गहरे मानवीय संकटों से जूझते देशों की सुध कौन लेगा

लुसाका, 17 जनवरी। जाम्बिया के दक्षिण में स्थित विक्टोरिया फॉल, पानी के एक विशाल पर्दे की तरह दिखता है. यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल, 1700 मीटर (एक मील से ज्यादा) की चौड़ाई वाला, ये दुनिया का सबसे चौड़ा जलप्रपात है. जाम्बेजी नदी का पानी नीचे 110 मीटर गहरी खाई में गिरता है और उसकी फुहारें इतनी शक्तिशाली और विशाल हैं कि नजदीकी वर्षावन भीग उठता है. यग एक अद्भुत कुदरती नजारा है लेकिन शेष जाम्बिया की तस्वीर, पानी के इस विशाल जखीरे से काफी अलग है.

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दक्षिणी अफ्रीका के कई अन्य देशों की तरह जाम्बिया पर भी लंबी लंबी अवधि वाले सूखे की मार पड़ती है. फसलें सूख जाती हैं. कुपोषण चौतरफा है और देश के एक करोड़ 84 लाख निवासी बेहाल हैं.

डीडबल्यू से इंटरव्यू में केयर संगठन की जर्मन इकाई में संचार निदेशक साबीने विल्के कहती हैं, "जाम्बिया में 12 लाख लोग भुखमरी के शिकार हैं और 60 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है. हम इसे एक खास तरह के स्थायी संकट की तरह देखते हैं." विल्के बताती हैं कि कोई युद्ध या भूकंप होता "तो हम कहते कि उनकी वजह से ये संकट पैदा हुआ था. जाम्बिया एक ऐसा देश है जहां हम जलवायु परिवर्तन के नाटकीय प्रभाव देखते हैं- बार बार पड़ता और बहुत गंभीर सूखा. लोग सूखे के असर से उबर ही नहीं पाते और लगातार मानवीय सहायता के मोहताज बने रहते हैं."

जाम्बिया में हालात भले ही कितने चिंताजनक या नाटकीय क्यों न हो, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उसकी कवरेज बहुत ही कम होती है. इस तरह ये उन संकटों में से एक है जो बड़े पैमाने पर अनदेखे, उपेक्षित रह जाते हैं और जिन्हें केयर ने अपने अध्ययन "सफरिंग इन साइलेंसः द मोस्ट अंडर-रिपोर्टेड ह्युमैनिटेरियन क्राइसेस ऑफ 2021" (एक खामोश यातनाः 2021 के सबसे कम चर्चित मानवीय संकट) में जगह दी है. छठी बार ऐसा हुआ है कि सालाना मीडिया विश्लेषण ने ऐसे दस संकट सूचीबद्ध किए हैं, जिनमें से हर एक संकट का असर कम से कम दस लाख लोगों पर पड़ा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन मीडिया में जिसकी ना के बराबर रिपोर्टिंग हुई है.

मानवता का संकेत

रिपोर्ट के प्राक्कथन में केयर यूके के सीईओ लॉरी ली ने लिखा है कि "जलवायु संकट की तीव्रता ने दुनिया भर में कई सारी आपात स्थितियों को भड़का दिया है. इस रिपोर्ट में दर्ज 10 में से सात संकट उसी से उभरे हैं. और इसके केंद्र में है एक गहरी नाइंसाफी. दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब लोग, जलवायु परिवर्तन की सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं- गरीबी, पलायन, भुखमरी, लैंगिक असमानता, और सिकुड़ते जाते संसाधन- जबकि जलवायु परिवर्तन के लिए वे कतई जिम्मेदार नहीं हैं."

"सफरिंग इन साइलेंस" की सह-लेखिका साबिने विल्के कहती हैं, "हम ये संकेत देना चाहते हैं कि मानवाधिकार संकट सिर्फ अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता या मीडिया में अपनी उपस्थिति से ही ध्यान न खींचे, कितने लोग कहां और कैसे ये बर्बादी झेलने को विवश हैं इसे छोड़, दुनिया को उनकी ओर देखना चाहिए."

संयुक्त राष्ट्र, मानवीय संकटों का विश्लेषण करने वाले एनजीओ एकेप्स (एसीएपीएस), मानवीय सूचना पोर्टल रिलीफवेब और अपनी खुद की सूचना से मिले डाटा के आधार पर केयर ने उन देशों की शिनाख्त की जहां कम से कम दस लाख लोग संघर्ष या जलवायु की तबाहियों से प्रभावित थे. 40 प्रमुख संकटों की एक आखिरी सूची तैयार की गई और फिर जनवरी 2021 से सितंबर 2021 के दरमियान अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, अरबी और स्पानी भाषा में प्रकाशित 18 लाख ऑनलाइन लेखों के आधार पर उनका मीडिया विश्लेषण किया गया है. केयर की रिपोर्ट में उन दस संकटों के बारे में बताया गया है जिन्हें मीडिया में बिल्कुल भी तवज्जो नहीं मिली.

रिपोर्ट के मुताबिक जाम्बिया इस सूची में सबसे ऊपर है, उसके बाद यूक्रेन, मलावी, द सेंट्रल अफ्रीकी रिपब्लिक, ग्वाटेमाला, कोलम्बिया, बुरुंडी, नाइजर, जिम्बाव्वे और होंडुरास के आपतकालों का उल्लेख है. केयर की 2020 की लिस्ट में मेडागास्कर का नाम सबसे ऊपर था.

यूक्रेन पर किसी का ध्यान नहीं

वैसे तो भुला दिए गए संकटों में यूक्रेन का नंबर दूसरा है, लेकिन हैरानी हो सकती है कि अपनी सीमा पर रूसी सेना के जमावड़े की खबरों से इधर वो काफी सुर्खियों में आ गया है. लेकिन ये भी सच्चाई है कि ये संघर्ष सितंबर 2021 में खड़ा हुआ था.

केयर की शोधकर्ता विल्के के मुताबिक, "यूक्रेन को नवंबर और दिसंबर में कहीं ज्यादा तवज्जो मिली थी खासकर यूरोपीय मीडिया में. और अब वो शायद इस साल लिस्ट में नहीं दिखेगा जैसे कि पहले दिखता था."

केयर के पूर्व विश्लेषणों में सबसे ज्यादा विस्मृत संकटों का केंद्र अफ्रीका है. 2021 में छह थे, और जाम्बिया और द सेंट्रल अफ्रीकी रिपब्लिक के साथ मलावी का नाम भी था. अपने यहां जारी गृहयुद्ध की वजह से उसका नाम इस सूची में था. मलावी में हर रोज दस लाख से ज्यादा लोग भूखे रह जाते हैं.

पांच साल से कम उम्र के 39 फीसदी बच्चे कुपोषण की वजह से अविकसित हैं. करीब आधे बच्चे प्राइमरी स्कूल के चार साल भी पूरे नहीं कर पाते. देश में कोविड टीकाकरण अभियान की रफ्तार सुस्त है. एचआईवी संक्रमण की ऊंची दर ने देश के स्वास्थ्य सिस्टम पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है. करीब 10 फीसदी आबादी संक्रमित है जिनमें बहुत से बच्चे हैं.

होंडुरास में स्त्री हत्याएं

संकटों से सबसे ज्यादा यातना सहते हैं स्त्रियां और बच्चे. केयर के शोधकर्ताओं ने ये पाया है, खासकर होंडुरास में. एक करोड़ में से करीब एक तिहाई आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है. नौकरियों की कमी और बढ़ते अपराधों के अलावा भ्रष्टाचार की वजह से युवा पीढ़ी विदेशों का रुख कर रही है. केयर रिपोर्ट के लेखकों के मुताबिक, "होंडुरास में लोग अक्सर यही कहते हैं कि गरीबी भी यहां ऐसे ही रह गई है जैसे कि यहां अधिकांश महिलाएं बच्चों के साथ घरों में अकेली रह जाती हैं."

रिपोर्ट के मुताबिक कोविड महामारी की शुरुआत से महिलाओं के खिलाफ हिंसा की दर में भी तीव्रता आई है. होंडुरास में 2021 के आंकड़ों के मुताबिक हर 29 घंटे में एक औरत मारी जाती है. यहां महिलाओं की हत्या की दर, लातिन अमेरिका के किसी भी हिस्से से 50 फीसदी ज्यादा है.

विस्मृत संकटों की सुर्खियां बहुत ही कम बनती हैं, इस तथ्य की आंशिक वजह तो ये हो सकती है कि संकटग्रस्त इलाकों का जर्जर बुनियादी ढांचा रिपोर्टरों के लिए सुगम नहीं होता है. ये बात भी है कि लोगों में दूर जगहों की अपेक्षा अपने घर के करीब की खबरों को पढ़ने-देखने के लिए ज्यादा उत्सुकती पाई जाती है.

सहायता की संयत दलील

केयर शोधकर्ता कहते हैं, "हम लोग वैश्विक मीडिया की बनाई प्राथमिकताओं पर हैरान हैं. उदाहरण के लिए, प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी मेगन का ओप्रा विनफ्रे के साथ इंटरव्यू हुआ तो इस बारे में ऑनलाइन मीडिया पर 3,60,000 से ज्यादा खबरें छपीं. दूसरी तरफ सिर्फ 512 खबरें ही ये बता पाईं कि जाम्बिया के दस लाख से ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार हैं.

अक्सर मीडिया में आने से संकटग्रस्त देशों में फौरी नतीजे देखने को मिल जाते हैं. इससे जिंदगी और मौत का अंतर पता चल सकता है. केयर की संचार निदेशक विल्के कहती हैं, "जब संकटों पर मीडिया का ध्यान जाता है, तो उन्हें राजनीतिक तवज्जो भी मिलती है."

विल्के के मुताबिक यूरोपीय आयोग जैसी सहायता एजेंसियां और दाता संगठन, ज्यादा हाई-प्रोफाईल संकटों पर ध्यान देते हैं. "लेकिन हम बार बार यही नोट करते हैं कि जब हम इन डोनर्स यानी दाताओं से बात करते हैं, तो हमें पहले समझाना पड़ता है, जाम्बिया क्यों. इस साल तो हमने उसके बारे में कुछ नहीं सुना- ऐसा कहा जाता है. तो ये एक बिल्कुल सीधा जुड़ाव हैः कम ध्यान दिए जाने का मतलब कम फंडिंग मिलना, और इसका मतलब है तकलीफें कम करने के मौके और कम होते जाना."

रिपोर्टः राल्फ बोजेन

Source: DW

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