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खजुराहो नृत्य महोत्सव का 5वां दिन, अपने स्वर्णिम वर्ष में ज्ञान, अनुभव और अपार यादें देने वाला महोत्सव

Khajuraho Dance Festival: 50वां खजुराहो नृत्य समारोह" के पांचवें दिवस शनिवार को कला के विविध आयामों का संगम हुआ। इस अवसर पर निदेशक उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी श्री जयंत भिसे ने आमंत्रित कलाकारों का स्वागत पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।

खजुराहो नृत्य समारोह नृत्य और समकालीन कलाओं का एक ऐसा गुलदस्ता है। जिसके गुलों की सुगन्ध दिन प्रतिदिन कलानुरागियों के मानस को तिलिस्मी दुनिया में लिए जा रही है। एक ऐसी दुनिया जहां की आबो हवा में भारतीय संस्कृति के संस्कार हैं।

Khajuraho Dance Festival,

जहां आकार को साकार किया जाता है, जहां सात्विकता है, शुद्धता है, जहां नव रसों और भावों का समावेश है। इस आबो हवा में चाक पर हाथों से मिट्टी को आकृति प्रदान करना हो या कला साधकों से सीखने की बात हो, लोक का सजीला संसार हो या लय-ताल की यात्रा हो, सब कुछ समाहित है।

नृत्य प्रस्तुतियों के तहत पांचवे दिन पंचानन भुयान, आराधना ओडिसी डांस फाउंडेशन, दिल्ली का छाऊ- ओडिसी, अमीरा पाटनकर एवं साथी, पुणे का कथक, राजश्री होल्ला एवं रेखा सतीश, बैंगलोर का कुचिपुड़ी और अनु सिन्हा एवं साथी, दिल्ली का कथक देख दर्शक मुग्ध हो गए।

पहली प्रस्तुति में गुरु श्री पंचानन भुयान और उनके समूह का छाऊ- ओडिसी नृत्य हुआ। श्री पंचानन ने अपने नृत्य की शुरुआत मंगलाचरण से की।शांताकारं भुजगशयनम श्लोक पर भगवान विष्णु को याद किया गया। मर्दल की ताल पर नर्तकों ने भाव प्रवण ढंग से यह प्रस्तुति दी। अगली प्रस्तुति में उन्होंने नृत्य और ताल के अनूठे संगम को पेश किया। रावण नृत्य नाटिका के एक अंश को इस प्रस्तुति में लिया गया था जिसमें रावण शिव को प्रसन्न करने यज्ञ कर रहा है।

इसमें ओडिसी के साथ मयूर भंज और छाऊ नृत्य शैलियों को भी समाहित किया गया था। इस प्रस्तुति में श्री पंचानन के साथ सुमित मंडल, दीपक कांदारी, जय सिंह, रोहित लाल ने भी नृत्य में साथ दिया। रतिकांत महापात्र की यह नृत्य रचना खूब पसंद की गई।

उन्होंने नृत्य का समापन लोकनाथ पटनायक द्वारा रचित उड़िया के भक्ति गीत सजा कंजा नयना कुंजे आ री से किया। राग आहिरी और ताल खेमटा की यह रचना खूब सराही गई। नृत्य रचना गुरु पंचानन और सुश्री प्रिय सामंत राय की थी। इन प्रस्तुतियों में स्निग्ध शिखा पत्त जोशी, बनीता पंडा, इशिता गांगुली, सुदेशना दत्ता, आस्था पांडा, पूजित कटारी, सुमित मंडल, जय सिंह, दीपक कांदारी एवं रोहित लाल ने साथ दिया।

जबकि मर्दल पर प्रफुल्ल मंगराज, गायन पर प्रशांत कुमार बेहरा, वायलिन पर गोपीनाथ, बांसुरी पर धीरज कुमार पाण्डे एवं मंजीरा पर प्रशांत कुमार मंगराज ने साथ दिया।

दूसरी प्रस्तुति पुणे की सुश्री अमीरा पाटनकर और उनके साथियों की कथक नृत्य की रही। उन्होंने राम वंदना से अपने नृत्य का आरंभ किया। मंगलाचरण स्वरूप की गई इस रचना में सीता स्वयंवर सेतु लंघन, रावण दहन की लीला को सुश्री अमीरा व साथियों ने बड़े ही सलीके से नृत्य भावों से पेश किया।

अगली प्रस्तुति चतुरंग की थी। राग देश की इस रचना में तराना सरगम, साहित्य, नृत्य के बोलों का अनोखा और सुंदर समन्वय देख दर्शक मुग्ध हो गए। सुश्री अमीरा ने अगली प्रस्तुति में राग पीलू में निबध्द ठुमरी - "ऐसी मोरी रंगी है श्याम" पर भाव नृत्य पेश किया। इसके बाद त्रिविधा में शुद्ध नृत्य के कुछ तत्व दिखाए जिनमें परमेलु और नटवरी बोलों की अनूठी बंदिशें शामिल थी। इन नृत्य रचनाओं की कोरियोग्राफी शमा भाटे की थी। जिनमें अवनि, ईशा, श्रद्धा, श्रेया, परिचिति प्रमोद व नयन ने साथ दिया।

जबकि चारुदत्त फड़के ने तबला, सुमित्रा क्षीरसागर ने हारमोनियम, विनय रामदासन ने गायन और अनूप ने वायलिन पर साथ दिया।
अगले क्रम में बैंगलोर से आईं राजश्री होल्ला और रेखा सतीश की जोड़ी ने भी अपने कुचिपुड़ी नृत्य से खूब रंग भरे। उन्होंने बतौर मंगलाचरण गणेश वंदना से नृत्य का आगाज किया।

आदत और सेत्तो नाता रागम की इस रचना में राजश्री और रेखा ने भगवान गणेश की बुद्धिमता को भावों से सब के सामने रखा। अगली प्रस्तुति में उन्होंने राग मलिका में पगी और मिस्त्र चापू ताल में निबद्ध भक्त प्रहलाद पट्टाभिषेकम की कहानी को नृत्य के जरिए पेश किया। इसमें प्रहलाद की भक्ति हिरण्यकश्यप के वध को ओजपूर्ण भावों से पेश किया गया।राजश्री और रेखा ने दुर्गा तरंगम में महिषासुर मर्दिनी की कहानी को कुचीपुड़ी शैली में अभिव्यंजक अंग संचालन से प्रदर्शित किया।

राग सनमुखप्रिया और आदिताल की इस रचना के अंत में नृत्यांगनाओं ने कांस्य थाली पर नृत्य किया।राजश्री और रेखा ने राग अहीर भैरव और आदि ताल की रचना पिबारे राम रसम से राम स्तुति कर नृत्य का समापन किया। ये रचना सदाशिव भ्रमेंद्र की थी जबकि डांस कोरियोग्राफी रेखा सतीश की थी।

सभा का समापन दिल्ली से पधारीं डॉ. अनु सिन्हा और उनके साथियों के कथक नृत्य से हुआ। उन्होंने मंगलाचरण में गणेश वंदना से नृत्य का आरंभ किया। राग देश और चोटी की बंदिश - प्रथम सुमिरन श्री गणेश.... के जरिए उन्होंने भगवान गणेश की बुद्धिमता शक्ति और समृद्धि को भावों में पिरोकर पेश किया। अगली प्रस्तुति में उन्होंने "जय राम रमा" पर भगवान राम की महिमा को सामने रखा। भैरवी की इस रचना में प्रेम समर्पण को बड़े ही सलीके से उन्होंने पेश किया। अगली पेशकश शिव आराधना की थी। "शंकर अति प्रचंड" मालकौंस के सुरों में भीगी और चोटी में बंधी इस रचना में उन्होंने शिव के प्रति आस्था और भक्ति के भावों को बड़े ही सजीव भावों में पिरोया। नृत्य का समापन उन्होंने ठुमरी -"ऐसी हठीलो छैल" पर भाव नृत्य से किया। राधा कृष्ण के प्रेम को इस ठुमरी से सजीव करते हुए सुश्री अनु ने रसिकों को मुग्ध कर दिया। कुछ प्रस्तुतियों में उनके साथ मुल्ले अफसर खां ने भी नृत्य किया। जबकि कोमल मिश्र, बृजेश कुमारी, श्रुति गुप्ता, अंशिका भदौरिया, अमान पांडे ने भी नृत्य में सहयोग किया।

कलावार्ता: खजुराहो नृत्य समारोह के पांचवें दिन की शुरुआत कलावार्ता की चौथी सभा के साथ हुई। देश की प्रख्यात कथक नृत्यांगनाएं पद्मश्री नलिनी कमलिनी के साथ कलाविदों को संवाद का अवसर प्राप्त हुए। नृत्य संसार की ऐसी जीवंत जोड़ी जिसने न सिर्फ नृत्य किया, बल्कि उसे जिया। यह कला समाज का सौभाग्य था कि खजुराहो के इस नृत्य समागम के बहाने उन्हें नलिनी कमलिनी जैसी विभूतियों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ।

उन्होंने संवाद में नई पीढ़ी के कलाकारों को संबोधित करते हुए कहा कि कला से प्रेम कीजिए, उसके हिस्से का एक-एक पल भी उसे दीजिए, यदि ऐसा करेंगे तो कला आपको वो एक-एक पल लौटाएगी, उसके साथ बेईमानी मत कीजिए, वरना कभी कुछ प्राप्त नहीं होगा। एक कलाकार निराकार को आकार देकर साकार करता है।

कलाकार कृष्ण नहीं, राधा नहीं, लेकिन वह उन्हें आत्मसात करता है तो वही भाव उसके नृत्य में से उमड़ कर आते हैं। उन्होंने अपने गुरु जितेंद्र महाराज को याद करते हुए कहा कि हम अपने गुरु की फिक्र सबसे पहले करते थे। एक वाकया याद करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे गुरुजी दिल्ली के करोल बाग की एक बस्ती में रहा करते थे। हम दोनों बहनें अपने गुरुजी के भोजन हेतु अपने घर से नमक, मसाले इत्यादि लेकर जाते थे। उन्होंने कहा कि गुरु के शिष्य नहीं बल्कि उनका विश्वास बनिए, फिर देखिए वह कैसे इसे सार्थक करता है। जीवन में तृप्ति का नहीं, तृष्णा का भाव होना चाहिए, क्योंकि तृप्ति विराम देती है और तृष्णा अग्रसर करती है।

लोकरंजन: मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग एवं जिला प्रशासन, छतरपुर, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, नागपुर के सहयोग से खजुराहो नृत्य समारोह परिसर में 20 से 26 फरवरी तक प्रतिदिन शाम 5 बजे से पारंपरिक कलाओं के राष्ट्रीय समारोह लोकरंजन का आयोजन किया गया है, जिसके चौथे दिन महाराष्ट्र का सोंगी मुखौटा एवं श्री भाविक दान एवं साथी, गुजरात द्वारा गढ़वी गायन की प्रस्तुति दी गई।

श्री भाविक दान एवं साथी, गुजरात द्वारा गढ़वी गायन की प्रस्तुति दी गई, जिसमें उन्होंने सोनबाई आई के गीत...,पीठड आई के गीत..., शिवाजी महाराणा प्रताप और चारणी भाषा में दोहा और छंद प्रस्तुति दी। समारोह की शुरुआत सौंगी मुखौटा नृत्य से की गई। सौंगी मुखौटा नृत्य महाराष्ट्र और गुजरात के बीच सीमांत गाँवों में निवास करने वाले जनजातियों का मूल नृत्य है। यह अत्यन्त आकर्षक रंग-बिरंगी वेशभूषा और हाथ में रंगीन डंडे लेकर प्रस्तुत किया जाता है।

लयशाला: खजुराहो नृत्य समारोह की अनुषांगिक गतिविधि "लयशाला" की चौथी सभा में कला रसिक और नई पीढ़ी के कलाकार भरतनाट्यम एवं कथक जैसी महत्वपूर्ण शैलियों के विविध आयामों से रूबरू थे। भरतनाट्यम के सुप्रसिद्ध गुरु मनु मास्टर ने दक्षिण भारत की प्रमुख नृत्य विधा पर संवाद सह प्रदर्शन किया।

उन्होंने बताया कि भरतनाट्यम को सिर्फ प्रदर्शन कला समझना ही काफी नहीं है, यह अनुष्ठानिक नृत्य शैली है, जिसका आध्यात्मिक महत्व अधिक है। उन्होंने तंजावुर वाणी के अड़वों का सूक्ष्म रूप से विवरण प्रस्तुत किया, साथ ही नृत्य की ताल और अभिनय पक्ष को भी रेखांकित किया। जयदेव रचित अष्टपदी और श्री बालमुरली कृष्ण द्वारा रचित तिल्लाना में स्वयं द्वारा कोरियोग्राफिक प्रस्तुति का प्रदर्शन भी किया। उन्होंने भरतनाट्यम की परम्पराओं और उसके इतिहास का विवरण भी प्रस्तुत किया। प्रदर्शन के लिए उनका साथ शिष्य प्रणव प्रदीप और कीर्तना अनिल ने दिया। इसके बाद कथक पर संवाद सह प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हुआ।

जिसे सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और गुरु सुश्री शमा भाटे ने प्रस्तुत किया। सुश्री भाटे ने लय की कथा की बात की। उनका संवाद गुरु वंदना से प्रारंभ होकर कोरोग्राफिक प्रस्तुति तक चला। गुरु वंदना के विषय में उन्होंने बताया कि जो भी सत्य और सुंदर है, वह वंदना है। इसके बाद अभिनय पक्ष की कथा कहने कवित्त की बात हुई। उन्होंने अपनी शिष्याओं के सहयोग से पारंपरिक और स्वरचित कवित्त का प्रदर्शन किया। गत भाव पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि भाव में सेंस ऑफ टाइमिंग पता होना आवश्यक है। अगले क्रम में तराना, कजरी और अंत में नंदनार, जो एक शिवभक्त की कहानी पर आधारित थी, का प्रदर्शन किया।

नेपथ्य: भारतीय नृत्य के उन महत्पूर्ण घटकों को प्रदर्शित करने के उद्देश्य नेपथ्य प्रदर्शनी का संयोजन किया गया है जिनका उद्देश्य कला को संपूर्णता प्रदान करना है।

इन घटकों में वेशभूषाएं, मंच सज्जा, वेशभूषा-परिधान और रूप सज्जा, वाद्ययंत्र, साहित्य इत्यादि शामिल है। इस प्रदर्शनी का संयोजन अनूप जोशी 'बंटी' ने किया है। यह प्रदर्शनी विभिन्न भारतीय नृत्यों का सांस्कृतिक परिदृश्य और उनकी यात्रा पर आधारित है। यहां आने वाले कलाप्रेमियों के लिए यह प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इसमें कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी, मोहिनीअट्टम, मणिपुरी, कथकली, सत्रिया, कुचिपुड़ी, छाऊ जैसी नृत्य शैलियां शामिल हैं। प्रदर्शनी में नृत्यों के सुप्रसिद्ध नृत्य कलाकारों के छायाचित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं, ताकि कला रसिक नृत्य के साधकों को भी जान पाएं।

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