकर ऐसा लगा कि शहीर को अभी बहुत मेहनत करने की जरूरत है। डायलॉग्स में लिखी गाली कैमरे के सामने बोलना, एक्टिंग नहीं होती है। बाकी सपोर्टिंग रोल में ब्रिजेंद्र काला, तन्वी आजमी और विवेक मुश्रान का काम अच्छा है।

कनिका को मेहनत और नवाचार से रूबरू की जरूरत
फिल्म को कनिका ढिल्लों ने लिखा है। इसके पहलो हसीन दिलरुबा और कई अन्य फिल्म लिख चुकी हैं। कनिका को समझना होगा कि किस कहानी को आप दर्शकों के सामने कहने जा रहे हो। साथ ही जब आप कहानी भारत में सेट कर रहे हो तो वहां के अनुसार चीजें भी होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, भारत में इंडियन पीनल कोर्ट की जगह भारतीय न्याय सहिंता के हिसाब से सजा और धाराएं लगाई जाती हैं। लेकिन कनिका अभी भी इस जानकारी से अनभिग्य हैं। उनकी लिखी हुई कहानी के किरदार फिल्म में कहते नज़र आ रहे हैं कि मनोहर कहानी सुना रहे हैं। ठीक इसी तरह कनिका ढिल्लों को एक अच्छ सब्जेक्ट की फिल्म को मनोहर कहानी में तब्दील कर दिया। कमजोर कहानी और डायलॉग से हुए डैमज को डायरेक्टर शशांक चतुर्वेदी भी कंट्रोल नहीं कर पाए। उनका काम भी औसत ही है। उनकी तरफ से ट्रीटमेंट में कोई अच्छा काम नहीं हुआ है। फिल्म का म्यूजिक सचेत परंपरा ने दिया है। इस फिल्म को म्यूजिक थोड़ा ऊंचाई देने की कोशिश करता है।

दो पत्ती में कृति और काजोल ने एक अच्छे सब्जेक्ट को समाज के सामने उठाने की कोशिश की है। इस लिहाज से फिल्म को देखना चाहिए और घरेलू हिंसा से जूझ रही महिलाओं को सपोर्ट करना चाहिए। 2 घंटे 6 मिनट की इस फिल्म को एक बार तो देखा जा सकता है। फिल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। मेरी बात यहीं तक, आप भी देखिए और अपनी राय बनाइए।

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