कैसे गोंड आदिवासियों ने अपना 'संविधान' बनाकर सिखाया शराब से बचने का तरीका
रायपुर: जिस दिशा में खुद को शिक्षित और सभ्य कहने वाले समाज के लोग अभी तक नहीं सोच पाए हैं, उस दिशा में गोंड आदिवासियों ने चौंकाने वाला कदम उठाकर दिखा दिया है। शराब (खासकर देसी शराब) का इस्तेमाल आदिवासी समाज में हमेशा से होता रहा है। यह उनकी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। उनके अपने पर्व पर भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। वह अपने देवताओं पर भी इसे अर्पित करते आए हैं। लेकिन, छत्तीसगढ़ के कवर्धा में हुए गोंड आदिवासियों के एक महासम्मेलन में उन्होंने अपना एक लिखित 'संविधान' बनाया है, जिसमें उन्होंने अपनी कई तरह की कुरीतियों पर रोक लगाने का संकल्प लेकर दिखा दिया है। उन्होंने अपने इस 'संविधान' बनाने के जो कारण बताए हैं, वह बहुत ही वाजिब हैं और समय के मुताबिक हैं।

प्रकृति और पर्यावरण के प्रेमी होते हैं गोंड
गोंड जनजाति को दुनिया के सबसे बड़े आदिवासी समूहों में से एक का दर्जा हासिल है। यह जनजाति ज्यादातर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में पाई जाती है। गोंडों की अपनी चार मुख्य उपजातियां भी हैं- राज गोंड, मदिया गोंड, धुर्वे गोंड और खटुलवार गोंड। इनमें राज गोंड सबसे प्रभावी माने जाते रहे हैं। लगभग हर आदिवासी समाज की तरह ही यह आदिवासी समुदाय भी प्रकृति और पर्यावरण के बहुत सजग रहा है। क्योंकि कई दूसरे आदिवासियों की तरह ही इनका भी विश्वास है कि धरती, पानी और हवा, इन सब पर ईश्वर का नियंत्रण होता है। इस तरह इनके जीवन में चावल और उससे जुड़े भोजन का भी बहुत महत्त्व है और इनके त्योहारों पर भी उसी का इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही इनके त्योहारी और सामाजिक जीवन में एक चीज की और बहुत ज्यादा प्रधानता है। वह चीज है- शराब। लेकिन, छत्तीसगढ़ के कवर्धा में हुए गोंड महासम्मेलन में इन्होंने इसी को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला लिया है।

'संविधान' बनाकर शराब-दहेज पर सामाजिक पाबंदी लगाई
गोंड आदिवासियों ने तय किया है कि अब से किसी भी त्योहार या कार्यक्रम में उनका समुदाय शराब का उपभोग नहीं करेगा। यही नहीं, जो ऐसा करता हुआ पाया जाएगा, उसपर दो हजार से पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। उस आदिवासी समाज के लिए यह बहुत क्रांतिकारी और प्रगतिशील बदलाव है, जिसमें देवताओं पर शराब चढ़ाना उनकी परंपरा में शामिल रहा है। लेकिन,अब इस समाज ने तय किया है कि वो अपने देवताओं पर शराब की जगह महुआ के फूल चढ़ाएंगे। गौरतलब है कि आदिवासी इलाकों में महुआ से बनी देसी शराब का खूब इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि जंगलों में इसके पेड़ बहुतायत से उपलब्ध हैं। लेकिन, गोंड महासम्मेलन में जो इनका अपनी रीति-रिवाजों से संबंधित 60 पेज का 'संविधान' तैयार किया गया है, उसमें शराब ही नहीं, दहेज लेने पर भी पूर्ण पाबंदी की बात शामिल है। इसके साथ ही इन्होंने शादियों के मौके पर मेहमानों की संख्या भी निश्चित कर दी है, जिसमें 50 से ज्यादा गेस्ट नहीं जुटेंगे और तिलक कार्यक्रम के मौके के लिए यह तादाद 20 निश्चित कर दी गई है।

पेड़ बचाने के लिए करेंगे 'मिट्टी संस्कार'
कवर्धा में आयोजित दो दिवसीय गोंड महासम्मेलन में छत्तीसगढ़ के पांच जिलों के अलावा एमपी और ओडिशा से समुदाय के लोग जुटे थे, जिनका शराब पर रोक लगाने का मुख्य मकसद ये था कि इसकी वजह से समारोहों और शादियों में कभी-कभी बहुत ही खराब स्थिति पैदा हो जाती है और लोग शराब पीकर उलटी-सीधी हरकतें करनी शुरू कर देते हैं। इसी तरह इन्होंने दहेज की जगह अपने 'पचाहार' परंपरा पर जोर देने का फैसला किया है, जिसमें दुल्हन को पांच तरह के बर्तन देने का रिवाज है। इसी तरह इस सम्मेलन में एक और महत्वपूर्ण फैसला लिए जाने की बात आ रही है कि पेड़ों की कटाई रोकने के लिए इस समाज ने अब मृत शरीरों को जलाने के बजाय मिट्टी में गाड़ने का फैसला किया है। गोंड समाज के लोगों का दावा है कि उनके यहां पहले भी दाह संस्कार की जगह 'मिट्टी संस्कार' की परंपरा रही है।

गोंड समुदाय की संस्कृति में स्थान का असर भी पड़ा है
वैसे विशेषज्ञों का कहना है कि गोंड समाज की संस्कृति में पूरी तरह से एक समानता नहीं नजर आती। वैसे हर जगह वो अपने ग्राम देवता और पूर्वजों की ही मुख्य रूप से पूजा करते हैं। चावल इनका पसंदीदा भोजन है, लेकिन आमतौर पर ये कोदो और कुटकी का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इनकी आपसी बोलचाल की भाषा गोंदी है, जो कि द्रविड़ परिवार से प्रभावित है, लेकिन इनकी कोई लिपि नहीं है। वैसे यह जिन इलाकों में रहते हैं, उनकी जुबान पर उसका भी खास असर नजर आता है। जैसे- हिंदी, तेलगू, मराठी और कन्नड़। (तस्वीरें-सांकेतिक)












Click it and Unblock the Notifications