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Shell Company: क्या होती है शेल कंपनी जिनपर आरोपों में घिरे अडानी, कैसे करती है यह काम? कौन चलाता है इसे?

Shell Company: शेल कंपनी बनाकर मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।। शेल कंपनियों में स्वामित्व और वित्तीय लेन-देन की बुनियादी पारदर्शिता का अभाव होता है।

Gautam Adani Shell Company

What Is Shell Company: अडानी ग्रुप के मामले पर संसद से लेकर सड़क तक सियासी संग्राम छिड़ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि अडानी की शेल कंपनियों (Shell Company) में 20 हजार करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति किसकी है? राहुल गांधी शेल कंपनियों की चर्चा कर लगातार अडानी और भाजपा को घेरने का काम कर रहे हैं। चलिए जानते हैं आखिर शेल कंपनियां क्या होती हैं और कैसे करती हैं काम? कौन चलाता है इसे?

सबसे पहले जानते हैं शेल कंपनी क्या है?
शेल कंपनियां (Shell Company) वे कंपनियां होती हैं जो प्रायः कागजों पर चलती हैं और पैसे का भौतिक लेनदेन नहीं करती पर मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए काला धंधा करती हैं। इन्हें 'मुखौटा कम्पनी' या 'छद्म कम्पनी' भी कहते हैं। शेल कंपनियां (Shell Company)का अस्तित्व केवल कागजों पर ही होता है और ये किसी तरह से कोई आधिकारिक कारोबार नहीं करती हैं। ये कंपनियां न्यूनतम पेड अप कैपिटल के साथ काम करती है। इनका डिविडेंड इनकम जीरो होता है। साथ ही टर्नओवर और ऑपरेटिंग इनकम भी बहुत कम होती है। कहा जाता है कि काले धन को सफेद करने के लिए बड़े पैमाने पर शेल कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता है।

क्यों बनाई जाती हैं शेल कंपनियां?
शेल कंपनियों (Shell Company) के माध्यम से टैक्स और ऑफशोर अकाउंट को छिपाना आसान हो जाता है। पनामा के अलावा, अन्य टैक्स हेवन देशों में स्विट्जरलैंड, हांगकांग और बेलीज शामिल हैं। दुनिया के कुछ हिस्सों में शेल कंपनियों को पूरी तरह से कानूनी संस्था भी माना जाता है। हालांकि, भारत में यह वैध नहीं है।

शेल कंपनी कौन चलाता है?
शेल कंपनी मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए वास्तविक कंपनी के पैसे की हेराफेरी की जाती है। इसे चलाने के लिए वेटेरन वकील या सीए रखे जाते हैं जो पैसे को इस तरह से मैनेज करते हैं कि कई बार सरकार को भी हवा नहीं लग पाती है। आमतौर पर ये कंपनियां एक माध्यम से ब्लैक मनी को व्हाइट करने का काम करती हैं। इनका इस्तेमाल ब्लैकमनी को कम से कम खर्च में व्हाइट बनाने में किया जाता है। इन कंपनियों में टैक्स को बचाने के लिए काम होता है। इसमें पैसे को इस तरह से खर्च के तौर पर दिखाया जाता है, जिससे टैक्स भी नहीं लगता है। ये कंपनियां न्यूनतम पेड अप कैपिटल के साथ काम करती है और इनका डिविडेंड इनकम जीरो होता है। साथ ही टर्नओवर और ऑपरेटिंग इनकम भी बहुत कम होती है।

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