क्या चिराग रामविलास पासवान की विरासत को बचा पाएंगे ?

पटना, 18 जून। रामविलास पासवान दलित राजनीति का उदारवादी चेहरा थे। राष्ट्रीय राजनीति में उनका अहम स्थान था। बिहार की राजनीति में भी वे हमेशा प्रासंगिक रहे। लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान को बिहार की त्रिमूर्ति कहा जाता था। रामविलास पासवान ने दलितों की लड़ाई लड़ी, लेकिन कभी समाज में घृणा नहीं फैलाया। सबको जोड़ कर आगे बढ़े। वे पहले दलित नेता थे जिन्होंने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग की थी। उनकी राजनीति का सबसे मजबूत पक्ष था समन्वय। यूपीए में रहे या एनडीए में, तालमेल के साथ बेहतर काम किया। ऐसी समृद्ध राजनीति विरासत को संभालना एक बहुत बड़ी चुनौती है। रामविलास पासवान ने चिराग पासवान को अपना राजनीतिक वारिस बनाया था। लेकिन अब पशुपति कुमार पारस ने भी खुद को रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर दिया है। इस पारिवारिक लड़ाई का अंजाम क्या होगा ? क्या इन चुनौतियों के बीच चिराग पासवान अपने पिता की विरासत को बचा पाएंगे ?

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    रामविलास पासवान की नजर में चिराग

    रामविलास पासवान की नजर में चिराग

    रामविलास पासवान ने गुजरात दंगे के बाद जब बाजपेयी सरकार को अलविदा कहा था तब उन्होंने सोच लिया था कि अब भाजपा के साथ राजनीति नहीं करेंगे। लेकिन उनकी इस सोच को चिराग पासवान ने बदल दिया था। 2013 में कांग्रेस और राजद लोजपा को कोई भाव नहीं दे रहे थे। रामविलास पासवान 2009 में खुद लोकसभा का चुनाव हार गये थे। लोजपा जीरो पर थी। 2014 का भविष्य अनिश्चित लग रहा था। तब तक 31 साल के चिराग पासवान लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बन चुके थे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले चिराग फिल्मी दुनिया से नाता तोड़ कर फुलटाइम पॉलिटिशिय़न बन गये थे। युवा जोश था, सोच नयी थी। उन्होंने रामविलास पासवान को भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया। रामविलास पासवान हत्थे से उखड़ गये। कहा, ऐसा कभी न होगा। तब चिराग ने कहा, जब लोजपा ही न बचेगी तो फिर आप अपनी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किस मंच पर करेंगे ? लोजपा बचेगी तभी आपकी राजनीति भी बचेगी। लोजपा को बचाने के लिए कुछ सोचिए। तब रामविलास पासवान ने अपने व्यक्तिगत आग्रह को छोड़ कर एनडीए में जाना मंजूर किया। इसके बाद जो हुआ वो सबने देखा। 2014 में लोजपा सात में छह लोकसभा सीटें जीत कर आयी। बेजान लोजपा में एक नयी जान आ गयी। फिर तो रामविलास पासवान, चिराग पासवान की राजनीतिक सूझबूझ के कायल हो गये।

    रामविलास का चिराग पर भरोसा

    रामविलास का चिराग पर भरोसा

    ये दीगर बात है कि अभी चिराग पासवान और भाजपा में शीतयुद्ध चल रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चिराग पासवान की राजनीतिक क्षमता के कायल रहे हैं। वे चिराग की तारीफ कर चुके हैं। पीएम मोदी ने तो भाजपा के सांसदों को यहां तक कहा था कि उन्हें चिराग पासवान से सीख लेनी चाहिए। चिराग सदन में नियमित आते हैं। किसी मुद्दे पर बहस में शामिल होने के लिए पूरी तैयारी करते हैं। फिर जब जवाब देते हैं तो सटीक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। यह सही है कि चिराग पासवान रामविलास पासवान की बराबरी नहीं कर सकते। उनकी भरपायी भी नहीं कर सकते क्योंकि वे संघर्ष की आग में तप कर इस मुकाम पर पहुंचे थे। इतना अनुभव पाने के लिए चिराग को लंबा सफर तय करना होगा। रामविलास पासवान जानते थे कि चिराग पासवान के पास अनुभव नहीं है लेकिन वे उनकी योग्यता पर भरोसा करते थे। चिराग एक अच्छे वक्ता हैं। पिता की तरह मिलनसार हैं। रामविलास पासवान का आंकलन था कि एक दिन चिराग बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे, 20-25 साल बाद वे देश का भी नेतृत्व कर सकते हैं। हो सकता है कि एक पिता ने अतिशय प्रेम में अपने पुत्र के लिए ये बातें कह दी हों। लेकिन इन बातों से आत्मविश्वास की एक झलक भी है।

    पशुपति पारस बनाम चिराग पासवान

    पशुपति पारस बनाम चिराग पासवान

    पशुपति पारस और चिराह पासवान में जेनेरेशन गैप है। पारस 1977 में पहली बार विधायक बने थे तो चिराग 2014 में पहली बार सांसद बने थे। दोनों के बीच तुलना मुश्किल है। जाहिर है पारस के पास ज्यादा अनुभव है। लेकिन विचारशक्ति, धैर्य और बोलचाल के मामले में दोनों के बीच तुलना हो सकती है। पशुपति कुमार पारस 16 जून को पटना में पत्रकारों से बात कर रहे थे। एक संवाददाता ने उनसे सवाल किया तो पारस भड़क गये, उन्होंने कहा, ये यार, सुनो न यार, इतना बोलोगे तो काम नहीं चलेगा। हम भी पढ़े लिखे आदिमी हैं, कोई मूर्ख नहीं हैं। बार- बार यही पूछते रहते हो। इतना कहते कहते उनके चेहरे पर नाराजगी के गहरे भाव उत्पन्न हो गये। थोड़ी भीड़ थी। एक संवाददाता ने पीछे से कुछ पूछा तो पशुपति पारस ने फिर आपा खो दिया। उन्होंने सामने से कुछ लोगों को हटाया और तीखे स्वर में कहा, कौन है जी ? कौन है, के है ? सवाल था, आज जो सांसद चिराग से अलग हुए हैं उनके संबंधियों ने भी तो एनडीए से अलग हो कर चुनाव लड़ा था। सांसद वीणा देवी की पुत्री कोमल सिंह ने तो जदयू के महेश्वर हजारी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। अब इसके लिए केवल चिराग पासवान को क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ? इस पर पारस ने कहा कि सांसदों ने दबाव में ऐसा किया। लोजपा में बगावत पर चिराग पासवान ने भी प्रेस कांफ्रेस की थी। इसके आधार पर दोनों के बीच के अंतर को समझा जा सकता है।

    अब जनता तय करेगी वास्तविक उत्तराधिकारी

    अब जनता तय करेगी वास्तविक उत्तराधिकारी

    अगर नवीन पटनायक का उदाहरण छोड़ दिया जाय तो बहुत कम ही पुत्र अपने पिता की विरासत के सच्चे वारिस बन पाये हैं। चिराग पासवान के सामने भी बहुत बड़ी चुनौती है। अब तो उन्हें अकेले ही शून्य से सफर शुरू करना है। उनकी लड़ाई अपने चाचा पशुपति पारस से तो है ही, उन्हें नीतीश कुमार जैसे मजबूत नेता का भी सामना करना है। अभी संगठन में जोड़तोड़ से या अदलात के फैसले से भले कोई लोजपा का सिंबल ले ले, लेकिन असली फैसला तो जनता की अदालत में होगा। दोनों के लिए संघर्ष का रास्ता की अंतिम विकल्प है। जनता जिसे अपना समर्थन देगी उसे ही रामविलास पासवान का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाएगा। फिलहाल कोई बड़ा चुनाव नहीं है जिसमें चिराग गुट और पारस गुट का लिटमस टेस्ट हो सके। जदयू के विधायक और पूर्व मंत्री मेवालाल चौधरी के निधन से तारापुर सीट खाली हुई है। जब इस सीट पर उपचुनाव होगा तब चिराग अपनी जमीनी स्थिति का आंकलन कर सकते हैं।

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