Bihar caste census: बिहार में जाति जनगणना से नीतीश की महादलित राजनीति को कितना फायदा?

Bihar caste census latest news: बिहार में जाति जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद सभी पार्टियां अपने-अपने हिसाब से इसके विश्लेषणों में जुटी हुई हैं। इस प्रक्रिया के पीछे सबसे बड़ा रोल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का रहा है। इसलिए, उनकी खुद की राजनीति के लिए यह कितना फायदेमंद हो सकता है, यह दिलचस्प सवाल है।

बिहार में सत्ताधारी जनता दल (यूनाइटेड) के चीफ नीतीश कुमार की राजनीति का मूल समीकरण हमेशा से उनका कुर्मी-कोइरी वोट बैंक रहा है। सोमवार को जारी हुए जाति जनगणना से अब यह बात पूरी तरह से जगजाहिर हो चुकी है कि संख्या बल में कोइरी, कुर्मी समाज पर बहुत भारी है।

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नीतीश के अपने वोट बैंक में सेंध
यह भी तथ्य है कि हाल के समय में नीतीश कुमार की पकड़ इन दोनों जातियों पर कम हुई है। कोइरी या कुशवाहा जाति के बिहार में इस समय दो बड़े नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा उनका साथ छोड़ चुके हैं; और सम्राट चौधरी सिर पर पगड़ी बांध कर उन्हें सत्ता से बेदखल करने के संकल्प के साथ प्रदेश में भाजपा की कमान संभाले हुए हैं।

बिहार की राजनीति में महादलित का प्रयोग
ऐसे में बिहार की राजनीति में नीतीश के एक खास प्रयोग महादलितों की नई आबादी का आंकड़ा उनके लिए खास मायने रख सकता है। क्योंकि, इस शब्द का उन्होंने प्रयोग ही नहीं किया है, बल्कि दलितों में से भी महादलित की तलाश कर अपना एक अलग जनाधार बनाया है, जिसका उन्हें चुनावों में काफी हद तक लाभ भी मिला है।

गैर-पासवान दलित जातियों को एकजुट करने की कोशिश की है
नीतीश कुमार की महादलित राजनीति में गैर-पासवान 21 अनुसूचित जातियां शामिल रही हैं। अब देखते हैं कि ताजा रिपोर्ट के अनुसार इनकी कितनी आबादी है, जो बिहार के सीएम के आगे की सियासत के लिए उम्मीद की किरण साबित हो सकती है।

बिहार में दलितों की राजनीति में सबसे प्रभावी भूमिका पासवानों की रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान इसके प्रमुख नेता थे। आज भी उनके बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति पारस पासवान आधारित राजनीति करते हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि एलजेपी (राम विलास) के सांसद चिराग पासवान नीतीश के कट्टर विरोधी हैं और भाजपा से उनके अलग होने के पीछे यही एक बड़ी वजह मानी जाती है।

महादलितों की आबादी यादवों के लगभग बराबर
इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में दलित या अनुसूचित जाति की कुल आबादी 19.65% है। इनमें से पासवान की जनसंख्या 5.31% है। यानी जिस महादलित की राजनीति की शुरुआत नीतीश ने की थी, उनकी जनसंख्या करीब 14% से अधिक है। अगर आरजेडी की राजनीति के हिसाब से देखें तो यह आंकड़ा यादवों के ही बराबर है।

नीतीश के लिए बची कितनी उम्मीद?
हालांकि, पूरी महादलित आबादी पर नीतीश का सिक्का चलना जरा मुश्किल है, क्योंकि पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की अगुवाई वाला हिंदुस्तान आवाम मोर्चा अब इनसे दूर जा चुका है, जो मूल रूप से मुसहर (महादलित) जाति पर आधारित है। यानी अगर मुसहरों को भी अलग करके देखें तो नीतीश करीब 11% महादलित वोट बैंक से उम्मीद लगा सकते हैं।

हालांकि, इस बड़े वोट बैंक पर बीजेपी की भी नजरें टिकी रही हैं। इसलिए नीतीश के लिए प्रतियोगिता इतना आसान भी नहीं है। वहीं अगर उन्हें कोइरी या कुशवाहा जाति से निराशा हाथ लगी और कुर्मी जाति के वोट उपजातियों (अवधिया, घमैला, कोचैसा आदि) के आधार पर बंटे तो जदयू सुप्रीमो को जोर का झटका भी लग सकता है। क्योंकि, भाजपा इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को साथ लेकर पहले ही सेंध लगाने की कोशिश शुरू कर चुकी है।

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