कोरोना: पिता की देखभाल के लिए बेटे ने छोड़ दी बैंक की नौकरी, मुंबई से लौटा भागलपुर

कोरोना: पिता की देखभाल के लिए बेटे ने छोड़ दी बैंक की नौकरी, मुंबई से लौटा भागलपुर

कोरोना की बलिवेदी पर इंसान तो इंसान, उसके रिश्ते भी कुर्बान हो रहे हैं। इस बीमारी ने अपने-पराये का फर्क खत्म कर दिया है। लेकिन हर रात की एक सुबह होती है। रिश्तों की अंधेरी गली में भी भोर का सूरज निकला है। इस सूरज का नाम है कौशल किशोर जो भागलपुर के रहने वाले हैं। मौजूदा दौर में खुदगर्जी जरूर बढ़ी है लेकिन कौशल किशोर जैसे युवा इंसानियत की मशाल जलाए हुए हैं। कोरोना संकट के समय पिता की देखभाल के लिए कौशल किशोर ने अपनी नौकरी छोड़ दी। नौकरी की चिंता त्याग कर वे पिता की सेवा करने के लिए मुम्बई से भागलपुर आ गये। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कौशल किशोर ने अपनी बैंक की नौकरी छोड़ दी ? जब आप इसकी वजह जानेंगे तो दिल उन्हें सलाम करने को चाहेगा।

पिता ने संघर्ष कर पुत्र को पढ़ाया

पिता ने संघर्ष कर पुत्र को पढ़ाया

भागलपुर के रहने वाले रवीन्द्रनाथ ठाकुर होमगार्ड के जवान हैं। अस्थायी नौकरी है। हाजिरी के हिसाब से पैसा मिलता है। मुश्किल से घर-गृहस्थी चलती है। रवीन्द्रनाथ की आमदनी भले कम रही लेकिन उन्होंने अपने बेटे कौशल किशोर को पढ़ाने में कोई कमी नहीं रखी। पुत्र ने भी पिता की मेहनत को जाया नहीं किया। मन से पढ़ाई की। बैंक में नौकरी लग गयी। पहली तैनाती मुम्बई में हुई। संघर्ष के दौर से निकल मुम्बई पहुंचना कौशल के लिए बहुत बड़ी बात थी। पिता को भी संतोष हो गया कि बेटे ने कुछ कर दिखाया। उनका एक बड़ा सपना सच हो गया। इस बीच भागलपुर के नौगछिया अनुमंडल के मकंदपुर गांव में एक बुजुर्ग की मौत हो गयी। इस मौत के कारण और प्रभाव ने कौशल किशोर की जिंदगी बदल दी। उन्होंने पुत्र धर्म निभाने के लिए निजी सुखों की कुर्बानी दे दी।

बेटा हो तो ऐसा

बेटा हो तो ऐसा

कोराना के क्रूर काल में किसी की स्वभाविक मौत भी एक विपदा ही है। लोग तरह-तरह की बात करने लगते हैं। इस दरम्यान मकंदपुर गांव में ये अफवाह फैल गयी कि बुजुर्ग की मौत कोरोना से हुई है। फिर क्या था, लोगों ने मृतक के परिवार से किनारा कर लिया। अंतिम संस्कार में गांव और गोतिया के लोगों ने शामिल होने से इंकार कर दिया। इस विकट परिस्थिति में बुजुर्ग के पुत्र को अकेले ही उनकी अंत्येष्टि करनी पड़ी। कोरोना की जांच रिपोर्ट आने में समय लगता है। दाहसंस्कार के बाद जब उनकी जांच रिपोर्ट सामने आयी तो वह निगेटिव थी। यानी उस बुजुर्ग की स्वभाविक मौत हुई थी। उन्हें कोरोना नहीं था। लेकिन एक शक ने उनकी अंतिम यात्रा को कष्टमय और अपमानजनक बना दिया। मुम्बई में नौकरी कर रहे कौशल को भी अपने गांव की इस घटना की जानकारी मिली। इस घटना ने कौशल को विचलित कर दिया। पुत्र को अपने पिता की फिक्र होने लगी। पिता अब रिटायर होने वाले हैं। कौशल सोचने लगे कि मुझे नौकरी तो दूसरी मिल जाएगी लेकिन अगर पिता को कुछ हो गया तो सब बिखर जाएगा। तब उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र देकर पुत्र धर्म निभाने का फैसला किया। वे मुम्बई छोड़ कर भागलपुर लौट आये। कौशल के पिता को कुछ हुआ नहीं था। उन्होंने केवल इस आशंका में नौकरी छोड़ दी कि कहीं पिता के साथ भी गांव वाली घटना न हो जाए। पुत्र धर्म की इससे बड़ी मिसाल कुछ और नहीं हो सकती।

कोरोना से मौत के बाद दुर्गति

कोरोना से मौत के बाद दुर्गति

रविवार को आरा से सदर अस्पताल में एक बुजुर्ग कोरोना मरीज की मौत हो गयी। जैसे ही उसकी मौत हुई अस्पताल से डॉक्टर, नर्स और वार्ड ब्वाय वहां से भाग खड़े हुए। पूरे अस्पताल में अफरा-तफरी मच गयी। यहां तक कि उसके रिश्तेदार भी शव को छोड़ कर फरार हो गये। 24 घंटे तक शव अस्पताल में पड़ा रहा। पुत्रों ने भी अपने मृत पिता की सुध नहीं ली। अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद सरकारी एम्बुलेंस बुलाया गया। फिर शव को एम्बुलेंस से अंतिम संस्कार के लिया भेजा गया। सरकार लाख दावा करे कि कोरोना के इलाज के लिए जरूरी इंतजाम कर दिये गये हैं लेकिन हकीकत कुछ और है। यह घटना सरकारी व्यवस्था पर तो सवाल है ही, पारिवारिक उत्तरदायित्व पर भी एक गंभीर प्रश्न है। कोरोना से मौत के बाद सुरक्षात्मक उपायों के साथ अंत्येष्टि संभव है तो फिर कोई पुत्र अपने पिता के शव को लावारिस कैसे छोड़ सकता है ? जब मेडिकल स्टाफ किसी शव का अंतिम संस्कार कर सकते हैं तो पुत्र क्यों नहीं ? दो घटनाएं आपके सामने हैं। एक भागलपुर की और दूसरी आरा की। ऐसे में फैसला कर लें कि कौशल किशोर ने भावनाओं की कितनी बड़ी मिसाल पेश की है।

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