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दिल्‍ली हाईकोर्ट में खुद अरविंद केजरीवाल ने रखा पक्ष, कहा- मैं आरोपी नहीं, ट्रायल कोर्ट ने किया है बरी

दिल्ली हाई कोर्ट में आज जो हुआ, उसने न सिर्फ एक कानूनी बहस को जन्म दिया बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी साफ कर दिया। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी की तरह मजबूत, आत्मविश्वासी खड़े दिखे। उन्होंने बिना वकील के खुद अपनी बात रखी, तथ्यों के साथ, कानून के साथ और एक स्पष्ट नैरेटिव के साथ। उनकी दलीलों में आत्मविश्वास, सिस्टम पर सवाल और न्याय की मांग साफ दिखाई दी।

उन्होंने 10 ठोस कारणों के जरिए यह बताया कि उन्हें क्यों लगता है कि इस केस में जज की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं और जज को इस केस से हट जाना चाहिए।

AAP

आरोपियों को सुने बिना सेशन कोर्ट के आदेश को ग़लत बता दिया

9 मार्च की हाई कोर्ट में सुनवाई में 23 में से कोई भी आरोपी कोर्ट में मौजूद नहीं था। कोर्ट में केवल CBI मौजूद थी। पहली सुनवाई में ही बिना किसी आरोपी को सुने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने आदेश पारित कर दिया कि प्रथम दृष्टया सेशन कोर्ट का ऑर्डर गलत प्रतीत होता है। क्यों? कैसे? ऑर्डर का कौन सा हिस्सा गलत प्रतीत होता है? ये कुछ नहीं लिखा। बिना दूसरी साइड को सुने प्रथम दृष्टया ये राय जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कैसे बनाई? उस वक्त उनके सामने तो केवल CBI की दलीलें थीं।

ED ने कोई केस भी फाइल नहीं किया था या सेशन कोर्ट में ED के केस पे स्टे लगा दिया

9 मार्च को ही अपने आदेश में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इसी तथाकथित शराब घोटाले से संबंधित सेशन कोर्ट में चल रही ED की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी। हम आपको बता दें कि कानून किसी भी मामले में पहले कोई अपराध होता है जिसकी CBI या पुलिस FIR करती है और उस अपराध में जो गलत पैसा इकट्ठा किया जाता है जैसे रिश्वत का पैसा इत्यादि, उस पैसे को किस तरह से मनी लॉन्ड्रिंग की गई, उसकी जांच फिर ED करती है। तो अगर CBI या पुलिस के केस में अपराध ही साबित नहीं हो पाए तो ED का केस अपने आप बंद हो जाता है।

चूंकि इस केस में सेशन कोर्ट ने CBI के केस को खत्म कर दिया था तो ED का केस अगली एक तारीख में खत्म हो जाता। लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सेशन कोर्ट को ED का केस खत्म करने पे रोक लगा दी। सबसे बड़ी हैरानी की बात ये है कि केंद्र सरकार, ED या CBI ने ऐसा करने के लिए उनके सामने कोई प्रार्थना भी नहीं की थी। बिना प्रार्थना के अपनी तरफ से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने रोक कैसे लगा दी? ये सोचने वाली बात है।

CBI के जांच अधिकारी ने कोर्ट में केस भी नहीं फाइल किया था फिर उसके खिलाफ कार्यवाही पे रोक लगा दिया

CBI का केस इतना ज्यादा फर्जी था कि सेशन कोर्ट के जज ने CBI के जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का निर्देश दिया। सेशन कोर्ट के जज के आदेश में लिखा है कि इस पूरे मामले में पहले तय कर लिया गया था कि कैसे और किसको फंसाना है और उसके बाद वो साबित करने के लिए सबूत बनाये गए। तो ये जांच नहीं थी ये एक पूर्व निर्धारित षड्यंत्र था।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने 9 तारीख के आदेश में CBI के जांच अधिकारी के खिलाफ सेशन कोर्ट द्वारा पारित आदेश पर रोक लगा दी। ये भी बड़े अचंभे की बात है क्योंकि CBI के उस अधिकारी ने अभी तक कोर्ट में अपने खिलाफ पारित आदेश को रुकवाने के लिए कोई आवेदन नहीं किया। बिना अधिकारी के आवेदन के अपने से इस तरह की रोक लगा देना सबके मन में शंका पैदा करता है।

आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए सिर्फ एक हफ्ते का टाइम दिया जबकि बाकी केसों में 5-6 महीने का टाइम देती हैं।

9 मार्च को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सभी 23 आरोपियों को आदेश दिया है कि इस मामले में अपना जवाब एक हफ्ते में दाखिल करें। 600 पेज के ऑर्डर और CBI की अपील के जवाब में इतने कम समय में रिप्लाई फाइल करना लगभग नामुमकिन है।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इतना कम समय क्यों दिया? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्योंकि उनके सामने अन्य मामलों में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कितना समय देती हैं - इस पर एक नजर डालनी चाहिए। उनके सामने अभी तक जितने मामले आए, हर मामले में वो तीन से लेकर सात महीनों तक की तारीख देती हैं। केवल इसी मामले में एक हफ्ते की तारीख दी। क्यों? इससे साफ जाहिर है कि इस मामले को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अस्वाभाविक स्पीड से खत्म करना चाहती हैं।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने आरोपियों के बेल एप्लीकेशन पे ऑर्डर करते समय उनको पहले ही दोषी करार कर दिया था

जब इस मामले के कई आरोपी जेल में थे तो उनकी बेल एप्लीकेशन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने लगी थी। ऐसे पांच लोगों की बेल एप्लीकेशन में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पिछले साल आदेश पारित किए थे। अक्सर बेल एप्लीकेशन में केस की मेरिट्स पर टिप्पणी नहीं की जाती। अपराध हुआ या नहीं हुआ, यह बात ट्रायल होने पर निचली अदालत तय करती है। बेल एप्लीकेशन में तो जज को केवल इतना बताना होता है कि बेल दी जाएगी या नहीं दी जाएगी।
इसके बावजूद जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पांचों मामलों में बेल की सुनवाई के वक्त ही उन पांचों आरोपियों की बेल खारिज करते हुए बड़े कठोर शब्दों में आदेश पारित किए कि ये सभी लोग उन अपराधों के दोषी हैं। इससे साफ जाहिर है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा शुरू से ही इस मामले में अपनी पूर्व-निर्धारित राय रखती हैं।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के ये सभी बेल ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिए

उन्होंने ना केवल उनके ऑर्डर खारिज करके सभी आरोपियों को बेल दी, बल्कि कुछ मामलों में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ सख्त टिप्पणी भी की।

  • जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा द्वारा पारित किए गए अभी तक के सभी आदेश दिखाते हैं कि वे CBI और ED की अधिकांश: सभी दलीलों और मांगों को मानती हैं। हां तक कि जो भी वो मांगते हैं, उनसे कहीं ज्यादा बढ़ चढ़ कर आदेश देती हैं। तुषार मेहता कोर्ट में मौखिक रूप से भी यदि कुछ बोल दें तो तुरंत उसका आदेश पारित कर दिया जाता है। ऐसे में उनसे न्याय कैसे मिलेगा।
  • जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के सरकारी वकील हैं और तुषार मेहता के अंडर में काम करते हैं। ऐसे में उनसे निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा RSS से जुड़ी संस्था के कार्यक्रमों में जाती हैं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वकीलों की एक विंग है जिसका नाम है अधिवक्ता परिषद। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अधिवक्ता परिषद की कम से कम 4 मीटिंग्स में अलग अलग समय पर हिस्सा ले चुकी हैं। इस मामले के जो आरोपी राजनीति से जुड़े हैं, वे सभी RSS की विचारधारा के मुखर विरोधी हैं, इसलिए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा, जो RSS के कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हैं, क्या वो इस केस में न्याय कर पाएंगी?

गृहमंत्री अमित शाह ने हाई कोर्ट का ऑर्डर पहले ही सबको बता दिया

अभी कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में श्री अमित शाह जी ने बयान दिया है कि केजरीवाल जी को हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा। उनका सीधे-सीधे इशारा है कि केजरीवाल जी हाई कोर्ट में हारेंगे और हाई कोर्ट का आदेश केजरीवाल जी के खिलाफ आएगा। माननीय गृहमंत्री ने ये बयान कैसे दिया?

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