क्या कांग्रेस ने बिहार में तेजस्वी के साथ वही किया जो यूपी में अखिलेश के साथ किया था

पटना- कांग्रेस के नेता भी यह बात मानने लगे हैं कि बिहार चुनाव में कांग्रेस ने ही तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से रोक दिया है। पार्टी नेता तारिक अनवर और पीएल पुनिया ने सार्वजनिक तौर पर बयान दिया है कि बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत ही नकारा रहा है। बिहार के प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने वहां चुनाव प्रचार प्रबंधन में हुए नए प्रयोगों को लेकर आलाकमान पर भी सवाल उठाए हैं, जिन्होंने दिल्ली से एआईसीसी के लोगों और प्रवक्ताओं को बिहार जैसे राज्य में चुनाव का माइक्रोमैनेजमेंट करने के लिए भेज दिया था। प्रदेश नेताओं के मुताबिक उनके पास राज्य की जमीनी राजनीति की कोई जानकारी नहीं थी और वह हवा-हवाई बनकर पूरे इलेक्शन मैनेजमेंट पर कब्जा कर बैठे थे।

Did Congress do the same to Tejashwi Yadav in Bihar as it did to Akhilesh in UP

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    बिहार के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए जमकर भड़ास निकाली है। वहीं राजद के नेताओं ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का बेड़ा गर्क किया था, उसी तरह का हाल इस बार उसने बिहार में तेजस्वी यादव का भी कर दिया है। पार्टी के खराब प्रदर्शन और हवा-हवाई नेताओं की दखलअंदाजी पर बिहार के वरिष्ठ कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने ईटी से कहा है कि, 'कांग्रेस प्रदेश के स्थानीय नेताओं को किनारे रखकर न तो संगठन ही बना सकती है और ना ही चुनाव ही जीत सकती है।' उन्होंने कहा है कि 'चुनाव और प्रचार का काम मुख्य रूप से एआईसीसी की टीम देख रही थी। बिहार के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को पार्टी के चुनाव और प्रचार मैनेजमेंट में कोई खास जिम्मेदारी नहीं दी गई। अगर जमीनी हकीकत की जानकारी रखने वाले प्रदेश के नेताओं को उचित जिम्मेदारी मिलती तो कांग्रेस 30 से ज्यादा सीटें जीतती।' अखिलेश प्रसाद कांग्रेस के उस गुप्र 23 के नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन के लिए सोनिया गांधी को खत लिखकर तूफान मचा दिया था।

    बिहार कांग्रेस में और कई ऐसे नेता हैं जिन्हें लगता है कि इस चुनाव में बाहरी और जूनियर नेता पार्टी के चुनाव मुहिम पर हावी हो गए थे और वह बौना साबित हो रहे थे। अगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और एक-दो केंद्रीय पर्यवेक्षकों को छोड़ दें तो इस बार बिहार में चुनाव की कमान पूरी तरह से राहुल गांधी के करीबी महासचिव रणनीद सिंह सुरजेवाला, सुबोध कुमार और पवन खेड़ा जैसे नेताओं के हाथों में दिखाई पड़ रही थी। इनके अलावा कुछ नए पार्टी प्रवक्ता और सोशल मीडिया के एक्सपर्ट भी डफली बजा रहे थे। ऐसे नेताओं पर बिहार प्रदेश कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष ने तीखी टिप्पणी की है। उनके मुताबिक, 'जो अपने राज्य में चुनाव नहीं जीत सकते या उन्हें सुनने के लिए 1,000 लोग नहीं जुट पाते, ऐसे लोगों ने चुनाव कार्य के नाम पर रोजाना आधा दर्जन प्रेस कांफ्रेंस किए। उन्होंने आने-जाने के लिए एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री के आधिकरिक विमान का इस्तेमाल किया। कुछ ने तो राहुल समेत वरिष्ठ पार्टी नेताओं के लिए आयोजित रैली को संबोधित करके मास लीडर बनने की अपनी फैंटसी पूरी की। जब ये लोग बिहार को ये सिखा रहे थे कि चुनाव कैसे लड़ें, वोटरों ने उन्हें और हमारी पार्टी को उसकी हैसियत बता दी।'

    कांग्रेस नेताओं के मुताबिक उन्हें (बाहरी नेताओं को) पूरा यकीन था कि वह वोटों का वारिश करवाकर राहुल गांधी को किंगमेकर बना देंगे। एक वरिष्ठ एआईसीसी अधिकारी ने कहा कि 'उन लोगों ने तो रांची और छत्तीसगढ़ में होटलों और रिजॉर्ट के अलावा दो चार्टर्ड विमानों तक का इंतजाम कर लिया था, ताकि विधायकों को एनडीए से बचाया जा सके। ' एआईसीसी का आंतरिक तौर पर आंकलन था कि पार्टी 40 सीटें जीत लेगी, लेकिन जब हारी तो कहना शुरू कर दिया कि लड़ने के लिए जो सीटें मिली वो मुश्किल सीटें थीं। दोबारा अध्यक्ष बनने की तैयारियों में जुटे राहुल गांधी भी बीच चुनाव में हमेशा की तरह शिमला में छुट्टियां मनाने चले गए। वो बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ जैसलमेर की ट्रिप भी बना चुके थे, लेकिन बुधवार को उसे कैंसिल कर दिया। वैसे यहां यह बताना भी जरूरी है कि शुरू में प्रदेश कांग्रेस के नेता इस बात से मायूस थे कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री से भी कम रैलियां कर रहे हैं, लेकिन जब उन्हें अंदाजा लग गया कि वह जहां जा रहे हैं वहां भी कोई खास असर नहीं हो रहा है तो उन्होंने तेजस्वी यादव से ही पार्टी के लिए भी प्रचार करने की गुहार लगानी शुरू कर दी।

    कांग्रेस और उसके आला नेताओं के इस रवैए पर राजद ने भी खूब भड़ास निकालनी शुरू कर दी है। पार्टी नेता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि राष्ट्रीय राजनीति और हमारे लोकतंत्र के लिए बिहार चुनाव की अहमियत के बावजूद कांग्रेस ने 70 सीटें ले लिया जिसके वह काबिल नहीं थी। फिर उसने चुनाव प्रचार में भी लापरवाही की और उसे शौकिया पूरा किया। उन्होंने कहा कि,'तेजस्वी ने पूरी ताकत से लड़ा, लेकिन गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने उनके साथ वही किया जो उसने यूपी के पिछले चुनाव में अखिलेश यादव के साथ किया था।' कांग्रेस में नेतृत्व बदलाव की मांग करने वाले एक नेता ने कहा है कि 'बिहार और उपचुनावों में कांग्रेस का बहुत ही खराब प्रदर्शन हमारी ओर से उठाए गए मुद्दों की ही ओर इशारा करता है कि पार्टी मसलों को लेकर एक ईमानदार और पारदर्शी आत्मनिरीक्षण होनी चाहिए और इसके लिए एक प्रभावी और डायनामिक लीडरशिप की जरूरत है। '

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