Padma Awards 2023: गुमनामी की जिंदगी जी रहे कपिल देव अचानक चर्चा में आए, पढ़िए उनकी संघर्ष भरी कहानी
Padma Awards 2023:बिहार के तीन लोगों को पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया है। गुमनामी की ज़िंदगी जी रहे कपिल देव प्रसाद के बारे में अब हर कोई जानना चाह रहा है। इस खबर में आपको उनकी सारी कहानी मिल जाएगाी।
Padma Awards 2023: गणतंत्र दिवस के मौके पर देश भर से कई हस्तियों को पद्म अवार्ड्स से सम्मानित किया गया है। इसमें बिहार से ताल्लुक रखने वाले तीन लोगों का नाम भी शामिल है, जिसमें गणितज्ञ आनंद कुमार, सुभद्रा कुमारी (पेपरमेसी की कलाकार) और टेक्सटाइल से जुड़े कपिल देव प्रसाद का नाम शामिल है। आनंद कुमार का ताल्लुक बिहार की राजधानी पटना से है, सुभद्रा देवी सलेमपुर ( मधुबनी) से ताल्लुक रखती हैं। वहीं कपिल देव प्रसाद बसावन बिगहा, नालंदा के निवासी हैं। इन लोगों को पद्मश्री की अवार्ड से क्यो सम्मानित किया गया, इसके बारे में हम आपको आगे बताएंगे। कपिल देव प्रसाद की कहानी तो आपके दिल को छू जाएगी।

बिहार की हस्तियों को भी मिला सम्मान
शिक्षण संस्थान सुपर 30 की वजह से आनंद कुमार सुर्खियों में बने रहते हैं। बच्चों को बेहतर तालीम देने के की वजह से उन्हें यह सम्मान मिला है। गौरतलब है कि खुद आनंद कुमार ने काफी मुश्किलों से जूझते हुए पढ़ाई की थी। अपनी परेशानियों को देखते हुए उन्होंने गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देना शुरू किया और आज इसी वजह से लोगों के बीच उनकी एक अलग पहचान है। पेपरमैसी की कलाकार सुभद्रा देवी को पेपरमैसी की वजह से यह सम्मान मिला है। सुभद्रा देवी वैसे तो सलेमपुर (मधुबनी) से ताल्लुक रखती हैं लेकिन अब वह दिल्ली में ही बस गई हैं। कागज को पानी में फुलाकार, कूटकर तैयार की जाने वाली कला को पेपरमैसी कला कहते हैं। यह कला उन्होंने मनिगाछी ( दरभंगा) में सीखा था। बचपने से ही वह इस कला को देखती थी और खुद भी पानी में फुलाकर कागज़ों को कूटकर चुल्हा, गुड़िया जैसी कई कलाकृतियां बनाती थीं।
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पूर्वजों से चला आ रहा ये कारोबार
देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री की से एक गुमनाम शख्सियत कपिल देव प्रसाद को भी सम्मानित किया गया है। जो कल तक गुमनामी का शिकार थे। आज उनके बारे में पूरी दुनिया जानाना चाहती है। 70 वर्षीय कपिल देव प्रसाद को टेक्सटाइल के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान मिला है। आपको बता दें कि करीब 6 दशकों से कपिल देव प्रसाद बुनकरी से जुड़े हुए हैं। इस काम की शुरुआत उनके दादा शनिचर तांती ने की थी। इसके बाद उनके पिता हरि तांती ने इस काम को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उठाई। कपिलदेव प्रसाद का जन्म 1954 में हुआ था, उन्होंने 15 साल की उम्र में ही बुनकरी को अपना रोज़गार बना लिया था। मौजूदा वक्त में कपिल देव प्रसाद के बेटा सूर्यदेव इस काम में उनकी मदद करते हैं।

नालंदा को मिली अलग पहचान- कपिल देव
कपिल देव प्रसाद ने बताया कि बिहार शरीफ स्थित नवरत्न महल में 70 के दशक में सरकारी बुनकर स्कूल खुला था, वहां हाफ टाइम पढ़ाई होती थी। इस स्कूल में बच्चे अपनी नियमित पढ़ाई के साथ बनकरी की तालीम हासिल कुया करते थे। 1963 से 1965 तक कपिल देव प्रसाद ने यहां से बुनकरी की तालीम ली। 1990 में बुनकर स्कूल में ताला लग गया। पद्मश्री सम्मान के लिए नाम का चयन होने पर कपिल देव प्रसाद ने खुशी का इज़हार करते हुए कहा कि सम्मान सिर्फ मेरा नहीं बल्कि हस्तकरघा से जुड़े हुए हर लोगो का हैं। यह सम्मान मिलने से पूरे नालंदा को एक अलग पहचान मिली है।

रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद
कपिल देव प्रसाद ने कहा कि सम्मान मिलने से हस्तकर्घा को जीआई टैग मिलने की उम्मीद जगी है। इससे ना सिर्फ हस्तकर्घा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। बुनकरी उनका खानदानी पेशा है। उन्होंने बताया कि उनके दादा भी बुनकरी से बावन बूटी साड़ी तैयार करते थे। दादा के बाद पिता ने भी इसे ही रोज़गार बनाया। करीब 55 साल से वह बुनकरी के धंधे से जुड़े हुए हैं, अब इस काम में उनके बेटा हाथ बंटाते हैं। बसावन बिगहा (बिहार शरीफ, नालंदा) के निवासी कपिल देव प्रसाद ने बताया कि उन्होंने बावन बूटी साड़ी के लिए जीआई टैग हासिल करने के बाबत आवेदन भी दिया है।
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