छ.ग. के खजुराहो में भगवान शिव को जलाभिषेक करने उमड़ा जनसैलाब, जानिए भोरमदेव मंदिर का इतिहास
छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरमदेव मंदिर में यूं तो साल भर पर्यटकों की भीड़ रहती है। लेकिन सावन और शिवरात्रि के माह में यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
कवर्धा, 22 जुलाई। छत्तीसगढ़ के पुरात्तव, धार्मिक, पर्यटन और जन आस्था का केंद्र के रूप से प्रसिद्ध ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर की ख्याति पूरे देश में फैली है। छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरमदेव मंदिर में यूं तो साल भर पर्यटकों की भीड़ रहती है। लेकिन सावन और शिवरात्रि के माह में यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। हर साल कवर्धा जिले में प्रसिद्ध बूढ़ा महादेव से भोरमदेव तक की पदयात्रा सावन महीने में की जाती है। जिसके लिए जिला प्रशासन का पूरा अमला इसकी तैयारियों में लगा जाता है। इस साल भी 18 जुलाई से इस पदयात्रा की शुरुआत हो चुकी है, जो सावन माह तक चलेगी ।

दो साल बाद शुरु हुई पदयात्रा
इस पदयात्रा की परंपरा यूं तो कई सालों से चली आ रही है। लेकिन प्रशासनिक तौर पर साल 2008 से शुरू हुई, यह पदयात्रा कोविड के संक्रमण बढ़ने के कारण व लॉकडाउन के चलते पिछले 2 साल से स्थगित कर दी गई थी। दो साल बाद फिर अब पूरी तैयारी के साथ इस पदयात्रा को शुरू किया गया है जिस में शामिल होने प्रदेशभर से लोग बड़े उत्साह से कवर्धा पहुंच रहे हैं। वर्तमान में भी कोविड की स्थिति को देखते हुए। कलेक्टर जनमजेय महोबे के निर्देश पर जिला प्रशासन ने तमाम इंतजाम किए हैं।

पंचमुखी बूढ़ा महादेव से भोरमदेव मंदिर तक की पदयात्रा
हर साल कवर्धा के बूढ़ा महादेव से भोरमदेव मंदिर तक 18 किमी पदयात्रा के रास्ते पर हर 2 किलोमीटर पर पेयजल, चाय-नाश्ता का इंतजाम किया गया है । भोरमदेव मंदिर परिसर में महोत्सव स्थल और मेला स्थल पर पार्किंग दी गई है। इसके अलावा 5 जगहों पर धर्मशाला व सामाजिक भवन काे पदयात्रियों के विश्राम के लिए रिजर्व रखे हैं। यही नहीं, भोरमदेव में जलाभिषेक करने आने वाले कांवरियों के लिए अलग से धर्मशाला रिजर्व है। इस 18 किलोमीटर लंबी पदयात्रा के साथ एंबुलेंस भी चलेगी। एंबुलेंस में डॉक्टर और इलाज की पूरी व्यवस्था रहेगी। ताकि पदयात्रा के दौरान अगर किसी पदयात्री की तबीयत बिगड़ती है, तो उसका तुरंत इलाज हो सकेगा। इस साल 18 जुलाई से शुरू हुई, यह पद यात्रा सावन महीने तक जारी रहता है।
अमरकंटक से भी पहुंचते हैं पदयात्री
सावन के पूरे माह कबीरधाम समेत दीगर जिलों से कांवरिए अमरकंटक (मप्र) पदयात्रा करते हैं। अमरकंटक से मां नर्मदा का जल लेकर पदयात्रा करते हुए भोरमदेव आते हैं। उन पदयात्रियों के पूरे माह कुकदूर और पोलमी में नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया जाएगा। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए गए हैं।
नागवंशी राजाओं ने कराया था भोरमदेव मंदिर का निर्माण
कवर्धा से करीब 16 किमी दूर चौरागांव में पर्वत समूह से घिरा यह भोरमदेव मंदिर करीब हजार साल पुराना है। इस मंदिर की बनावट खजुराहो और कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान है। यहां मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियां बनी हुई हैं। इस मंदिर में खजुराहो के मंदिरों की झलक दिखाई देती है, इसलिए इस मंदिर को "छत्तीसगढ़ का खजुराहो" भी कहा जाता है। यहां के एक और मंदिर है, जिसे मड़वा महल कहा जाता था। वहां पर भी इसी तरह की प्रतिमाएं दीवारों पर बनाई गई थी। मंदिर का मुख पूर्व की ओर है।
नागर शैली मे बना है मंदिर
यह मंदिर नागर शैली का एक सुन्दर उदाहरण है। मंदिर में तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है। मंदिर एक पाँच फुट ऊंचे चबुतरे पर बनाया गया है। तीनों प्रवेश द्वारों से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश किया जा सकता है। मंडप की लंबाई 60 फुट है और चौड़ाई 40 फुट है। मंडप के बीच में 4 खंबे हैं तथा किनारे की ओर 12 खम्बे हैं, जिन्होंने मंडप की छत को संभाल रखा है। सभी खंबे बहुत ही सुंदर एवं कलात्मक हैं। मंदिर को फिर 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपाल देव ने बनवाया था।












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