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क्या सुशांत सिंह राजपूत और कंगना रनौत बिहार चुनाव के लिए भाजपा के मोहरे हैं?

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में 243 सीटों में से महज 53 सीटें जीतकर करारी हार झेलने वाली भाजपा 2020 के चुनाव में नई रणनीति के साथ उतरती नजर आ रही है। 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं। 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताबड़तोड़ रैली और हिंदुत्व के मुद्दे का भी लाभ भाजपा को नहीं मिल पाया था। सीटों के गिरते ग्राफ को ऊपर उठाने और जदयू की छत्रछाया से निकलने की जद्दोजहद में जुटी भाजपा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ प्रदेश में बने एंटी इनकंबेंसी के माहौल और राजद के मौजूदा नेतृत्व की कमजोरी का फायदा उठाकर विकल्प बनने में जुटी हुई है। भाजपा फिलहाल जदयू के साथ सत्ता में है और इसके नेता सुशील मोदी उप मुख्यमंत्री हैं। बाढ़, कोरोना वायरस और रोजगार के मुद्दे पर चारों तरफ से घिरी नीतीश सरकार के खिलाफ बने माहौल के बीच जदयू और भाजपा दोनों के हाथ में सुशांत सिंह राजपूत की मौत से एक नया राजनीतिक हथियार आ गया।

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    Bihar Election: Sushant Singh Rajput Case को चुनाव में भुनाने की तैयारी में BJP ? | वनइंडिया हिंदी
    बिहार में भाजपा की चुनावी सियासत के केंद्र में 'सुशांत'

    बिहार में भाजपा की चुनावी सियासत के केंद्र में 'सुशांत'

    पहले नीतीश के नेतृत्व वाली बिहार सरकार जिसमें भाजपा भी शामिल है, ने सुशांत की मौत को संदिग्ध बताते हुए इसकी जांच के लिए प्रदेश पुलिस को लगाकर मुद्दे को उछाला। महाराष्ट्र सरकार और पुलिस से उलझने के बाद मामला गरमाया तो सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। मामला सीबीआई के हाथ में जाने के बाद केंद्र की भाजपा नीत सरकार ने इस मुद्दे को हथिया लिया। प्रदेश के लोकप्रिय अभिनेता को न्याय दिलाने की मांग जोर पकड़ने लगी और यह मुद्दा मीडिया के जरिए बिहार के जनमानस पर छा गया। सुशांत को न्याय दिलाने की खबरों के बीच बाढ़, कोरोना वायरस से जुड़ी खबरें दबकर रह गईं। भाजपा ने सुशांत की मौत के मुद्दे का इस्तेमाल कर एक तरफ महाराष्ट्र में पूर्व सहयोगी शिवसेना की सरकार को घेरना शुरू किया तो दूसरी तरफ अब बिहार में सुशांत का पोस्टर जारी कर अपनी चुनावी मंशा भी जाहिर कर दी है। इस बीच सुशांत की मौत की जांच के समर्थन में और इस मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार व मुंबई पुलिस के खिलाफ बोलने वाली एक्ट्रेस कंगना रनौत को केंद्र सरकार ने वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दे दी है। इन सबसे सवाल यही उठता है कि क्या सुशांत और कंगना इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के चुनावी मोहरे हैं?

    भाजपा ने सुशांत का पोस्टर जारी कर जाहिर की चुनावी मंशा

    भाजपा ने सुशांत का पोस्टर जारी कर जाहिर की चुनावी मंशा

    शनिवार को भाजपा के कला-संस्कृति प्रकोष्ठ के बिहार संयोजक वरुण कुमार सिंह ने सुशांत सिंह राजपूत पर एक पोस्टर जारी किया जिसमें लिखा है कि न भूले हैं, ना भूलने देंगे। इसके साथ ही भाजपा ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में वह सुशांत को मुद्दा बनाएगी। सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच सीबीआई, ईडी और एनसीबी के हाथ में जाने के बाद केंद्र की भाजपा नीत सरकार अब बिहार की जनता को यह मैसेज दे रही है कि प्रदेश के इस लाल को न्याय दिलाने में वह अहम भूमिका निभा रही है। साथ ही साथ महाराष्ट्र सरकार को मुश्किल में डालकर भाजपा मुंबई में बिहार की अस्मिता का भी ख्याल रख रही है। इसी रणनीति के तहत शिवसेना के संजय राउत की धमकीभरी बयानबाजी के बाद एक्ट्रेस कंगना रनौत को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा भी दे दी गई है।

    एक तीर से भाजपा साध रही कई निशाने

    एक तीर से भाजपा साध रही कई निशाने

    महाराष्ट्र में बिहार और पूर्वांचल के लोग काफी संख्या में हैं जिनके खिलाफ शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना क्षेत्रवाद की राजनीति करती रही है। मुंबई में बिहार की अस्मिता से प्रदेशवासियों की भावना जुड़ी हुई हैं और यह 2008 में तब भी देखने को मिला था जब पटना के एक युवक राहुल राज को मुंबई की बस में पुलिस ने गोली मार दी थी। मुंबई पुलिस का कहना था कि राहुल राज महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना चीफ राज ठाकरे की हत्या की साजिश रच रहा था। इस घटना के बाद देशभर में मुंबई पुलिस की आलोचना हुई थी और राहुल राज के समर्थन में बिहार के नेता आ गए थे। बिहार के पूर्णिया निवासी एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद ठीक वैसी ही भावना का उभार प्रदेश की जनता में दिख रहा है जिसको जदयू और भाजपा समेत अन्य पार्टियों के नेता भी भुनाने में लगे हैं। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा बिहार की इसी अस्मिता का लाभ उठाने में लगी हुई है। बिहार की सत्ता में शामिल भाजपा सुशांत के मुद्दे को उछालकर एक तरफ तो प्रदेश के असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटका रही है वहीं महाराष्ट्र की पूर्व सहयोगी शिवसेना की उद्धव ठाकरे सरकार से भी राजनीतिक बदला निकालने में लगी है।

    बिहार में जातिगत समीकरण और राजपूतों का वोट

    बिहार में जातिगत समीकरण और राजपूतों का वोट

    बिहार में जातियों का आंकड़ा राजनीतिक गणित और चुनावी नतीजों पर इस कदर हावी है कि यहां 243 सीटों पर पूर्ण बहुमत पाना बहुत ही टेढ़ी खीर है। पिछड़ों, अतिपिछड़ों, कुर्मी, कुशवाहा, दलित, महादलित, मुस्लिम, सवर्ण, आदिवासियों व अन्य समुदायों के लोगों से बने बिहार के चुनाव में वोटों के लिए सही जातिगत समीकरण बिठाने वाले के हाथ में ही सत्ता की बागडोर जाती रही है। बिहार में मतदाताओं में करीब 56 प्रतिशत ओबीसी हैं इसलिए लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद का यहां दबदबा रहा है। वहीं 15 प्रतिशत ऊंची जातियों जिनमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ शामिल हैं, इनके ज्यादातर वोट भाजपा को मिलते रहे हैं क्योंकि आरक्षण की राजनीति में बिहार की ऊंची जातियां समझती हैं कि उनको नुकसान हुआ है। भाजपा के हिंदुत्व और आरक्षण से संबंधित नीतियों की वजह से राजपूतों समेत अपर कास्ट वोट भाजपा के पाले में गिरते रहे हैं। ओबीसी में कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार के साथ चलने से भाजपा सत्ता में शामिल होती रही है। 2015 में नीतीश ने लालू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। सवर्णों के 15 प्रतिशत वोटर्स में करीब 5 प्रतिशत राजपूत मतदाता हैं जो पूरे प्रदेश में बिखरे हैं लेकिन कुछ सीटों पर बहुत ही अहम भूमिका में हैं जिनमें भाजपा के सहयोगी रामविलास पासवान और बेटे चिराग पासवान का जमुई और हाजीपुर क्षेत्र भी है। सुशांत मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा प्रदेश में मतदाताओं की भावनाओं को भुनाने के साथ राजपूतों के वोट को भी अपने पाले में रखने की कोशिश में है। इस कोशिश में करनी सेना का भी साथ मिल रहा है।

    कंगना को सुरक्षा देकर बेटियों की रक्षा का संदेश

    कंगना को सुरक्षा देकर बेटियों की रक्षा का संदेश

    सुशांत मामले पर शिवसेना से भिड़ने वाली कंगना रनौत ने वाई प्लस सुरक्षा मिलने के बाद गृहमंत्री को धन्यवाद दिया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि ये प्रमाण है कि अब किसी देशभक्त आवाज को कोई फासीवादी नहीं कुचल सकेगा, मैं गृह मंत्री अमित शाह की आभारी हूं कि उन्होंने भारत की एक बेटी के वचनों का मान रखा, हमारे स्वाभिमान और आत्मसम्मान की लाज रखी। भाजपा बिहार के जातिवादी समीकरणों के बीच सुशांत से जुड़े भावनात्मक उभार, मुंबई में बिहार वासियों की अस्मिता, बेटियों की सुरक्षा समेत अन्य मुद्दों के जरिए चुनावी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा प्रदेश में अपने सहयोगी जदयू को भी पीछे छोड़ने में लगी हुई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ पड़ने वाले वोटों को भी अपने पाले में खींचना चाहती है। इन सबमें भाजपा को कितनी सफलता मिलेगी, यह तो चुनावी नतीजा ही बताएगा। अगर भाजपा 2010 में मिली सीटों तक भी पहुंच पाती है तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी।

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