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छत्तीसगढ़: जहरीले सांपों से लोगों की जान बचाने वाले बालोद के सर्पवीर, अपनी पहचान को मोहताज

आज हम आपको छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में एक सपेरों के गांव में लेकर चलते हैं, जहां इन सपेरों के बच्चे सांपो से किसी खिलौने की तरह खेलते हैं। इन ग्रामीणों का जीविकोपार्जन बेजुबान जीवों के प्रदर्शन से ही होता है।

बालोद, 02 अगस्त। आज देश भर लोग नांग पंचमी (Naga Panchami)मना रहे है। बचपन में हमे इस दिन स्कूलों में सिखाया जाता था कि वन्य जीवों की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन आज हम आपको छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में एक सपेरों के गांव में लेकर चलते हैं, जहां इन सपेरों के बच्चे सांपो से किसी खिलौने की तरह खेलते हैं। इन ग्रामीणों का जीविकोपार्जन बेजुबान जीवों के प्रदर्शन से ही होता है। अपना जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचाने वाले सपेरे आज भी अपनी पहचान को तरस रहें हैं।

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70 साल से करते आ रहें हैं सांप पकड़ने का काम
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम पंचायत सिवनी जिन्हें सपेरों के बस्ती के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव में 25 सपेरों का परिवार रहता है जिनकी जनसंख्या करीब 100 है। इन सपेरों की बस्ती में एक विशेष घेरा बना होता है। इन सपेरों के मुखिया हरिकिशन बताते हैं कि सांप पकड़ने का काम इनके परिवार में कई पीढ़ी से चला आ रहा है। इनके गुरुओं ने उन्हें यह हुनर सिखाया है। सर्प दंश के इलाज भी इनके पास है। ये सभी बूढ़ा देव को अपना कुल देवता मानकर पूजा करतें हैं।

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कोरबा से विस्थापित आज भी पहचान को मोहताज
ग्राम पंचायत सिवनी भेलन राम कोर्राम बताते हैं कि इस बस्ती में ऐसे लोग रहते हैं, जो हर वर्ष सैकड़ों लोगों की जान बचाते हैं। यह सभी कोरबा जिले के हैं। बांगो जलाशय के निर्माण के दौरान इन सब का घर डूबान क्षेत्र में आया. जिसके बाद यह घुमंतू की तरह जीवन यापन करने लगे। आज लगभग 40 वर्षों से इसी गांव में निवासरत हैं। यह स्वयं को गोंड आदिवासी बतातें हैं। लेकिन इनके पास कोई प्रमाण पत्र नही होने से जिला प्रशासन भी इन्हें कोई सुविधा मुहैया नही करा पा रहा है।

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विशेष रूप से मनाया जाता है नागपंचमी पर्व
दरअसल इन सपेरों का होली दीपावली की तरह कोई पर्व विशेष नही होता लेकिन आज नाग पंचमी का दिन सपेरों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन सभी एक जगह एकत्रित होकर नागदेवता, व भगवान शंकर की पूजा अर्चना करते हैं। और नांगपंचमी को विशेष पर्व के रूप में मनाते हुए सपेरे अपने पूरे परिवार के साथ विधि विधान से सांपों की पूजा-अर्चना कर ऋषि पंचमी पर पकड़े हुए सांपों को जंगल में छोड़ आते हैं।

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शिक्षा का अभाव रोजगार के नही मिले साधन
सपेरों के मुखिया के अनुसार आज भी इन्हें आज भी अपने पहचान के लिए भटकना पड़ता है। घुमन्तु होने के कारण इनके पास कोई स्थायी पता ठिकाना नही है। लेकिन बालोद के सिवनी में ही ये सभी 40 साल से निवास कर रहें है। इसके बाद भी उन्हें उनकी पहचान नही मिल पाई। बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए कई परेशानियां आ रही है। यहा के बच्चे सिर्फ सिर्फ 5 वी कक्षा तक ही शिक्षित है। शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद आज वहां रहने वाले दर्जनों बच्चे मजदूरी करने पर मजबूर हैं। 100 लोगों की बस्ती मे केवल एक ही बच्चा हाई स्कूल की पढ़ रहा है और बाकी बचे बचे खेल कूद कर समय व्यतीत कर रहे हैं. जिसके चलते इनके बच्चे भी अपने परिवार की वर्षों पुरानी परंपरा सपेरों के कार्य करने पर मजबूर हो जाते हैं।

साल के 6 माह सांपो से होता है गुजारा
ग्राम सिवनी के इन सपेरों की बस्ती में निवास करने वाले अधिकतर युवा या तो मजदूरी करते हैं या फिर शहरों में जाकर सर्पों कब प्रदर्शन कर जीवनयापन करते हैं। ये सपेरे विभिन्न प्रजाति के जहरीले सांप को अलग-अलग टोकरी में रखकर साल के 6 महीने शहर और गांव में लोगों के घर-घर जाकर दिखाते हैं। जिन पर लोग अपनी श्रद्धा से कुछ पैसे या अनाज इन सपेरों को दान करते हैं ।

फारेस्ट के स्नैक कैचर से पहले इन्हें बुलातें हैं लोग
शहरों व गांवों में अधिकतर इन सपेरों को अपने निवास पर सांपो का रेस्क्यु करने बुलाया जाता हैं। आसपास से शहर के लोग वन विभाग के स्नैक कैचर से पहले इनको खबर करते हैं। आपको इनके पास कई प्रजाति के सर्प मिल जाएंगे। सांप का रेस्क्यू करने के बदले लोग उन्हें कुछ उपहार स्वरूप राशि भी देते हैं। ये हर वक्त इसके लिए तैयार रहते हैं इसलिए लोग इन्हें सांप पकड़ने बुलाते हैं. सांप कितना ही जहरीला क्यों ना हो उसे पकड़ कर अपने साथ ले आते हैं और पूजा-अर्चना करने के बाद उसे जंगल में छोड़ आते हैं।

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