Budget 2023: आम बजट से पहले आसान भाषा में समझ लीजिए इसकी मुश्किल शब्दावली
आम बजट से पहले आसान भाषा में समझिए बजट की मुश्किल शब्दावली। बजट से पहले हम आपकी मुश्किलों के जवाब लेकर आए हैं। जिसमे आप आसान भाषा में अर्थशास्त्र से जुड़े मुश्किल सिद्धांतों को समझ पाएंगे

Budget 2023: देश का अगला आम बजट आज केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पेश करने जा रही हैं। इस बजट में लोगों को कई उम्मीदें हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि कई क्षेत्रों को इस बार बजट में बड़ी राहत मिल सकती है। बजट को लेकर हर किसी के अंदर उत्सुकता रहती है। लेकिन जब बजट पेश होता है तो बहुत से लोग सिर्फ इतनी ही बातों में सिमटकर रह जाते हैं कि क्या महंगा हुआ और क्या सस्ता हुआ। इसके अलावा लोगों की रुचि टैक्स स्लैब को लेकर होती है क्योंकि इसका सीधा असर उनपर होता है। लेकिन इन सब से इतर कई ऐसे महत्वपूर्ण ऐलान बजट में किए जाते हैं जिसे लोग समझ नहीं पाते हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है मुश्किल शब्दावली और जटिल सिद्धांत। बजट से पहले हम आपकी इन्ही मुश्किलों के जवाब लेकर आए हैं। जिसमे आप आसान भाषा में अर्थशास्त्र से जुड़े मुश्किल सिद्धांतों को समझ पाएंगे और बजट को समझने में आपको आसानी होगी।

फाइनेंस बिल
सरकार आम बजट को पेश करने से पहले फाइनेंस बिल को पेश करती है जोकि आम बजट का काफी अहम हिस्सा होता है। इस बिल में वित्त मंत्रालय आने वाले वाले वित्त वर्ष में क्या नए टैक्स लगाएगी, मौजूदा टैक्स व्यवस्था में कोई बदलाव करेगी या कोई नया बिल लेकर आएगी, इसकी जानकारी देती है। यहां समझने वाली बात है कि फाइनेंस बिल एक्ट नहीं होता है और एक बिल होता है, इसी वजह से इसे पहले लोकसभा में पेश किया जाता है ताकि इसे फाइनेंस बिल से फाइनेंस एक्ट बनाया जा सके। लोकसभा के साथ इसे राज्यसभा में भी संशोधन के लिए भेजा जाता है। 14 दिन के भीतर अगर राज्यसभा से किसी भी तरह का संशोधन करने का सुझाव नहीं आता है तो इसे अपने आप पास कर दिया जाता है।

आम बजट
भारत में हर वर्ष आम बजट यानि यूनियन बजट को पेश किया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार यूनियन बजट वार्षिक वित्तीय विवरण यानि Annual Financial Statement होता है। इसे एक वित्त वर्ष के लिए तैयार किया जाता है। यह 1 अप्रैल से 31 मार्च तक के लिए होता है। एक वित्त वर्ष में सरकार का जो भी वित्तीय लेनदेन होता है उसकी जानकारी इसमे होती है। आम बजट दो हिस्सों में होता है, पहले हिस्से को रेवेन्यू बजट और दूसरे हिस्से को कैपिटल बजट कहते हैं। रेवेन्यू बजट की बात करें तो इसमे कर और गैर कर रसीदों का विवरण होता है, राजस्व व्यय में सरकार उन खर्चों की जानकारी देती है जो रोजमर्रा खर्च किए जाते हैं। लोगों को जो सेवाएं मुहैया कराई जाती है उसमे होने वाले व्यय की जानकारी इसमे होती है। कैपिटल बजट यानि पूंजीगत आय-व्यय लेखा में सरकार जो लोन रिजर्व बैंक या विदेशी सरकार, आम जनता से लेती है उसकी जानकारी होती है। कैपिटल पेमेंट की बात करें तो इसमे वो लोन आते हैं जो सरकार दूसरे राज्यों को देती है।

Capital Expenditure- पूंजीगत व्यय
बजट के दौरान अक्सर आप इस शब्द को सुनते हैं। यह शब्द सुनने में काफी भारी-भरकम लगता है। लेकिन आसान भाषा में इसे समझे तो आय के लिए खर्च किए जाने वाले पैसे को पूंजीगत व्यय कहते हैं। इसे CapEx भी कहते हैं। यह वह सरकारी खर्च होता है जो संपत्ति को बनाता है, यानि विकास में किए जाने वाले खर्च को पूंजीगत व्यय कहते हैं। लंबे समय के लिए विकास पर होने वाला खर्च इस श्रेणी में आता है। इसके जरिए ना सिर्फ देश में विकास होता है बल्कि रोजगार का सृजन भी होता है। उदाहरण के तौर पर समझ लीजिए अगर सरकार कोई एक्सप्रेसवे बनवाती है तो इससे ना सिर्फ रोजगार का सृजन होता है बल्कि देश में विकास होता है, आने वाले समय में सरकार को इससे आय भी होती है।

कस्टम ड्यूटी
बजट में एक और शब्द जो सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है वह है कस्टम ड्यूटी। कस्टम ड्यूटी की बात करें तो देश से आने वाले सामान और जाने वाले सामान पर जो शुल्क लगता है कि उसे कस्टम ड्यूटी कहते हैं। यानि आयात और निर्यात पर लगने वाले शुल्क को कस्टम ड्यूटी कहते हैं। अगर विदेश से कोई सामान आता है तो उसपर उसके वजन और मूल्य के आधार पर शुल्क लगता है। ऐसा ही निर्यात में भी होता है। अगर किसी भी उत्पाद पर कस्टम ड्यूटी बढ़ती है तो उसके दाम बढ़ जाते हैं और कस्टम ड्यूटी कम होती है तो उसके दाम कम हो जाते हैं।

Tax-GDP Ratio
टैक्स जीडीपी अनुपात की बात करें तो किसी भी देश में टैक्स के जरिए जो पूंजी हासिल की जाती है वह जीडीपी का कितना अनुपात है उसे टैक्स जीडीपी अनुपात कहते हैं। इस अनुपात के जरिए यह पता चलता है कि देश अपने आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल कितना बेहतर तरह से कर पा रहा है। अगर देश का टैक्स-जीडीपी रेशियो ज्यादा है तो देश की वित्तीय स्थिति बेहतर है। अगर देश कम से कम कर्ज लेकर अपने देश के खर्च को चला पा रहा है तो वह बेहतर देश है। ऐसे देशों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है और वह दूसरे देशों पर कम निर्भर होते हैं।

Direct and Indirect Tax
देश में रहने वाले नागरिकों पर सरकार टैक्स लगाती है जिससे कि देश के खर्चों को चलाया जा सके। यही वजह है कि देश के हर नागरिक को टैक्स देना होता है। यह टैक्स दो तरह के होते हैं। डायरेक्ट टैक्स परोक्ष कर की बात करें तो व्यक्ति या संस्था सीधे तौर पर इसे सरकार को देते हैं। इसमे आयकर और कॉर्पोरेट टैक्स अहम होता है। यह टैक्स कमाई और मुनाफे पर लगाया जाता है। डायरेक्ट टैक्स को सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स वसूलती है। अपरोक्ष कर यानि इनडायरेक्ट टैक्स की बात करें तो यह सीधे तौर पर सरकार वसूल नहीं करती है। यह टैक्स गुड्स एवं सर्विसेज यानि उत्पाद और सेवा पर लगते हैं। उदाहरण के तौर पर वैट और जीएसटी टैक्स अपरोक्ष कर हैं। इसे अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क वसूलता है।

एक्साइज ड्यूटी
देश के खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार लोगों से अलग-अलग तरह के शुल्क और कर वसूलती है। इसी में से एक एक्साइज ड्यूटी यानि उत्पाद शुल्क होता है। उत्पाद शुल्क अपरोक्ष कर होता है। यह किसी भी उत्पाद के निर्माण पर लगाया जाता है। जब कोई कंपनी किसी उत्पाद का निर्माण खुद करती है, किसी दूसरी कंपनी से निर्माण करा रही है उसे यह कर देना पड़ता है। मुख्य रूप से यह शराब, पेट्रोलियम और नारकोटिक्स पर वसूला जाता है। यह सरकार की कमाई का एक बड़ा जरिया है, जिसका इस्तेमाल देश की विकास योजनाओं के लिए किया जाता है।
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