Teacher's Day: लकवाग्रस्त होकर भी जला रहें हैं ज्ञान का दीप, शिक्षक रामेश्वर ने ठुकराया पेरिस का सम्मान
शिक्षक रामेश्वर सिंह वरकड़े का शरीर 70 प्रतिशत से अधिक लकवाग्रस्त है इसके बाद भी वे गांव के बच्चों को पढाकर शिक्षा की अलख जगा रहें हैं।
अम्बिकापुर, 05 सितम्बर। आज पूरा देश उन सभी गुरुजनों शिक्षकों को याद कर रहा है जिन्होंने अपने प्रयास से छात्रों की जिंदगी में बदलाव ला दिया। शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में ऐसे गुरु हैं जो अपने विशेष कार्य के लिए समाज में सम्मानित है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शिक्षक के बारे में बताने जा रहें हैं। जिन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता के बाद भी बच्चों में ज्ञान का दीप जला रहें हैं। शिक्षक रामेश्वर सिंह वरकड़े का शरीर 70 प्रतिशत से अधिक लकवाग्रस्त है इसके बाद भी वे गांव के बच्चों को पढाकर शिक्षा की अलख जगा रहें हैं।

लगन और मेहनत से हर कोई है अचंभित
अम्बिकापुर से लगभग 45 किमी दूर डुमरडीह गांव में रामेश्वर वरकड़े की पढ़ाने की लगन और मेहनत देख हर कोई अचंभित है। इनके एक दिन स्कूल न जाने से बच्चे नाराज हो जाते हैं। अनाथ व गरीब बच्चों को पढ़ाने की ऐसी ललक की स्कूल के साथ घरों में भी बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं।

पांच साल की उम्र में आया था बुखार
शिक्षक रामेश्वर सिंह ने बताया कि पांच साल की उम्र में उन्हें बुखार आया और धीरे-धीरे उनका शरीर सिकुड़ने लगा और बेहतर इलाज नहीं मिल पाया। घर में आर्थिक तंगी होने के कारण वे लकवा के शिकार हो गए। फिर भी पढ़ाई में लगन और रुचि ऐसी की तमाम बाधाओं के बीच कला साहित्य में स्नातक की डिग्री ली और बच्चों को पढ़ाने के काम में लग गए।

पढ़ाने से मना करते थे ग्रामीण,
कॉलेज की पढ़ाई के बाद घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण शिक्षक रामेश्वर सिंह को 2004 में मध्यान्ह भोजन का समूह चलाने वाले खाद्य विभाग से बच्चों को पढ़ाने के बदले महीने में दो क्विंटल चावल मिलता था। जिससे उनके परिवार का गुजारा होता था। रामेश्वर सिंह के अशक्तता को देखकर पहले ग्रामीण पढ़ाने से मना करते थे, लेकिन उनके पढ़ाने के तरीके ने ग्रामीण बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह भर दिया।

नही लिया दिव्यांग वाहन
डुमरडीह सरपंच बताते हैं कि रामेश्वर सिंह की मेहनत देख जिले के कई बड़े अधिकारी और मंत्री मुलाकात करने आ चुके हैं। प्रशासन इन्हें मुफ्त में दिव्यांग वाहन देना चाहता था, लेकिन उन्होंने लेने से इंकार करते हुए कहा कि वे शारीरिक रूप से भले कमजोर हैं, लेकिन मानसिक रुप से अभी भी स्वस्थ हैं।

अनाथ बच्चों का बनते हैं सहारा
शारीरिक रूप से दिव्यांग शिक्षक रामेश्वर की बच्चो को अशिक्षित रहने से बचाना चाहते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर व अनाथ बच्चों के अपने घर में रहने के सुविधा के साथ उन्हें पढ़ाते भी हैं। रामेश्वर सिंह कहते हैं कि यदि इन बच्चों को शिक्षित नही किया जाएगा तो ये अपने पेट की भूख मिटाने के लिए अपराध करना शुरू कर देते हैं, जिन्हें रोकना हर शिक्षक का दायित्व होता है। वे बताते हैं कि उनके पढ़ाए हुए छात्र अधिकतर सेना में भर्ती होते है, जिसके लिए वे छात्रों के मार्गदर्शित भी करते हैं।

रामेश्वर ने ठुकराया पेरिस का सम्मान
रामेश्वर सिंह के पढ़ाने के तरीकों से प्रभावित होकर मानव संसाधन विभाग पेरिस से तीन लोगों का प्रतिनिधि मंडल आया था। उन्हें पेरिस में बतौर मुख्य वक्ता और प्रेरणापूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित करने के लिए बुलाया, लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ के लिए समर्पित जीवन बताते हुए उनके न्यौते को ठुकरा दिया।












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