Independence Day Special: मश्कोह घाटी युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले वीर जवान की कहानी
Mashkoh Valley War Story: स्वतंत्रता दिवस पर आज़ादी के दीवानों की चर्चा खूब होती है। लोग उनकी वीरता की कहानी सुनाते हैं। आज़ादी के बाद भी देश में जब मुश्किलें आईं तो जवानों ने मुस्तैदी से दुश्मनों का सामना किया। आज हम आपको देश ऐसे जुड़वा भाई की वीरता की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जो कारगिल युद्ध और 26/11 जैस बड़े ऑपरेशन का हिस्सा रह चुके हैं।
हम बात कर रहे हैं, बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िला के रहने वाले दो जुड़वा भाई रामेश्वर सिंह और भरत प्रसाद सिंह की। जिला के बेला गांव से ताल्लुक रखने वाले जुड़वा भाई में एक रामेश्वर सिंह ने भारतीय सेना में बतौर पैरा कमांडो सेवा दी हैं। कारगिल युद्ध और 26/11 आतंकी हमले में आर्मी ऑपरेशन का हिस्सा थे।भरत प्रसाद सिंह की बात करें तो वह भारतीय सेना की टुकड़ी 'द गार्ड' का एक अहम हिस्सा थे। कारगिल युद्ध के दौरान वब IED ब्लास्ट में बुरी तरह ज़ख्मी हो गए थे।

रामेश्वर सिंह साल 1997 में 19 साल की उम्र में सेना में बहाल हुए थे, सिर्फ दो साल बाग ही उन्हें ऑपरेशन विजय का हिस्सा बन्ने का मौका मिला। रामेश्वर सिंह (पूर्व पैरा कमांडो) ने कारगिल युद्ध का नज़ारा याद करते हुए बताया कि एक वाक्या सुनाया।
रामेश्वर सिंह ने बताया कि युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर की मश्कोह घाटी पर दुश्मनों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। वहां उन्होंने बंकर भी बना लिया था। ऊंचाई ज़्यादा होने की वजह से भारतीय सैनिकों को वहां पैदल जाना मुश्किल था। इसलिए दुश्मनों को मार भगाने के लिए पैराशूट रेजिमेंट यूनिट-5 पैरा स्पेशल कमांडो फोर्स मंगाया गया। स्पेशल कमांडो फोर्स की टीम में वह भी शामिल थे। मश्कोह घाटी में ज़बरदस्त युद्ध हुआ था।
रामेश्वर सिंह ने बताया कि उनकी यूनिट सियाचीन के लिए रवाना हुई ही थी कि, कारगिल पहुंचने का ऑर्डर मिला। घाटी में उतरने के 72 घंटे तक बान कुछ खाए पिए दुश्मनों से लोहा लेते रहे। 8 जुलाई को मश्कोह घाटी की आख़िरी पोस्च को भी दुश्मनों के क़ब्ज़े से छुड़ा लिया।
रामेश्वर ने साल 2014 में VRS ले लिया था, लेकिन आज भी उन्हें मश्कोह घाटी में हुआ भीषण युद्ध याद है। वह उस वक्त ऑपरेशन रक्षक एवं पराक्रम में भी शामिल रहे थे, इसके साथ ही वह ब्लैक कैट कमांडो की भी भूमिका निभा चुके हैं। भारतीय सेना के 'द गार्ड' का हिस्सा रहे भरत प्रसाद सिंह कारगिल युद्ध में ब्लास्ट में बुरी तरह ज़ख्मी हो गए थे। भरत ने कहा कि बचपन से ही दोनों भाई सेना में जाना चाहते थे।












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