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Holi Special: बिहार के इस ज़िले में 'भगवान बुद्ध' के साथ खेली जाती है होली, गांव में मनाया जाता है अनोखा उत्सव

Unique Holi Celebration In Bihar: बिहार के एक गांव में होली का जश्न एक अनोखी परंपरा के तहत मनाया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसमें साथी ग्रामीणों के साथ त्योहार मनाने से पहले भगवान बुद्ध के साथ होली खेली जाती है। यह प्रथा पाल काल से चली आ रही है और आज भी इसका पालन किया जाता है।

नालंदा जिले के मुख्यालय बिहार शरीफ से 10 किलोमीटर दूर स्थित तेतरावन गांव में होली का यह अनोखा उत्सव मनाया जाता है। यहां स्थानीय लोग आपस में होली मनाने से पहले भगवान बुद्ध की मूर्ति के साथ होली खेलते हैं। स्थानीय तौर पर बाबा भैरव के नाम से मशहूर बुद्ध की काले पत्थर की मूर्ति इन उत्सवों का मुख्य केंद्र है।

Holi Celebration

ऐतिहासिक महत्व और अनुष्ठान: गांव में भगवान बुद्ध की 7.5 फुट ऊंची प्राचीन प्रतिमा है। स्थानीय विशेषज्ञ राजीव रंजन पांडे बताते हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय के समय में तेत्रावन में मूर्तिकला का अध्ययन किया जाता था। वे कहते हैं, "काले पत्थर की प्रतिमा में बुद्ध को भूमिस्पर्श मुद्रा में दर्शाया गया है।"

पांडे कहते हैं, "1992-93 में विदेशियों की एक बैठक में इस बात पर जोर दिया गया था कि इतनी बड़ी बैठी हुई बुद्ध प्रतिमा दुर्लभ है। राजस्थानी भैरव बाबा के रूप में पूजे जाने वाले इस मंदिर में छठ पूजा और होली दोनों मनाई जाती है।" शुभ कार्यों की समाप्ति भी यहीं होती है।

औपचारिक अर्पण और उत्सव: किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले, आस-पास के ग्रामीण मूर्ति को अच्छी तरह से साफ करते हैं। फिर वे उस पर मीठा सूजी का पेस्ट और फिर घी लगाते हैं। ग्रामीणों द्वारा रंग और अबीर से होली खेलने से पहले मूर्ति की चमक बनाए रखने के लिए उस पर एक सफेद चादर ओढ़ाई जाती है।

पर्यटन विकास संबंधी चिंताएँ: होली के दौरान मंदिर में भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। भगवान बुद्ध की प्रतिमा के साथ होली खेलने के बाद ग्रामीण भैरव बाबा से पूरे साल सुख, समृद्धि और शांति की प्रार्थना करते हैं। कभी दुनिया भर के बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए लोकप्रिय स्थल रहे इस शहर में पर्यटकों की संख्या में समय के साथ कमी आई है।

स्थानीय लोग इस गिरावट का श्रेय इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में सरकारी लापरवाही को देते हैं और अधिकारियों से कार्रवाई करने का आग्रह कर रहे हैं। काले पत्थर की यह मूर्ति भारत की सबसे बड़ी मूर्तियों में से एक मानी जाती है। वैसे तो चीन और जापान में भी ऐसी ही बड़ी मूर्तियाँ मौजूद हैं, लेकिन तेत्रावन के निवासियों के लिए यह मूर्ति विशेष महत्व रखती है।

पाल राजवंश का प्रभाव: मध्यकालीन भारत में बौद्ध धर्म के प्रसार में पाल वंश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 750 ई. में राजा गोपाल पाल द्वारा स्थापित इस राजवंश ने कई शासकों को देखा, लेकिन 1155 ई. में इसके अंतिम राजा मदनपाल की मृत्यु के बाद इसका विघटन हो गया।

इस युग के दौरान, कई बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, जिनमें तेतरावन गांव की प्रतिमा भी शामिल है, जहां पाल शासक धर्मपाल के अधीन मूर्तिकला अध्ययन आयोजित किए गए थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म को संरक्षित करते हुए, इसके रखरखाव के लिए लगभग 200 गांवों को दान करके नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित किया था।

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