Karakat Lok Sabha Seat पर किसका रहा है क़ब्ज़ा, कैसे रहे समीकरण, जानिए सियासी इतिहास
Karakat Lok Sabha Seat: बिहार में आगामी लोकसभा चुनाव को सुगबुगाहट तेज़ हो चुकी है। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं चुनावी तैयारी भी शुरू कर दी है। वहीं सियासी गलियारों में लोकसभा सीटों के इतिहास और समीकरण पर भी चर्चा तेज़ हो चुकी है। इसी क्रम में आज हम आपको काराकट लोकसभा सीट के सियासी समीकरण और इतिहास बताने जा रहे हैं।
काराकाट लोकसभा सीट का पहले बिक्रमगंज नाम हुआ करता था। साल 2008 के नए परिसीमन के बाद इसका नाम काराकट रखा गया। 2008 से लेकर अभी तक यहां पर तीन बार लोकसभा चुनाव हुए है। ग़ौरतलब है कि पिछले तीनो लोकसभा चुनाव में इस सीट पर NDA का क़ब्ज़ा रहा लेकिन भाजपा ने यहां से चुनाव नहीं लड़ा।

तीनों लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां से NDA गठबंध के सहयोगी दलों को ही चुनाव लड़ाया है। इस लोकसभा सीट पर कुर्मी, कुशवाहा और सवर्ण मतदाता विनिंग फ़ैक्टर माने जाते हैं। इस बार की सियासी फिज़ा पूरी तरह से बदली हुई नज़र आ रही है। नीतीश NDA नहीं बल्कि महागठबंधन को मज़बूत करने में जुटे हुए हैं।
उपेंद्र कुशवाहा NDA के साथ हैं, अपनी नई पार्टी रालोजद का परचम बुलंद कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि इस बार लोकसभा चुनाव में INDIA बनाम NDA का दिलचस्प मुकाबला होने के आसार हैं। हालांकि अभी इस लोकसभा सीट से एनडीए और महागठबंधन के उम्मीदवारों का चेहरा साफ़ नहीं है।
एनडीए की तरफ़ से उपेंद्र कुशवाहा के नाम की चर्चा है, वहीं 'इंडिया गठबंधन' की तरफ़ राजद या जदयू के उम्मीदवार चुनावी बिगुल फूंक सकते हैं। काराकाट लोकसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात की जाए तो यादव, राजपूत, कुशवाहा, भूमिहार, ब्राह्मण, दलित, महादलित, कुर्मी, वैश्य और मुस्लिम वोटर मेन माने जाते हैं।
काराकट लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा यादव मतदाताओं की तादाद है। इसके बाद सवर्ण वोटर्स, राजपूत मतदाता, वैश्य, ब्राह्मण, भूमिहार समाज के लोग डिसाइडिंग फैक्टर की भूमिका में रहते हैं। वहीं कुशवाहा, कुर्मी और मुस्लिम वोटर्स भी खास पकड़ रखते हैं।
2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार जदयू के प्रत्याशी महाबली सिंह यहां से सांसद बने थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा ने गठबंधन किया, जिसके बाद NDA प्रत्याशी के तौर पर उपेंद्र कुशवाहा ने चुनावी दांव खेला और राजद के कांति सिंह सियासी मात दी।
2019 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा जदयू के महाबली सिंह ने हरा दिया। आपको बता दें कि 2014 में उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के सहयोगी दलों में शामिल थे, जिसके बाद उन्होंने काराकाट से सांसद की कुर्सी पर जीत दर्ज की थी। 2019 के लोकसभा चुनाव महागठबंधन से चुनावी दांव खेला और जेदयू के महाबली सिंह से हार गए।
इस बार सियासी फ़िज़ा पूरी तरह से बदली हुई है, उपेंद्र कुशवाहा ने फिर जदयू का दामन छोड़ अपनी अलग पार्टी रालोजद बना ली है। आगामी लोकसभा चुनाव वह भाजपा के साथ मिलकर लड़ने का एलान किया है।
सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA की तरफ़ से रालोजद (उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी) से उम्मीदवार चुनावी दांव खेल सकता है। वहीं महागठबंधन की तरफ़ राजद और जदयू के बीच चुनाव लड़ने को लेकर मतभेद देखने को मिल सकती है।












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